इन दिनों. राजस्थान में राहुल गांधी ही कांग्रेस के दूल्हा होंगे. मुख्यमंत्री के लिए कांग्रेस ने कोई चेहरा आगे नहीं किया है. नगाड़ा बजा दिया है कि राहुल गांधी के नेतृत्व में ही चुनाव लड़ा जाएगा. मुख्यमंत्री का चुनाव जीत के बाद होगा. सचिन पायलट बम बम हैं. उन्हें लग रहा है कि जीत के बाद लॉटरी उनके नाम की ही खुलेगी. वे खुद को राहुल गांधी का ज्यादा करीबी मानते हैं. लेकिन जिस सेना का कोई सेनापति ही न हो, वह सेना रणभूमि में जंग कैसे लड़ेगी. पंजाब में नेता घोषित करने से मिली जबरदस्त जीत और गुजरात में स्थानीय नेताओं को दरकिनार करके राहुल गांधी के नेतृत्व में चुनाव लड़ने से मिली हार से भी कांग्रेस ने सबक नहीं सीखा. सवाल यही है कि राजस्थान का चुनाव कांग्रेस बिना नेता के कैसे जीत पाएगी. मामला मुश्किल है.

समझ में नहीं आ रहा कि राहुल गांधी आखिर क्यों लगातार हार पर हार के तमगे अपनी छाती पर चिपकाना चाहते हैं. उनके नेतृत्व में कांग्रेस अब तक कोई बड़ा चुनाव नहीं जीत पाई है. गुजरात उनकी 29वीं हार था. कर्नाटक 30वीं हार और लोकसभा में सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव में 31वीं हार के तत्काल बाद राज्यसभा में उपसभापति के ताजा चुनाव में आंकड़े साथ होने के बावजूद हुई कांग्रेस की पराजय उनके नेतृत्व में 32वीं बड़ी हार है. फिर भी खुद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और उनकी माता सोनिया गांधी से ले कर सचिन पायलट तक, पता नहीं, सारे के सारे क्यूं माने बैठे हैं कि राजस्थान में कांग्रेस तो जीती हुई है. सचिन पायलट अपनी अध्यक्षता पर आत्ममुदित है. प्रदेश कांग्रेस के मुखिया होने के कारण उन्हें लग रहा है कि वे सारे राजस्थान के कांग्रेसियों के दिलों पर राज कर रहे हैं. लेकिन उनके इसी आत्मुगध भाव ने उन्हें सिर्फ और सिर्फ गुर्जरों का नेता बना डाला है. लेकिन गुर्जर भी पूरे कहां उनके साथ हैं. सचिन पायलट कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला की बेटी सारा के पति हैं. फारुख अब्दुल्ला के जंवाई होने के नाते यह मान बैठे हैं कि राजस्थान का पूरा मुसलमान भी उनके साथ आएगा. लेकिन अगर साथ देने का पैमाना यही है, तो फिर राजस्थान में दरअसल, जितने गुर्जर सचिन के साथ है, उतने ही वसुंधरा राजे के साथ भी हैं. क्योंकि वसुंधरा राजे के बेटे सांसद दुष्यंत सिंह की पत्नी निहारिका सिंह भी तो गुर्जर समाज की बेटी हैं. सचिन असल में, ना तो अपने पिता राजेश पायलट की तरह किसानों के नेता बन पाए और ना ही ओबीसी के. पूरी कांग्रेस का नेता बनना तो बहुत दूर की बात है. बीते चार सालों में जिस तरह से सचिन पायलट की कार्यशैली रही है, उसके हिसाब से लिखकर रख लीजिए कि कांग्रेस का ब्राह्मण, मीणा, माली, जाट, मुसलमान और दलित समाज का परंपरागत वोटर भी सचिन पायलट का चेहरा देखकर वोट देनेवाला नहीं है. राजस्थान में आज भी अशोक गहलोत ही कांग्रेस के सबसे बड़े और सबसे सम्मानित नेता माने जाते है. साथ ही उन्हीं के नाम पर सारी जातियों के वोटर गोलबंद हो सकते हैं. इस तथ्य को जानकर ही कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने संभवतया सचिन का नाम आगे नहीं किया है. और खुद के नेतृत्व में चुनाव का ऐलान किया है. मगर एक बात यह भी है कि कांग्रेस के एक बहुत बड़े तबके को साफ तौर से लग रहा है कि राहुल गांधी का राजस्थान में अपनी लीडरशिप में चुनाव लड़ने के पीछे परोक्ष रूप से सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाने का प्लान है. जातियों के जबरदस्त जंजाल में जकड़े राजस्थान के मतदाता को इतना बेवकूफ मत समझिये, कि वह राहुल गांधी की लीडरशिप के लबादे में लिपटे सचिन को सहजता से स्वीकार करके कांग्रेस को थोक के भाव वोट देकर जिता देगा. ऐसे में तो कांग्रेस राजस्थान में दो सौ में से साठ का आंकड़ा भी पार जाए, तो किस्मत की बात.

वैसे, राजस्थान की राजनीति की धाराओं को जाननेवाले इस बात को भी जान रहे हैं कि राजस्थान के वोटर को तस्वीर साफ चाहिए. नेता कौन होगा, चुनाव कौन लड़वाएगा, कौन सीएम बनेगा और कौन ग्राउंड पर काम करेगा. तब जाकर वह साथ देने के लिए समर्थन का हाथ आगे बढ़ाता है. बीजेपी में नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने इस बात को काफी पहले ही समझ लिया था. इसीलिए चुनाव से बहुत पहले ही वसुंधरा राजे को विजय का विश्वास देकर गौरव यात्रा पर रवाना कर दिया. लेकिन कांग्रेस का कार्यकर्ता में भ्रम है. वह असमंजस में भी है और अविश्वास में भी. आखिरकार, नेतृत्व कौन करेगा, इस चिंता में भी. टिकट मांगनेवाले हैरान हैं कि कहां जाकर गुहार लगाएं, किससे अपनी लॉबिंग करें और किसके साथ रहें. जिलों के नेता परेशान हैं कि किसकी सुनें और कहां जाकर अपना रोना रोएं.

पता नहीं, फिर भी सचिन पायलट और राहुल गांधी फिजूल की इस गलतफहमी में क्यों है कि बहुमत से जीत जाएंगे और सरकार भी बना लेंगे. कोई राहुल गांधी को यह समझाए कि राजस्थान में चाहे जाट हो या माली. ब्राह्यण हो या ओबीसी. या मुसलमान हो कि दलित. सारे के सारे अशोक गहलोत और सीपी जोशी जैसे जमीन से जुड़े पुराने नेताओं के स्थापित नेतृत्व के अलावा किसी पर भरोसा नहीं करने वाले. इसलिए आज के हालात में तो कांग्रेस की तस्वीर खाली खाली सी है. राहुल गांधी ने भले ही अपना नाम आगे कर दिया हो, लेकिन राहुल के नाम से तो राजस्थान में तो वोट मिलने से रहे. अपना मानना है कि खाली फ्रेम को कोई अपना शीश नहीं नंवाता. श्रद्धांजली देने और फूल चढ़ाने के लिए भी तस्वीर में कोई तो चेहरा चाहिए. फिर यहां तो अपना अमूल्य वोट देने की बात है. सो कोई तो चेहरा सामने होना ही चाहिए. आप क्या मानते हैं ?

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