इन दिनों. सफल मदारी किसे कहेंगे? डुगडुगी बजाने वाले को? मजमा इकट्ठा करने वाले को? लच्छेदार बातों में उलझाए रखने में निपुण शख्स को? नहीं. मदारी की सफलता मजमे के अंत पर निर्भर करती है. जब वह भीड़ से पापी पेट का सवाल करते हुए पैसा मांगता है. 99 प्रतिशत से अधिक मौकों पर उसके ऐसा करते ही भीड़ छंटने लगती है. गिनती के लोग ही उसे पैसे देते हैं. लेकिन पैसा मांगते समय भी भीड़ ज्यों की त्यों ही बनी रहे तो इसे मदारी की सफलता कहा जाता है. इस लिहाज से शिवराज कमलनाथ वाले मदारी हों या न हों, लेकिन राजनीति के सफल मदारी कहे जा सकते हैं. 

जनआशीर्वाद यात्रा को आप किसी मदारी के खेल की तरह लीजिए. शिवराज ने इस पांच साल में भी लगातार मजमा एकत्र किया. अब उसका वह चरण आ गया है, जब इसके बदले उन्हें वोट की दरकार है और इस मुख्यमंत्री की यही कामयाबी है कि इस चरण पर भीड़ छंटने की बजाय बढ़ती ही जा रही है. नाथ की चिंता वाजिब है. क्योंकि वह एंटी इनकम्बेंसी के भरोसे किसी परिवर्तन की उम्मीद में थे.  आखिर तेरह साल से लगातार एक मुख्यमंत्री और फिर भी उसकी लोकप्रियता में कमी नहीं. ज्योति बसु और नरेन्द्र मोदी के बाद भारतीय राजनीति में यह दूसरा उदाहरण हो सकता है. इंदिरा गांधी सहित कांग्रेस के तमाम लोकप्रिय कहे जाने वाले नेताओं को जनता विकल्प के अभाव के बावजूद दस साल में तो झटका दे ही देती थी. लेकिन आप शिवराज की जनआशीर्वाद यात्रा को देखिए, गजब रिस्पांस. अब भी लोग वैसे ही बेताब हैं जैसे 2008 या 2013 में दिखे थे. 2018 में भी कुछ बदलता नजर नहीं आ रहा है. ऐसा उदाहरण मध्यप्रदेश में तो शिवराज सिंह चौहान के अलावा भला और कौन हो सकता है.

माना जा सकता है कि जन आशीर्वाद यात्रा में जो भीड़ उमड़ रही है, उसे संगठन की ताकत या सत्ता के दुरूपयोग से भी लाया जा रहा हो, लेकिन इस भीड़ में जो उत्साह प्रदर्शित होता है, वो भला कैसे प्रयोजित हो सकता है? नहीं पता कि जनता एक नेता से कब उकता जाती है लेकिन उसे उकताते तो देखा है. पर ये शिवराज में क्या बात है? अभी भी लोगों में दीवानापन. हाथ मिलाने से लेकर छूने तक की बेकरारी. रात दो-दो बजे तक सड़कों पर हुजूम. क्या कारण हो सकते हैं? केवल मध्यप्रदेश ही नहीं, देश भर में भाजपा ने पिछले दो दशकों में अपनी पहचान में व्यापक परिवर्तन किया है. ब्राह्मण, बनियों की पार्टी ने अपनी प्रो बहुसंख्यक हितेषी पहचान में भले ही कोई बदलाव नहीं किया हो लेकिन उक्त पहचान से तो छुटकारा पा ही लिया है.

इस मध्यप्रदेश में ही जहां, आदिवासी, दलितों, अल्पसंख्यक और पिछड़ों की राजनीति करती आई कांग्रेस ने 1956 के पहले या बाद में कब इन वर्गों में से किसी को मुख्यमंत्री बनने का मौका दिया. कांग्रेस भी तो ब्राह्मण, ठाकुर और बनियों से बाहर कहां आ पाई. द्वारका प्रसाद मिश्र से लेकर प्रकाशचंद्र सेठी और मोतीलाल वोरा  से लेकर दिग्विजय सिंह तक सारे नामों पर गौर कर लीजिए. लेकिन 2003 के बाद भाजपा की मध्यप्रदेश में सरकारों पर गौर कीजिए. उमा भारती, बाबूलाल गौर और फिर शिवराज सिंह चौहान. तीनों पिछड़े वर्ग से. तीनों में से किसी के हिस्से में पैदा होते ही सोने-चांदी का चम्मच नहीं गया. तीनों संघर्ष और संगठन से गढ़े हुए नेता. किसी की मेहरबानी से कोई मुख्यमंत्री नहीं बना. तो लोकप्रियता का एक पैमान तो यह होगा ही.

भाजपा ने अपनी जो पहचान बदली सो बदली, शिवराज ने मध्यप्रदेश में तो पार्टी और सरकार दोनों पूरी पहचान ही बदल कर रख दी. बच्ची के पैदा होने से लेकर उसकी शादी ब्याह और बच्चों के जन्म तक के प्रबंध तो शिवराज ने अपने पहले कार्यकाल के तीन सालों में ही कर दिए थे. जिन तीन मुद्दों को लेकर भाजपा प्रदेश की सत्ता में आई थी, सड़क, पानी और बिजली के मामले में सबसे पहले लोगों को संतुष्ट किया गया. आप आज भी मध्यप्रदेश पर चढ़े हुए कर्जे की चाहे जितनी चिंता कर लो, इन मूलभूत सुविधाओं की अनदेखी तो अभी भी नहीं हो रही है. इसके अलावा सरकार के नीतिगत फैसलों में लोगों की राय जानने के लिए तमाम तरह की पंचायतों का जो सिलसिला शिवराज ने शुरू किया, उसने भी लोगों का उनमें भरोसा कायम रखा. लोगों को मुख्यमंत्री निवास बुलाकर बात करना, तो एक बात है, लगातार हर परिस्थिति में जनता से कनेक्ट होने का कोई भी मौका खोना शिवराज जानते ही नहीं है. चाहे पेटलावद में विस्फोटकों से उपजे गुस्से का मामला हो या फिर मंदसौर में पुलिस की गोली से मारे गए आंदोलनकारी किसान हों, शिवराज ने हमेशा जनता के गुस्से का पूरा सम्मान किया. नाराज लोगों के बीच जाना क्या आसान हो सकता है. शिवराज इस मामले में माहिर हैं.

शायद मध्यप्रदेश के लोगों ने पहली बार एक ऐसा मुख्यमंत्री देखा है जो अपने लोगों की नाराजगी से डरता है. या कहना यह चाहिए कि लोगों के गुस्से और असंतोष का सम्मान करना जानता है. भावांतर भुगतान योजना की चाहे कोई कितनी ही आलोचना करें, किसानों के खाते में उनकी फसल की वाजिब कीमत तो शिवराज ने पहुंचा ही दी. समाज के हर तबके के सीधा लाभ देने की जो कोशिश शिवराज सिंह चौहान ने अपनी सरकार के पहले दिन से आज तक जारी रखी है, शायद वो ही एक बड़ा कारण है कि जनता में उनका आकर्षण लगातार बना हुआ है. कांग्रेस की सरकार ने अर्जुन सिंह के कार्यकाल में लोगों को झुग्गी झोपड़ी के पट्टे और एक बत्ती कनेक्शन मुफ्त देकर गंदगी में बसने का सर्टिफिकेट दिया था. 

लेकिन शिवराज तक आते-आते झुग्गियों की जगह पक्के मकानों की योजना आ गई. गरीबी की रेखा के नीचे वालों को संबल योजना में शिवराज मुफ्त की बिजली तो नहीं बांट रहे हैं लेकिन नाम मात्र के दो सौ रुपए देकर भी अगर सौ युनिट बिजली दे रहे हैं तो क्या यह गरीब कल्याण का कार्यक्रम नहीं होगा. गुरूजी से लेकर अध्यापक तक, पंचायत सचिव से लेकर आंगनवाड़ी कार्यकर्ता तक अगर शिवराज ने सबकी चिंता की है तो शायद अब लोग उनकी चिंता करने लगे हों. आखिर 13 साल से मुख्यमंत्री हैं शिवराज लेकिन न तो गाल फूले हैं, न पेट निकला हैं, न दिन देखे न रात, दिन रात जनता की चिंता में अगर लगा हो, जो जागते हुए भी मध्यप्रदेश की बेहतरी के सपने देखें तो बनता तो हैं उसका हक. जब अपनी सभाओं में शिवराज ये सब दौहराते हैं तो जाहिर हैं जिन लोगों को सरकार की ऐसी योजनाओं का लाभ मिल रहा है, वो भरपूर रिस्पांस तो करेंगे ही ना. 

चाहे अब शिवराज को देखते सुनते तेरह साल हो गए हों और अभी भी संभावनाएं यथावत बनी है तो मेहनत शिवराज की ही है. अब अगर कमलनाथ शिवराज को मदारी कह रहे हैं तो जाहिर है शिवराज भी अपने को लोकप्रिय मदारी साबित करने की चुनौती स्वीकार कर रहे हैं. अब इस मदारी के तीन खेल तो सुपरहिट हो चुके हैं, चौथी बार फिर उसकी झोली में जुटा हुआ मजमा कितना वोट डालता है, दिसम्बर में यह पता लग ही जाएगा.  

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