भारत की आजादी की लड़ाई कई लोगों ने मिलकर लड़ी. लेकिन हम कुछ प्रमुख नेताओं और क्रांतिकारियों के बारे में ही जानते हैं. उनके अलावा भी बहुत से ऐसे लोग थे जिन्होंने देश की आजादी के सपने को सच बनाने के लिए अपनी जान तक की बाजी लगा दी. उनमें से कई देश की आजादी को देखने के लिए जिंदा भी नहीं रहे. लेकिन भारत में उनका आजादी का योगदान कहीं से भी कम नहीं माना जा सकता. ऐसे ही कुछ लोगों के बारे में आजादी की वर्षगांठ पर हम आपको बता रहे हैं. तिरुपुर कुमारन तिरुपुर, कोयंबटूर के पास एक कस्बा है. यहीं कुमारन का घर है. 1932 में कुमारन ने अंग्रेजों के खिलाफ एक विरोध मार्च निकाला था.

जिसमें वे भारतीय झंडे को लेकर आगे-आगे चल रहे थे. भारतीय झंडे को ब्रिटिश सरकार ने बैन कर रखा था. कुमारन को भारतीय झंडा लेकर आगे-आगे चलते देख ब्रिटिश सैनिक भड़क गये और वे विरोध मार्च में शामिल भारतीयों को पीटने लगे. पिटने वाले भारतीयों में कुमारन सबसे आगे थे. कुमारन पिटते रहे पर उन्होंने भारतीय झंडे को नीचा नहीं होने दिया. लगातार मार खाते हुए भी कुमारन ने हाथ में पकड़े हुए झंडे को ऊंचा उठाये रखा. यहां तक कि कुमारन मार खाते-खाते जब बेहोश होकर जमीन पर गिरे तब भी वे झंडा ऊपर उठाये हुए थे.

कुमारन ने जमीन पर गिरने के बाद कुछ ही देर में दम तोड़ दिया पर उन्होंने झंडे को जमीन पर नहीं गिरने दिया. इस घटना के चलते कुमारन को 'कोडी काथा कुमारन' कहा जाने लगा, माने राष्ट्रीय ध्वज का रक्षक कुमारन' कमलादेवी चट्टोपाध्याय 3 अप्रैल, 1903 को पैदा हुई कमलादेवी एक समाजसुधारक और स्वतंत्रता सेनानी थीं. कमलादेवी चट्टोपाध्याय को भारतीय हस्तकला, हथकरघा और थियेटर के पुनर्जागरण में अपनी प्रमुख भूमिका के चलते भी जाना जाता है. उन्होंने भारतीय महिलाओं के सामाजिक-आर्थिक आधार को कॉपरेटिव आंदोलन के जरिए उठाने की शुरुआती कोशिश भी की. जबकि, स्वतंत्रता आंदोलन में भी उनके योगदान को अनदेखा नहीं किया जा सकता है. 20 साल की उम्र में कमलादेवी की शादी हो गई थी.

1923 में जब उन्होंने पहली बार महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के बारे में सुना तब वे लंदन में थी. महात्मा गांधी के इस प्रयोग के बारे में सुनकर वे उनसे इतनी प्रभावित हुईं कि तुरंत ही भारत चली आईं और 'सेवा दल' ज्वाइन कर लिया. यह एक ऐसा संगठन था जो समाज के उत्थान के लिए गांधी जी के विचारों के आधार पर काम करता था. 1926 में वह मार्गेट ई कजिन्स से मिलीं. जो कि ऑल इंडिया वीमेंस कांफ्रेंस (AIWC) की संस्थापक थीं.

उनसे वे मद्रास प्रॉविन्स की लेजिस्लेटिव असेंबली के चुनावों में शामिल होने के लिए प्रेरित हुईं. साथ ही कमलादेवी ही वह पहली औरत थीं जिन्हें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान गिरफ्तार किया गया. यह तब हुआ जब वे बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज में नमक के पैकेट बेचने के लिए घुस गई थीं. इसके बाद उन्हें कम से कम एक साल जेल में रहना पड़ा. खुदीराम बोस खुदीराम बोस की कहानी ऐसी है जो हम भारतीयों में एक साथ ही गर्व और करुणा दोनों भावनाएं पैदा करती है. वे केवल 18 साल के थे जब उन्हें भारत की आजादी की लड़ाई में योगदान के चलते उन्हें फांसी पर चढ़ना पड़ा. 1906 में मिदनापुर में लगी औद्योगिक व कृषि प्रदर्शनी में प्रतिबंध की अवज्ञा करके खुदीराम ने ब्रिटिश विरोधी पर्चे बांटे थे. जिसके चलते एक सिपाही ने उन्हें पकड़ने की कोशिश की थी. जिसके मुंह पर उन्होंने एक जोरदार घूसा मारा था और 'साम्राज्यवाद मुर्दाबाद' का नारा लगाते हुए भाग निकले थे.

अगले ही साल 28 फरवरी को पकड़े गये तो भी पुलिस को चकमा देकर भागने में सफल रहे थे. दो महीनों बाद अप्रैल में फिर पकड़ में आए तो उन पर राजद्रोह का अभियोग चलाया गया था, लेकिन एक तो उनकी उम्र कम थी और दूसरे उनके खिलाफ एक भी गवाह नहीं मिला, इसलिए 16 मई को महज चेतावनी देकर छोड़ दिए गए थे. इसके बाद 6 दिसंबर, 1907 को उन्होंने दल के ऑपरेशनों के तहत नारायणगढ़ रेलवे स्टेशन के पास बंगाल के गवर्नर की विशेष ट्रेन और 1908 में अंग्रेज अधिकारियों वाट्सन और पैम्फायल्ट फुलर पर बम फेंके. लेकिन अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण क्रांतिकारी ऑपरेशन को उन्होंने 20 अप्रैल, 1908 को अंजाम दिया. यह ऑपरेशन बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के सत्र न्यायाधीश किंग्सफोर्ड की हत्या से संबंधित था. दरअसल, बंग भंग के वक्त किंग्सफोर्ड कलकत्ता में मजिस्ट्रेट था और उसने वहां आंदोलन करते हुए पकड़े गए क्रांतिकारियों को जानबूझकर एक से बढ़कर एक क्रूरतम सजाएं दी थीं. इससे खुश ब्रिटिश सत्ता ने उसे पदोन्नत करके मुजफ्फरपुर का सत्र न्यायाधीश बना दिया था.

खुदीराम बोस ने अपने साथी प्रफुल्ल चाकी के साथ मिलकर किंग्सफोर्ड को मारने का प्लान बनाया. और उसे मारने के लिए उनकी गाड़ी पर बम फेंका. लेकिन जिस गाड़ी पर उन्होंने बम फेंका उसमें बैरिस्टर प्रिंगले कैनेडी की पत्नी और बेटी थे. दरअसल किसी काम से किंग्सफोर्ड रुक गये थे और गाड़ी में नहीं बैठे थे. कार में मौजूद लोग मारे गये. खुदीराम बोस और उनके साथी प्रफुल्ल चाकी इस घटना के बाद वहां से भागे और सीधे 25 मील दूर वैनी स्टेशन पर जाकर रुके लेकिन तब तक वहां भी पुलिस को खबर हो गई थी और उऩ्हें दो अफसरों ने गिरफ्तार कर लिया. जिसके बाद 11 अगस्त, 1908 को खुदीराम बोस को फांसी दे दी गई.

प्रफुल्ल चाकी भी एक मुठभेड़ के दौरान मार दिए गये. पीर अली खान पीर अली खान अंग्रेजों के खिलाफ हुई 1857 की क्रांति में शामिल थे. वे उत्तरप्रदेश के आजमगढ़ जिले के मुहम्मदपुर में पैदा हुए थे. जब वे मात्र सात साल के थे तभी घर से भाग गये थे. और भागकर पटना आ गये थे. जहां एक जमींदार ने उन्हें आश्रय दे दिया था. उन जमींदार ने पीर अली को अपने बेटे की तरह ही पालकर बड़ा किया और वैसी ही शिक्षा भी दी थी. पीर ने पटना में एक किताबों की दुकान खोल रखी थी.

जो कि स्वतंत्रता सेनानियों के मिलने का अड्डा बन गई थी. और यहीं बैठकर वे अंग्रेजों के खिलाफ प्लान बनाया करते थे. इस दुकान पर क्रांतिकारी आपस में ही सूचनाएं एक-दूसरे को नहीं देते थे बल्कि अंग्रेजों के भेद अंग्रेजी सेना के भारतीय सिपाहियों से भी लिया करते थे. अली भी अंग्रेजों के खिलाफ लगातार संघर्ष करते रहते थे. और वे 1857 के संघर्ष में भी शामिल थे. एक बार जब वे दानापुर कैंटोनमेंट के सैनिकों के साथ अंग्रेजों के खिलाफ प्लान तैयार कर रहे थे, उनके दो पत्र अंग्रेजों के हाथ लग गये. जिससे उन्हें पीर अली की साजिश का पता चल गया.

अली को भी अंदाजा हो गया था कि क्या हुआ है! इसलिये उन्होंने अंग्रेजों पर हमला करने की ठान ली और उन सारे लोगों को अपने साथ इकट्ठा कर लिया जो भी अंग्रेजों के खिलाफ थे. उन्होंने अपने साथी मौलवी मेंहदी के साथ 50 बंदूकों का इंतेजाम किया और अपने ग्रुप के लोगों में उन्हें बांट दिया. लेकिन पीर अली का प्लान सफल नहीं हो सका. और 4 जुलाई, 1857 को उन्हें अपने 33 समर्थकों के साथ गिरफ्तार कर लिया गया. इनमें से ज्यादातर लोगों को अगले ही दिन बिना किसी सुनवाई के फांसी दे दी गई. पीर अली को पूछताछ के दौरान बुरी तरह मारा-पीटा गया. आखिर में 7 जुलाई को उन्हें भी फांसी दे दी गई.

मातंगिनी हाजरा ब्रिटिश भारत की बंगाल प्रेसीडेंसी के तमलुक (पहले मिदनापुर) से आने वाली मातंगिनी हाजरा नागरिक अवज्ञा आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन की प्रमुख कार्यकर्ता थीं. उन्होंने जो काम किये उसके प्रभाव आज भी देखे जा सकते हैं. 19 अक्टूबर, 1870 को वे एक गरीब परिवार में पैदा हुई थीं. उनकी शिक्षा भी ढंग से नहीं हुई थी. साथ ही बहुत जल्द ही उनकी शादी हो गई थी और 18 साल की उम्र में वे विधवा भी हो गई थीं. 1905 में हाजरा ने भारतीय स्वतंत्रता की लड़ाई में पूरी तरह से शामिल हो गईं. 1932 में उन्होंने नागरिक अवज्ञा आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया. और इसके बाद उन्होंने महात्मा गांधी के साथ दांडी यात्रा पर जाने के लिए गिरफ्तार भी किया गया. दांडी यात्रा के दौरान महात्मा गांधी उन्होंने नमक बनाकर अंग्रेजों का नमक कानून तोड़ा था.

तब नमक बनाना गैर-कानूनी था. हाजरा को इसके लिए 6 महीने बहरामपुर जेल में डाल दिया गया. एक दशक बाद, 1942 में वे गांधी जी के चलाए भारत छोड़ो आंदोलन का भी हिस्सा थीं. इसका उद्देश्य था कि अंग्रेज अपना शासन खत्म करें और भारत छोड़कर चले जायें. हाजरा जो उस वक्त 71 साल की थीं उन्होंने इस दौरान 6 हजार समर्थकों के साथ एक रैली का नेतृत्व किया. इनमें से ज्यादा महिला कार्यकर्ता थीं और ये तमलुक पुलिस स्टेशन पर कब्जा करने जा रही थीं. चूंकि हाजरा सबसे आगे चल रही थीं तो जब ब्रिटिश सैनिकों ने महिलाओं को रोकने के लिए गोली चलाई तो एक गोली हाजरा को भी लगी. बाद में उनकी गोली के घाव के चलते मौत हो गई.

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