रायपुर. नक्सल प्रभावित बस्तर संभाग अब देसी धान संग्रह क्षेत्र के रूप में पहचाना जाने लगा है. सूखे की स्थिति हो या बाढ़ हर मौसम में पैदावार बढ़ी है. यहां ऐसी देसी किस्मों के धान का संग्रह किया गया है जो रोगों के साथ कीटों से भी सुरक्षित है. ये धान प्रदेश ही नहीं अन्य राज्यों में भी स्थान बना रहे हैं. इनके संग्रह से किसानों की आय बढ़ी है. कृषि विज्ञान केन्द्र जगदलपुर के वैज्ञानिकों के अनुसार कोंडागांव जिले के छोटे से गांव गोलाबण्ड में कृषक समूहों को प्रशिक्षण देने के बाद लगभग 300 किस्म के देसी धान का संग्रह किया जा चुका है. पादप किस्म सुरक्षा एवं कृषक अधिकार एक्ट 2005 के तहत लगभग 200 किस्म के धान का रजिस्ट्रेशन हो चुका है. ज्ञात हो कि 1994 में स्थानीय धान की किस्मों का संग्रहण रूरल कम्यूंस बाम्बे नामक संस्था के माध्यम से शुरू हुआ था.

धान संग्राहक के रूप में देश भर में बनी पहचान :

जंगलों से घिरा जिला होने के बाद भी यहां के किसान देश भर में धान संग्राहक के रूप में पहचान बना रहे हैं. शिवनाथ यादव व शिवनाथ धरोहर को धान के जननद्व्य संरक्षण के लिए सम्मानित किया गया है. उन्होंने किसानों के बीच कृषि जैव विविधता, भू—प्रजाति एवं कृषक किस्म के संरक्षण के लिए जागरूकता फैलाई. धान की किस्मों में औषधीय गुण हैं. लाल हजारी व बगड़ी धान को खाने से एनीमिया रोग दूर होता है. लौह, जिंक और अन्य विटामिन भी धान में शामिल है.

वैज्ञानि पध्दति से किया जा रहा भंडारण :

देशी किस्म के धान का सिर्फ संग्रह करने का कार्य नहीं होता है, बल्कि उनके रख रखाव का भी पूरा ध्यान रखा जाता है. वैज्ञानि पध्दति से चार—चार कतारों में 5 मीटर लंबाई में पौधों को लगाया जाता है. फिर इनका बीज बनाया जाता है. भंडारण कक्ष में साल की लकड़ी का मचान बनाकर उसके उपर बीज को कोठियों में रखा जाता है. कम मात्रा वाले बीज को मिट्टी से तैयार पात्रों में रखते हैं.

प्रति एकड़ 30 क्विंटल आसामचूड़ी की पैदावार :

स्थानीय किस्में जैसे काटामेहर, मेहर, कदमफूल, रानी काजल, सिंदूरसिंगा एवं बादीलुचई आदि किस्मों को श्री विधि से बोकर परीक्षण करने पर बादीलुचई की 20 क्विंटल प्रति एकड़ एवं आसामचूड़ी में लगभग 30 प्रति एकड़ उपज प्राप्त हुई. बासपत्री स्थानीय किस्म से 17 से 18 क्विंटल प्रति एकड़ सीधी बोआई में प्राप्त हुई है. वैज्ञानिकों के अनुसार उन्नत किस्में श्री विधि एवं कतार बोनी के उपयुक्त हैं.

प्राकृतिक खाद का होता है उपयोग:

कृषि विज्ञान केन्द्र जगदलपुर के प्रभारी व सहायक प्रोफेसर जीपी आयाम ने बताया कि देसी किस्म के धान में कोई भी रासायनिक कीटनाशक या खाद का उपयोग नहीं किया जाता. जैविक कीटनाशक गौ मूत्र, गोबर, दीमक की मिट्टी, गुडद्व, करंज एवं आक की पत्तियों को मिश्रित कर बनाया जाता है, जिसका छिड़काव किया जाता है. रासायनिक खाद की जगह गोबर की खाद का उपयोग होता है. इससे माहो व अन्य कीट रोगों का प्रकोप फसलों पर नहीं होता

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