नई दिल्ली. देश के पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी अब हमारे बीच नहीं रहे. अटल बिहारी वाजपेयी असल में, अपने करियर के शुरुआती दौर में वे और बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी, दोनों पत्रकार थे. अटल बिहारी राजनीति में कैसे आए इसके पीछे एक प्रेरणादायक कहानी है. एक स्कूल टीचर के घर में पैदा हुए वाजपेयी के लिए जीवन का शुरुआती सफर आसान नहीं था. 25 दिसंबर 1924 को ग्वालियर के एक निम्न मध्यमवर्ग परिवार में जन्मे वाजपेयी की प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा ग्वालियर के ही विक्टोरिया ( अब लक्ष्मीबाई ) कॉलेज और कानपुर के डीएवी कॉलेज में हुई थी..उन्होंने राजनीति विज्ञान में पोस्ट ग्रेजुएशन किया और पत्रकारिता में अपना करियर शुरू किया.

उन्होंने राष्ट्रधर्म, पॉन्चजन्य और वीर अर्जुन जैसे अखबारों-पत्रिकाओं का संपादन किया. वे बचपन से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ गए थे और इस संगठन की विचारधारा (राष्ट्रवाद या दक्षिणपंथ) के असर से ही उनमें देश के प्रति कुछ करने, सामाजिक कार्य करने की भावना मजबूत हुई. इसके लिए उन्हें पत्रकारिता एक बेहतर रास्ता समझ में आया और वे पत्रकार बन गए. खुद अटल बिहारी ने बताई प्रेरणा उनके पत्रकार से राजनेता बनने का जो जीवन में मोड़ आया, वह एक महत्वपूर्ण घटना से जुड़ा है. इसके बारे में खुद अटल बिहारी ने वरिष्ठ पत्रकार तवलीन सिंह को एक इंटरव्यू में बताया था. इस इंटरव्यू में वाजपेयी ने बताया था कि वे बतौर पत्रकारिता अपना काम बखूबी कर रहे थे. 1953 की बात है, भारतीय जनसंघ के नेता डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी कश्मीर को विशेष दर्जा देने के खिलाफ थे.

जम्मू-कश्मीर में लागू परमिट सिस्टम का विरोध करने के लिए डॉ. मुखर्जी श्रीनगर चले गए. परमिट सिस्टम के मुताबिक किसी भी भारतीय को जम्मू-कश्मीर राज्य में बसने की इजाजत नहीं थी. यही नहीं, दूसरे राज्य के किसी भी व्यक्ति को जम्मू-कश्मीर में जाने के लिए अपने साथ एक पहचान पत्र लेकर जाना अनिवार्य था. डॉ. मुखर्जी इसका विरोध कर रहे थे. वे परमिट सिस्टम को तोड़कर श्रीनगर पहुंच गए थे. इस घटना को एक पत्रकार के रूप में कवर करने के लिए वाजपेयी भी उनके साथ गए. वाजपेयी इंटरव्यू में बताते हैं, 'पत्रकार के रूप में मैं उनके साथ था. वे गिरफ्तार कर लिए गए. लेकिन हम लोग वापस आ गए.

डॉ. मुखर्जी ने मुझसे कहा कि वाजपेयी जाओ और दुनिया को बता दो कि मैं कश्मीर में आ गया हूं, बिना किसी परमिट के. इस घटना के कुछ दिनों बाद ही नजरबंदी में रहने वाले डॉ. मुखर्जी की बीमारी की वजह से मौत हो गई. इस घटना से वाजपेयी काफी आहत हुए. वह इंटरव्यू में कहते हैं, मुझे लगा कि डॉ. मुखर्जी के काम को आगे बढ़ाना चाहिए. इसके बाद वाजपेयी राजनीति में आ गए. वह साल 1957 में वह पहली बार सांसद बनकर लोकसभा पहुंचे.

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