मुंबई का चमत्कार ये है कि इसने हर जाति-धर्म. संस्कार और सभ्यता को स्वीकार किया है. न केवल स्वीकार किया है बल्कि अपनी छाती से लगा कर उसे पाला पोसा भी है. चाहे पुर्तगालियों का शासन हो या चाहे अंग्रेजो का मुंबई ने समय समय पर अपनी गोद में हर उस दोस्त तथा दुश्मन को भी बैठाया जो जो इसके पास आया. ऐसी निस्वार्थ मुंबई को जब भाषाई स्तर पर देखते हैं तो पूरे भारत देश की झलक मिलती है. ऐसा लगता है मानो भारत ही मुंबई में समा गया हो.

क्योंकि यहां हर बोली, हर भाषा के लोग हैं. और ऐसा भी कहा जाता है कि जो मुम्बईकर होता है उसे मराठी-गुजराती-हिंदी -अंग्रेजी का ज्ञान बचपन से ही होता है. और यदि वो थोड़ा भी उत्सुक हो तो वह तमिल,कन्नड़, तेलगु भी जान सकता है क्योंकि दक्षिण भारतीय लोगो का भी मुंबई में आधिक्य है. अपने आप में मुंबई एक अजूबा शहर है. महाराष्ट्र की राजधानी तथा देश की आर्थिक राजधानी के नाम से मशहूर मुंबई एक माया नगरी है.

इसकी माया ही है ये कि महाराष्ट्र के सबसे आधुनिक इस शहर में एक समय हिंदी भाषा बोली-समझी ही नहीं जाती थी वहां हिंदी को इसने अपने यहां न केवल स्थान दिया बल्कि हिंदी यहां फली फूली भी. और आज इसका प्रसार प्रचार इतना है कि मुंबई ने ही देश को हिंदी साहित्यकारों से भी परिचय कराया. चूंकि भारत के पश्चिमी तट पर स्थित है मुंबई तो पाश्चात्य संस्कृति का यहां अधिक असर रहा. व्यापारिक केंद्र होने से मुंबई चकाचौंध से हमेशा घिरी रही और यही इस शहर का मुख्य आकर्षण भी ही बना. यहां की भौगोलिक स्थिति इसकी प्रगति का मुख्य कारण बनी. ये सपनों का एक शहर बन गया. यहां जो भी आता वो खाली हाथ नहीं जाता. इसलिए दूर दूर से लोगों ने मुंबई का रुख किया. यहां मेहनत मजदूरी की और अपना जीवन बसाया.

मुगल हों. पुर्तगाली हो. अंग्रेज हो या फिर भारत के विभिन्न कोनों से आये हुए लोग हो, मुंबई ने सबको स्वीकार किया. यही कारण है कि यह विश्व का दूसरा सबसे ज्यादा आबादी वाला शहर भी है. और अपने आप में जादुई शहर भी है. भाषाई स्तर पर मराठी चूंकि राज्यभाषा है इसलिए इसका आधिपत्य तो स्वभाविक था मगर मुंबई में बाहर से आने वाले हर वर्ग ने अपना प्रभावा डाला और यहां भाषाएं विकसित होने लगी. मराठी ने जब यहां अंग्रेजी को पनाह दी तो अपने ही देश की बोली-भाषा से वो कैसे परहेज करती. ये सच है कि हिंदी को मुंबई में फैलने के लिए लम्बा इन्तजार करना पड़ा था. किन्तु हिंदी पुर्तगालियों के शासनकाल के वक्त यहां पहुंच चुकी थी. व्यापार के लिए बाहर से लाए गए मजदूरों में हिंदी प्रांत के मजदूर भी यहां लाए गए.

जो मराठी से घुले मिले भी मगर हिंदी को यहां बो गए थे. विकासशील मुंबई में जहां मराठी को राजभाषा का दर्जा दिलाने के लिए केशव सुत का विशेष योगदान रहा - जिन्हें मराठी का जनक भी माना जाता है. आचार्य प्रल्हाद केशव अत्रे भी मशहूर रहे जिन्हें स्व राष्ट्रपति डॉ राधाकृष्णन ने "रायटर एण्ड फायटर ऑफ महाराष्ट्र " कह कर संबोधित किया था.विष्णु सखाराम खांडेकर -मराठी के दिग्गज साहित्यकारों में से एक थे. इनके नाम पर 1998 में स्मारक डाक टिकट जारी किया गया था. पुरुषोत्तम लक्ष्मण देश पांडे -लोक प्रिय लेखक. इनके अलावा और भी कई लेखकों. साहित्यकारो, राजनेताओं ने समय समय पर अपना योगदान देते हुए मराठी को समृद्ध बनाया. चूंकि मुंबई में हिंदी भाषा के क्रमिक विकास का अध्ययन करें तो पता चलता है हिंदी को बड़ा पैमाना तब मिला जब आजादी की लड़ाई के वक्त यहां देश के अन्य प्रांतो के लड़ाके तथा नेता आदि आते गए तो हिंदी भी यहां समझी -बोली जाने लगी. महात्मा गांधी की प्रेरणा से हिंदी का प्रचार करने के लिए पूना में जब महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा सभा की स्थापना हुई और आचार्य काकासाहब कालेलकर की अध्यक्षता में 22 मई 1937 को पूना में महाराष्ट्र के रचनात्मक कार्यकर्ताओं, राजनीतिक और सांस्कृतिक नेताओं आदि का सम्मेलन संपन्न हुआ तब यहां महाराष्ट्र हिंदी प्रचार समिति के नाम से एक संगठन भी बनाया गया था.

जिसकी वजह से मुंबई तक इसका प्रभाव हुआ. आठ साल तक यह समिति, राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा से संबद्ध रही. भाषा विषयक सिद्धांत के मतभेद के कारण इस संगठन ने सम्मेलन तथा वर्धा समिति से संबंध तोड़ दिया. 12 अक्टूबर 1945 को महाराष्ट्र के प्रमुख कार्यकर्ताओं की एक बैठक हुई, जिसमें स्वतंत्र रूप से कार्य करने का निश्चय किया गया. संस्था अब " महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा सभा " के नाम से काम करने लगी. हिंदी को हालांकि लगभग हर काल में यहां काफी दिक्क्तों का सामना करना पड़ा था बावजूद मुंबई ने उसे आसरा दिया. यहीं से कई साहित्यकार निकले जिनका नाम देश भर में विख्यात हुआ. ख़ास महत्व हिंदी अखबारों का भी रहा जिसमें टाइम्स ग्रुप की कई पत्रिकाओं ने मुंबई में हिंदी को विस्तार दिया. इसी मध्य एक ऐसा नाम हिंदी में उभरा जिसने साहित्य की दुनिया में न केवल प्रचुरता हासिल की बल्कि मुंबई को भी हिंदी साहित्य से जोड़ दिया. वह नाम था धर्मवीर भारती का. धर्मवीर भारती हिंदी के लोकप्रिय साप्ताहिक पत्रिका धर्म युग के संपादक थे . और इनकी वजह से हिंदी को मुंबई में अपने पंख मिले. भारती जी को अपने उत्तम कार्यों तथा हिंदी की सेवा के लिए 1972 में पद्मश्री पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था.

इनकी लिखा उपन्यास " गुनाहों का देवता " सदाबहार रचना मानी जाती है और " सूरज का सातवां घोड़ा " को कहानी कहने का अनुपम प्रयोग माना जाता है. धर्मवीर भारती के अलावा राजनीतिक और साहित्यिक वरिष्ठ पत्रकार की बात करें तो डॉ राम मनोहर त्रिपाठी का नाम आता है. डॉ राममनोहर त्रिपाठी जी का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है. इनका मुंबई आगमन कवि सम्मेलन के चलते हुआ . इनके अंदर जन जन को मंत्रमुग्ध कर देने वाली वक्तृत्व कला. ईमानदार और पारदर्शी राजनेता के गुण तो थे ही साथ ही ये कलम के जागरुक सिपाही भी थे. ये धर्मयुग के उप संपादक भी रहे साथ ही कई अखबार में संपादक का कार्य भार भी संभाला और अनेकोे अखबारों के प्रकाशन में अपना यथोचित योगदान भी दिया. हिंदी भाषियों के लिए त्रिपाठी जी के कार्य आज तक इसीलिये स्मरण रखे जाते हैं क्योंकि उन्होंने हिंदी को मुंबई में उसके अस्तित्व के साथ स्थापित कर दिया था. वे 10 वर्ष नगरसेवक.18 वर्ष विधायक और तीन बार महाराष्ट्र में मंत्री रहे और व्यक्तिगत ईमानदारी और सामाजिक दायित्व का ऐसा शिखर कायम किया.जिसे छूना आज के राजनेताओं के लिए आसान काम नहीं है. उनके प्रयासों ने ही महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी की स्थापना कराई जिसके वे प्रथम अध्यक्ष भी बने थे. आज " महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी " का भारत भर में अपना सम्मानित स्थान है.

टाइम्स ग्रुप की पत्रिकाओं की वजह से मुंबई में जहां धर्मवीर भारती जैसे साहित्यकार दिए वहीं विद्यानिवास मिश्र जैसे गंभीर चिंतक तथा दर्शनशास्त्री जैसे विद्वान भी दिए. जिनके आलेख- जिनके सम्पादकीय पढ़ पढ़ कर मुंबई वासियों में हिंदी के प्रति विशेष प्रेम भी उमड़ा. पत्र पत्रिकाओं के अतिरिक्त मुंबई में हिंदी के प्रसार-प्रचार में मुंबई विश्वविद्यालय का भी महत्वपूर्ण स्थान रहा, यहां जो हिंदी भाषा भवन बनने वाला है उसके लिए सभी हिंदी प्रेमियों ने डॉ राम मनोहर त्रिपाठी का नाम दिया है. ये कहा जाए कि त्रिपाठी जी के बाद हिंदी को लेकर जिस तरह से रास्ता खुला उसने मुंबई में हिंदी को नई दिशा दी. जिसमे नंदकिशोर नौटियाल सहित डॉ. राम जी तिवारी जैसे हिंदी भाषाप्रेमींयों. साहित्यकारों के नाम दर्ज होते चले गए.

रामजी तिवारी मुंबई विश्वविद्यालय के पूर्व अध्यक्ष भी रह चुके हैं. वे देश के प्रमुख पत्रिकाओ मे अंग्रेजी और हिंदी में लिखते रहते हैं . साथ ही उन्होंने भी मुंबई में हिन्दी के प्रचार-प्रसार में अपना सक्रिय योगदान दिया है. ये कहें कि उनके अथक प्रयासों के चलते ही मुंबई के भाषा भवन में हिंदी घुस पाई है. बहरहाल, वर्तमानकाल में डॉ.करुणाशंकर उपाध्याय मुंबई विश्व विद्यालय के हिंदी विभाग में वरिष्ठ प्रोफेसर हैं.जिनकी छवि हिंदी के प्रख्यात आलोचक की है. उपाध्याय जी का हिंदी में योगदान महत्वपूर्ण है. साथ ही उनके इस योगदान की वजह से मुंबई में हिंदी भाषा को भी काफी आसरा प्राप्त हो रहा है. उनकी अब तक 17 मौलिक और 12 संपादित पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं.आपने विश्व स्तर पर हिंदी की आद्यंत स्थिति पर " हिंदी का विश्व संदर्भ " पुस्तक लिखी है जो न केवल बहुचर्चित रही है अपितु उसे विश्व के सबसे बड़े अखबार दैनिक जागरण ने 10 जनवरी 2017 को अपने सारे संस्करणों में मुख्य खबर बनाई थी. उन्ही के प्रयासों से मुंबई विश्वविद्यालय में हिंदी भाषा भवन के निर्माण के लिए महाराष्ट्र सरकार ने 5 करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत की थी जिसका भूमि पूजन भी हो चुका. इसी फेहरिस्त में विश्वनाथ सचदेव को मुंबई में धुरंधर साहित्यकार और पत्रकार के रूप में जाना जाता है. इन्होंने कई पत्र-पत्रिकाओं का संपादन कार्य किया है.

विश्वनाथ जी एक अच्छे कवि और लेखक के रूप में भी जाने जाते हैं " हिंदी साहित्य का एक दशक " और " समता का दर्शन " जैसी कई रचनाएं साहित्य जगत को दी है. फ़ीरोज़ अशरफ जैसे लेखक जो मुंबई में समाजसेवी पत्रकार के रूप में भी जाने जाते हैं. हिंदी को मुंबई में स्थापित करने के लिए महत्वपूर्ण कड़ी बने. ये निरंतर आकाशवाणी. दूरदर्शन सहित कई पत्र-पत्रिकाओं में लिखते रहते हैं. इसी तरह डॉ दयानंद तिवारी मुंबई के प्रखर वक्ता. राजनीतिज्ञ.व्याख्यात प्रोफेसर के रूप में जाने जाते हैं. कहने का तात्पर्य ये है कि इन सब लेखकों और पत्रकारों के अलावा इतिहास में दर्ज आजादी के मतवालों ने समय समय पर मुंबई का रुख करते हुए यहां हिंदी को स्थापित करने का काम किया. आज कई महान विभूतियां हैं जो निरंतर हिंदी के विकास में जुटी हुई हैं. आज की हालत तो हिंदी के लिए काफी अच्छी मानी जाती है. मुंबई में हिंदी अब यहां का हर बाशिंदा जानता है और ये सबसे बड़ी हिंदी की उपलब्धि मानी जा सकती है.

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