स्मृति शेष. हिन्दुस्तान के नौवें राष्ट्रपति डॉ शंकरदयाल शर्मा, शैक्षिक लक्ष्य के प्रति समर्पण और अपनी सादगी के लिए हमेशा याद किए जाएंगे. सार्वजनिक जीवन में राजनीतिक समझबूझ उनसे सीखी जा सकती है. भोपाल में 19 अगस्त, 1918 को वैद्य खुशीलाल शर्मा के घर में जन्मे डॉ शर्मा मध्य प्रदेश के पहले ऐसे व्यक्ति रहे, जो अपनी विद्वता और जनसेवा के दम पर भारत के राष्ट्रपति बने. 

डॉ शर्मा की प्रारंभिक शिक्षा भोपाल के दिगम्बर जैन स्कूल में हुई. इसके बाद सेंट जोंस कॉलेज, आगरा, इलाहाबाद विश्वविद्यालय और लखनऊ विश्वविद्यालय में अध्ययन करते हुए एलएलबी की उपाधि प्राप्त की. उन्होंने अंग्रेजी साहित्य, संस्कृत और हिन्दी में स्नातकोत्तर उपाधियाँ अर्जित की थीं. इसके बाद उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैण्ड गए. वहाँ कानून की शिक्षा लेकर पीएचडी की उपाधि प्राप्त की. थोड़े समय तक कैम्ब्रिज विश्व विद्यालय में कानून के आचार्य रहने के बाद वे हिन्दुस्तान लौट आए और लखनऊ विश्वविद्यालय में कानून का अध्यापन कार्य करते रहे. 7 मई 1950 को डॉ शर्मा का विवाह जयपुर में विमला देवी के साथ सम्पन्न हुआ. अध्यापन के दौरान डॉ. शर्मा पर उस समय की देश की परिस्थियों का काफी प्रभाव पड़ा. जब सम्पूर्ण राष्ट्र स्वतंत्रता आंदोलन के रंग में रंगा था तो भला डॉ शर्मा कैसे पीछे रह सकते थे? सन् 1942 में महात्मा गांधी के आह्वान पर भारत छोड़ो आंदोलन के तहत डॉ शर्मा भी सिपाही बने, उन्हें भोपाल की अदालत ने जेल की सजा सुनाई. उन्हें दूसरी बार जेल तब भेजा गया जब 1948 में भोपाल स्टेट का भारतीय गणतंत्र में विलय हेतु आंदोलन किया गया. स्वतंत्रता संग्राम में और भोपाल रियासत के विलय के आन्दोलन में उन्होंने  सक्रिय भाग लिया और जेल की यातनाएँ सहीं. हिन्दुस्तान के आजाद होने पर वे 1952 से 1956 तक भोपाल राज्यसभा के सदस्य चुने गए और प्रथम मुख्यमंत्री भी बने. सन् 1956 में लोकसभा के सदस्य चुने गए और केन्द्र सरकार में संचार मंत्री बने. 1971 में वे पाँचवीं लोकसभा के लिए भी चुने गए.

वे 1950-1952 तक भोपाल कांग्रेस कमेटी और 1967-1968 तक मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहे. सन् 1968 से 1972 तक वे कांग्रेस के जनरल सेक्रेटरी रहे और 1972-1974 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष निर्वाचित हुए.

डॉ शर्मा 21 अगस्त, 1987 को उपराष्ट्रपति पद पर निर्विरोध निर्वाचित हुए और 3 सितंबर, 1987 को पद की शपथ ग्रहण की. इसके पश्चात डॉ शर्मा 16 जुलाई, 1992 को राष्ट्रपति पद के लिये निर्वाचित हुए और 25 जुलाई, 1992 को उन्होंने देश के सर्वोच्च पद की शपथ ग्रहण की. इससे पूर्व वे आंध्र प्रदेश, पंजाब तथा महाराष्ट्र के राज्यपाल के पद पर भी रहे थे. साहित्य, कला और विज्ञान में उन्होंने जो बहुमुखी प्रतिभा का प्रदर्शन किया वह युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणास्पद् है. 26 दिसंबर, 1999 को दिल का दौरा पडऩे के कारण उनका देहांत हो गया. वे न केवल स्वयं नियम-कानून का सख्ती एवं सम्मान से पालन करते थे बल्कि औरों से भी यही अपेक्षा रखते थे. 

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