कांगड़ा जिले के भरमाड़ कस्बे में स्थित सिद्धपीठ शिब्बोथान धाम आज भी हजारों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है. श्रावण की संक्रांति के पहले रविवार से यहां मेले लगते हैं और सुबह से शाम तक लोगों की काफी भीड़ पूजा-अर्चना के लिए उमड़ती है. 

आज ऐसे ही चमत्कार पूर्ण स्थान की चर्चा करने जा रहे हैं. हमारा तात्पर्य है ज्वाली तहसील में भरमाड़ नामक गांव में स्थित “शिब्बोथानमंदिर” से.यह मंदिर पठानकोट से 40 कि. मी. की दूरी पर भरमाड़ नामक रेलवे हाल़्ट से कांगड़ा घाटी रेलमार्ग से जुड़ा है और मात्र 150 मीटर की दूरी पर स्थित है.यह स्थान गगल एयरपोर्ट से 45 कि. मी. और पौंग बांध से 38 कि. मी. दूर पठानकोट_देहरा सड़क मार्ग से मात्र 200 मीटर की दूरी पर विराज मान है.

शिब्बोथान एक मात्र ऐसा स्थान है जो” गोगावीर” की कृपा से उनके एक अनन्य भक्त “शिब्बो” के नाम को समर्पित है.इस पावन स्थल पर सांप के काटे व्यक्ति के विष का निवारण होता है और वह व्यक्ति खुशी-खुशी अपना नया जीवन प्राप्त कर घर लौटता है.

मंदिर के महंत श्री तिलकराज आदि की जानकारी के अनुसार बाबा शिब्बोजी का जन्म  लगभग 1244 ई. में समीप वर्ती गांव सिद्धपुर घाड़ में पिता आलम देव जी के घर हुआ. इन के दो भाई और “शिब्बा” नाम की एक बहिन थी.शिब्बो जन्म से ही अपंग थे.पिता खेती बाड़ी का काम करते थे. शिब्बो बचपन से ही साधु वृत्ति के इन्सान थे और सांसारिक गतिविधियों में इनका मन नहीं लगता था.

उधर बहिन शिब्बा का रिश्ता निकटवर्ती गांव में तय हुआ था. परन्तु भाग्य को कुछ और ही मंजूर था. विवाह से पूर्व ही मंगेतर पति का निधन हो जाने के कारण शिब्बा भी सोलह श्रृंगार करके पति के साथ ही सति हो गई.सिद्धपुरघाड़ में शिब्बा देवी का मंदिर कुल देवी के मंदिर से आज भी प्रसिद्ध है.शुभकर्म के बाद अपार भीड़ मां कुलदेवी के चरणों में नतमस्तक होने पहुंचती है.

इस घटना के बाद शिशु शिब्बो का मन विरक्त हो गया और वह भरमाड़ के घने जंगल में एक सुनसान स्थान पर तपस्या करने लग गए. वह एक बामी के निकट पिंडिनुमा स्थान के निकट अनेक वर्षों तक तप में लीन रहे. उनकी घोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान्शिव भोले नाथ ने उन्हें वरदान देने की सोची. वे”गोगावीर” के रूप में अपनी मंडली सहित आकाश मार्ग से गुजर रहे थे कि यकायक उनका नील अश्व-वाहन उस स्थान पर आकर रुक गया. अनेक प्रयासों के बाद भी वह टस-से-मस नहीं हुआ.जहर वीर गुग्गा नीचे उतर कर क्या देखते हैं कि भक्त शिब्बो घोर तप में लीन हैं

समीपवर्ती बामी से “ओमजहरवीरायनमः” की ध्वनि गुंजायमान थी. शिव स्वरूप जहरवीर गुग्गा ने शिब्बो की तपस्या से प्रसन्न होकर तीन वर मांगने को कहा. ज्यों ही शिब्बो ने सामने जहर वीर को देखकर उनके चरणों को स्पर्श किया तो शिब्बो अपंगता से मुक्त होकर 12 वर्ष की आयु के युवा रूप में बदल गए.

उनकी इस तपस्या से प्रसन्न होकर जाहरवीर गुग्गा पीर ने बाबा शिब्बो को तीन वरदान दिए. प्रथम में उन्होंने कहा कि यह स्थान आज से शिब्बोथान नाम से प्रसिद्ध होगा. दूसरे में उन्होंने कहा कि तुम नागों के सिद्ध कहलाओगे और इस स्थान से सर्पदंशित व्यक्ति पूर्ण रूप से ठीक होकर जाएगा. तुम्हारे कुल का कोई भी बच्चा अगर यहां पानी की तीन चूलियां जहर से पीडि़त व्यक्ति को पिला देगा, तो पीडि़त व्यक्ति जहर से मुक्ति पाएगा. अंतिम वर में उन्होंने कहा कि जिस स्थान पर बैठकर तुमने तपस्या की है, उस स्थान की मिट्टी जहर युक्त स्थान पर लगाने से विदेश में बैठा व्यक्ति भी जहर से मुक्ति पाएगा. जिस बेरी और बिल के पेड़ के नीचे बैठकर बाबा ने तपस्या की वह कांटों से रहित हो गई है और आज भी मंदिर परिसर में हरी-भरी है.

गुग्गा जहर-वीर ने लोक मंगल हेतु मांगे गए तीनों वरदान शिब्बो को प्रदान कर मंदिर में स्थित दो बिल्ववृक्षों और एक बेरी के पेड़ को साक्षी बनाकर उन्हें कांटों से मुक्त कर दिया.यह वरदान भी दिया कि यह स्थान अब “शिब्बोथान” के नाम से विश्वभर में जाना जाएगा. तब से शिब्बो वहीं लीन हो गए और यह मंदिर देश विदेश के लाखों भक्तों के लिए आस्था का केंद्र बना हुआ है.

मंदिर के गर्भ गृह में निम्नलिखित मूर्तियां स्थापित हैं जिनकी विधिवत्पूजा अर्चना की जाती है. गुरूमच्छंदरनाथ, गोरखनाथजी, बाबाक्यालूजी, कालियावीर, अजियापाल, जहरवीरमंडलीक, माताबाछला, नारसिंह, कामधेनु, बहिनगोगड़ी, वासुकिनाग और बाबा शिब्बोथान की ये मूर्तियां न सिर्फ श्रद्धालुओं की उत्सुकता जगाती हैं बल्कि लोक कल्याण में अपना आशीर्वाद निरंतर प्रदान करने की कृपा करती हैं.

शनिवार, रविवार और सोमवार को मंदिर प्रांगण में संकीर्तन होता है और गोगानौमीं के दिन विशाल भंडारे का आयोजन किया जाता है. गुग्गामढ़ी से प्रसाद रूप में मिलने वाले भंकारे और पानी को श्रद्धालु अपने घर में छिड़कते हैं जिससे उन्हें सांपों और विषैले जीवों एवं भूत प्रेतों से छुटकारा मिलता है.

इस पावन स्थल पर हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्म के अनुयायी इस स्थान पर आकर अपनी मन्नत मांगते और नतमस्तक होते हैं. मुस्लमान भाई इसे “पीर” और हिंदू इसे “गुग्गाजहरवीर” के नाम से पूजते हैं. भक्तों की अपार भीड़ प्रतिदिन बाबा शिब्बोथान में नतमस्तक होती है.

आज भी बाबा के वंशज इस स्थान की महिमा को यथा वत बनाए रखे हुए हैं.मंदिर के विकास कार्यों की देख रेख मंदिर कमेटी करती है. मंदिर परिसर में आने वाले श्रद्धालुओं की सुविधाओं का पूरा ध्यान रखा जाता है.यहां पहुंचकर श्रद्धालु अपार प्रसन्नता और आत्मिक शांति का अनुभव करते हैं.

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