राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था, 'भूखे व्यक्ति को खाने के सिवा और कोई भाषा समझ नहीं आती.' गांधी के इन्हीं सिद्धातों पर चलते हुए मैसूर के राजेंद्र ने रेस्टोरेंट, शादी, पार्टियों में बच जाने वाले खाने को इकट्ठा करने की योजना बनाई और उसे गरीबों में बांटने का फैसला किया. पिछले 6 सालों से वे इस काम में लगे हुए हैं. मूल रूप से कर्नाटक के तुमाकुरू जिले के रहने वाले राजेंद्र बर्बाद हो जाने वाले खाने और भूखे पेट सो जाने वाले लोगों के लिए एक पुल का काम कर रहे हैं.

समाज को बदलने की आकांक्षा कितनी प्रबल हो सकती है इसका जीता जागता उदाहरण हैं राजेंद्र. गरीबों को दो वक्त का खाना मिल सके इसके लिए राजेंद्र ने अपना घर तक नहीं बनवाया. उन्होंने अपनी सेविंग्स को वॉलंटियर्स, ड्राइवर और गाड़ी खरीदने में खर्च कर दिया जिसकी मदद से वे खाना इकट्ठा करने का काम करते हैं. उन्होंने अपने पैसों से अक्षय आहार फाउंडेशन (AAF) नाम की एक संस्था स्थापित की.

राजेंद्र केंद्र सरकार की नौकरी करते हैं और सप्ताह में पांच दिन उनका ऑफिस होता है, लेकिन फिर भी वे सुबह से लेकर रात तक किसी भी वक्त अपने प्रॉजेक्ट के लिए सदैव तत्पर रहते हैं. यह इसलिए होता है क्योंकि कैटरर्स स्नैक, लंच, डिनर खत्म होने के बाद ही फोन करते हैं. शहर के कई सारी मलिन बस्तियों में आहार फाउंडेशन की गाड़ी पहुंचती है तो वहां रहने वाले लोग तुरंत गाड़ी के पास पहुंच जाते हैं. राजेंद्र बताते हैं कि उनसे खाना की बर्बादी देखी नहीं जाती. एक तरफ असंख्य लोग भूखे पेट सोने को मजबूर हैं और दूसरी तरफ कीमती खाने की बर्बादी हो रही हो तो ये स्थिति किसी को भी विचलित कर सकती है.

इसके लिए जब उन्होंने काम शुरू किया था तो सबसे पहले शहर के उन हिस्सों को चिह्नित किया जो मलिन बस्तियों, सरकारकी अस्पतालों और सड़क पर रहते थे. इसके बाद उन्होंने ऐसी जगहों पर जाना शुरू किया जहां शादी, पार्टी जैसे समारोह होते थे. वे रेस्टोरेंट और होटल भी गए और हर जगह अपना नंबर देकर अनुरोध किया कि खाने की बर्बादी न करें. राजेंद्र ने अतिरिक्त खाने को एकत्रित करने की योजना शुरू की.

राजेंद्र कहते हैं, 'हम जो अतिरिक्त खाना इकट्ठा करते हैं वो बिलकुल मुफ्त होता है, यानी हमें उसके लिए पैसे नहीं देने पड़ते. हम उन सभी दानकर्ताओं का शुक्रिया करते हैं जो हमें अतिरिक्त बचा हुआ खाना उपलब्ध करवाते हैं.' हालांकि जिस वाहन से या खाना लाने और ले जाने का काम होता है उसमें पैसे जरूर खर्च होते हैं. यह पैसा राजेंद्र खुद देते हैं. वे कहते हैं कि अगर उन्हें कुछ मदद मिल जाए तो वे इस काम को बड़े पैमाने पर कर सकते हैं.

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