इन दिनों. देश में एक बार फिर से विद्युतीय मतदान यंत्र यानी ईवीएम के विरोध में स्वर मुखरित होते हुए दिखाई दे रहे हैं. देश के सत्रह राजनीतिक दलों के नेता ईवीएम के बारे में गड़बड़ी होने का आरोप लगा रहे हैं. वर्तमान राजनीति की वास्तविकता यही है कि जो भी राजनीतिक दल चुनाव में पराजय का सामना करता है, वह अपनी हार को स्वीकार न करते हुए कोई न कोई बहाने की तलाश करता है. वह ऐसा प्रमाणित करने का प्रयास करते हैं कि उनकी पराजय में ईवीएम का ही हाथ है. अगर ऐसा होता तो स्वाभाविक रुप से पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस बुरी तरह से पराजित होकर सत्ता से बाहर नहीं होती, क्योंकि वह भी ईवीएम में गड़बडी कर सकती थी. वास्तविकता यही है कि राजनीतिक दल अपनी हार को छुपाने के लिए ही इस प्रकार के आरोप लगाने की राजनीति कर रहे हैं.

वर्तमान में ईवीएम को हटाकर जिस प्रकार से मत पत्रों से चुनाव कराने की कवायद की जा रही है, वह निश्चित रुप से मतदान की प्रक्रिया को बहुत धीमा करने वाला प्रयास ही कहा जाएगा. देश में जब बैलेट पेपर से चुनाव की प्रक्रिया होती थी, तब अनेक स्थानों से ऐसी खबरें भी आती थीं कि अमुक राजनीतिक दल के गुंडों ने मतदान केन्द्र पर कब्जा करके पूरे मत पत्रों पर अपनी पार्टी की मुहर लगाकर मतदान कर दिया. मत पत्रों के आधार पर किए जाने वाले चुनाव लोकतंत्र पर आधारित न होकर बाहुबल के आधार पर ही किए जाते हैं. मात्र इसी कारण ही कई क्षेत्रों से बाहुबली चुनकर भी आ जाते हैं. ईवीएम से मतदान होना निसंदेह समस्त चुनावी गड़बड़ियों पर रोक लगाने का काम करता है. क्योंकि प्रत्येक मतदान पर बीप की ध्वनि निकलने के पश्चात ही मत डाला जाता है, जिससे एक व्यक्ति किसी भी हालत में कई मत नहीं डाल सकता. इसलिए यह आसानी से कहा जा सकता है कि ईवीएम के बजाय मत पत्रों के आधार पर चुनाव कराए जाने की मांग लोकतंत्र को प्रभावित करने वाली ही है.

विगत लोकसभा चुनाव के परिणामों के बाद देश की जो राजनीतिक तसवीर बनी उससे कई राजनीतिक दलों के पैरों तले जमीन ही खिसक गई. कांग्रेस, सपा व बसपा का व्यापक जनाधार पूरी तरह से खिसक गया था. इसके बाद इन दलों के साथ ही आम आदमी पार्टी ने ईवीएम को लेकर ऐसा हंगामा किया कि जैसे यह परिणाम ईवीएम का कमाल है. इस समय ज्यादा विरोध होने के बाद चुनाव आयोग ने भी इन राजनीतिक दलों के बयानों को एक चुनौती के रुप में स्वीकार किया. चुनाव आयोग ने दिनांक तय करके कहा कि ईवीएम पूरी तरह से सुरक्षित हैं, किसी में दम हो तो ईवीएम को हैक करके दिखाए. इसके बाद इन सभी राजनीतिक दलों की बोलती बंद हो गई थी. ईवीएम हैक करने के लिए कोई भी राजनीतिक दल का प्रतिनिधि उपस्थित नहीं हुआ.

इसका मतलब साफ था कि ईवीएम को लेकर जो हंगामा किया गया था, वह पूरी तरह से देश की जनता को गुमराह करने के लिए खेला गया ऐ नाटक ही था. जो दल चुनाव आयोग के बुलाने पर पहुंचे थे, उनके द्वारा कहा गया कि ईवीएम तो सही है, हम केवल ईवीएम का प्रदर्शन देखने आए थे. आज जो राजनीतिक दल ईवीएम पर सवाल उठाकर मत पत्रों से चुनाव कराने की बात कह रहे हैं, उन्होंने भी उस समय कुछ नहीं बोला, जब चुनाव आयोग ने बुलाया था. दिल्ली राज्य की सत्ता संभालने वाली आम आदमी पार्टी ने भी ईवीएम की निष्पक्षता को लेकर खूब हंगामा किया था. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने तो ताल ठोकने वाले अंदाज में कहा था कि हम ईवीएम को हैक करके दिखाएंगे, इतना ही नहीं आप के विधायक सौरभ भारद्वाज ने यह प्रदर्शित करने का प्रयास किया था कि ईवीएम को हैक कैसे किया जा सकता है, लेकिन बाद में उनकी भी हैकड़ी निकलती हुई दिखाई दी. वह भी इतना पीछे हट गए कि बाद में स्वर ही नहीं निकले.

दिल्ली राज्य में व्यापक सफलता प्राप्त करने वाली आम आदमी पार्टी के मुखिया और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल को उस समय ईवीएम में किसी भी प्रकार की कोई गड़बड़ी नहीं दिखाई दी, जब दिल्ली की जनता ने आम आदमी पार्टी को छप्पर फाड़ समर्थन दिया था. उसे वह जनता की जीत बताते हुए नहीं थक रहे थे. फिर ऐसा क्या हुआ कि लोकसभा के चुनावों में ईवीएम खराब हो गई. वास्तविकता यही है कि ईवीएम में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी नहीं है और हो भी नहीं सकती, क्योंकि अगर गड़बड़ी होती तो आज प्रत्येक राजनीतिक दल के पास आईटी विशेषज्ञ हैं, जो कंप्यूटरी कृत मशीनों को हैक करना भी जानते हैं. उनके ये विशेषज्ञ ईवीएम को भी हैक करके दिखा सकते थे, लेकिन चूंकि ईवीएम में कोई गड़बड़ी थी ही नहीं तो फिर हैक कैसे की जा सकती थी.

आज जिस प्रकार से मत पत्रों के आधार पर चुनाव कराए जाने की बात हो रही है, वह पराजित मानसिक अवस्था का ही प्रदर्शन माना जा रहा है. लोकसभा और विधानसभा में हारे हुए राजनीतिक दलों को मत पत्रों से चुनाव कराए जाने की मांग के बजाय उन बातों पर ज्यादा ध्यान देने की जरुरत है, जिनके कारण वे पराजित हुए हैं. कांग्रेस की वर्तमान राजनीतिक स्थिति उसकी स्वयं की देन है, क्योंकि उसके शासनकाल में जिस प्रकार प्रतिदिन भ्रष्टाचार करने की खबरें आ रही थीं, उसके कारण देश की जनता व्यापक परिवर्तन करने का मन बना चुकी थी. इसके अलावा कांग्रेस ने देश में तुष्टिकरण का भी खेल खेला. लेकिन इसका लाभ भी कांग्रेस को नहीं मिल सका, क्योंकि देश में कई राजनीतिक दल आज भी खुलेआम तुष्टिकरण की भाषा बोलने में सिद्ध हस्त हो चुके हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव में जनता ने समझदारी दिखाई, और उसी के हिसाब से परिणाम सामने आए. बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती की पार्टी लोकसभा में खाता भी नहीं खोल पाई थी, इसका मलाल उनकी बातों में दिखाई देता है. उत्तरप्रदेश में लोकसभा और विधानसभा के बाद बसपा की जो राजनीतिक स्थिति बनी, उसने बसपा के जनाधार को जमीन सुंघाने का काम किया. लेकिन बसपा प्रमुख मायावती ने अपनी हार ठीकरा ईवीएम पर फोड़ दिया. इसी प्रकार 2014 में उत्तरप्रदेश में कांग्रेस और सपा केवल एक परिवार की पार्टी बनकर ही रह गई.

देश के विरोधी राजनीतिक दलों द्वारा सुनियोजित तरीके से मत पत्रों के आधार पर चुनाव कराए जाने की मांग की जा रही है. लोकसभा चुनाव के चार साल बाद भी वे देश की जनता का विचार नहीं जान पाएं हैं. जितना वे ईवीएम के लिए चिल्ला रहे हैं, उतना अपनी कार्यशैली में सुधार करने की कार्यवाही करते तो संभवत: जनता के मन में स्थान बना पाने में समर्थ होते. हार की समीक्षा की जानी चाहिए थी, लेकिन हमारे देश के राजनीतिक दलों ने समीक्षा न करके बहाने तलाशने प्रारंभ कर दिए. ईवीएम में गड़बड़ी का बहाना भी ऐसा ही है. जबकि सच यह है कि मत पत्रों के आधार पर होने वाले चुनावों में गड़बड़ी की संभावना अधिक रहती है, जिसे जनता भी जानती है और राजनीतिक दल भी जानते हैं.

ईवीएम पर संदेह व्यक्त करने वाले राजनीतिक दलों का भ्रम दूर हो सके, इसके लिए चुनाव आयोग ने अब मतदान के बाद ऐसी पर्ची प्राप्त करने की सुविधा भी जोड़ दी है, जिसके आधार पर पता चल सके कि उसने किस पार्टी को मत दिया है. इसके बाद राजनीतिक दलों को संदेह समाप्त हो जाना चाहिए, लेकिन ऐसा लगता है कि इन राजनीतिक दलों द्वारा मत पत्र से चुनाव कराए जाने के पीछे कुछ और ही मंशा है. यह भी हो सकता है कि इसके माध्यम से मतदान केन्द्रों पर कब्जा करने जैसी कार्यवाही को अंजाम दिया जा सके. मतदाताओं को डरा, धमकाकर भगा दिया जाए और बाहुबल के सहारे एक राजनीतिक पार्टी के पक्ष में मतदान कराया जा सके. कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि ईवीएम में खराबी नहीं है, खराबी तो राजनीतिक दलों की मानसिकता में है.

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