इनदिनों. अब यह बात देखने लायक होगी. इस तरह की और भी कई बातें होंगी. यह सब होगा मध्यप्रदेश की कांग्रेस में. कि क्या कमलनाथ पूरी तरह मैदान में पसीना बहाते दिखने लगेंगे. कि ज्योतिरादित्य सिंधिया भी दिल्ली दरबार से मुक्त होकर राज्य की खाक छानते दृष्टिगोचर होंगे? उन्हें चुनाव अभियान समिति की कमान सौंपकर यही दायित्व दिया गया है. दीपक बावरिया बयानबाजी की बजाय काम करते नजर आने लगेंगे? क्योंकि इस त्रिमूर्ति को राहुल गांधी ने चुनाव जीतने के मंत्र दिए हैं. कहा है कि बैठकें कम हों और क्षेत्रों मेंं जाना ज्यादा किया जाए. यकीनन, राहुल गांधी ने कहा तो और भी बहुत कुछ होगा, लेकिन मीडिया के सामने शाकाहारी किस्म की खबरें ही परोसी गई हैं. 

एक बात साफ है. गांधी ने प्रदेश के हालात भांप लिए हैं. वह समझ गए हैं कि यहां चुनाव की तैयारियों के नाम पर मामला बैठक और सम्मेलनों तक सिमटता जा रहा है. और यह बैठक और सम्मेलन भी औपाचारिकता से ज्यादा नहीं है. बैठक करके विचार विमर्श करना और फिर उसके अनुसार काम करना भाजपा की संस्कृति तो है लेकिन अब कांग्रेस में तो यह सब किसी ने देखा नहीं जो इन दिनों देखने में आ रहा है. एक और बात साफ है और वह प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ के लिए शुभ संकेत भी नहीं कही जा सकती. गांधी ने बसपा तथा सपा से चुनावी गठबंधन का काम अपने हाथ में ले लिया है. नाथ इससे पहले तक मुतमईन होकर इस दिशा में पूरे सुकून से आगे बढ़ रहे थे. मीडिया में मायावती से अच्छी कैमिस्ट्री वाली छपी खबरों से यही लग रहा था कि नाथ को सांस लेने भर की फुर्सत मिल जाए, हाथी और सायकिल पल भर में पंजे के भीतर नजर आएंगे. हालांकि ऐसा दूर-दूर तक होता नहीं दिख रहा था. क्योंकि मायावती की नजर राष्ट्रीय परिदृश्य पर है और समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव खालिस सौदेबाजी की भूमिका में कांग्रेस का साथ देने वाली मुद्रा अपनाए हुए हैं. 

राहुल गांधी और कांग्र्रेस की कहानी अब तक असफल गठबंधन में महारत की हैं. उत्तरप्रदेश और गुजरात के बीते विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की हार इसके ताजा उदाहरण हैं. राष्ट्रपति एवं उप राष्ट्रपति के चुनावों में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की भारी जीत का श्रेय भी उन्हें ही दिया जाता है. इस बायोडाटा वाले गांधी का पाला अब मायावती से पड़ने वाला है. बहनजी अपनी शर्तें पहले ही रख चुकी हैं. तीन राज्यों में उन्हें सम्मानजनक गठबंधन चाहिए. यानी, वह सीटें, जो वह जीत चुकी हैं या फिर बसपा जहां दूसरे नंबर पर है. मायावती जिस कांशीराम गुरुकुल की इकलौती एवं मेधावी शिष्या रही हैं, वहां खालिस, इस हाथ दे और हमें सहूलियत हुई तो फिर हमसे ले, वाला कल्चर चलता है. जाहिर है कि गांधी के लिए इस दिशा में नाथ से भी ज्यादा असुविधाजनक हालात सामने आने हैं. इधर, अखिलेश यादव यदि कुछ नरम पड़े तो भी इसके बदले वह गांधी से आगामी आम चुनाव के लिए कोई भारी सौदा करने से नहीं चूकेंगे. 

रही-सही कसर कांग्रेस के मुखपत्र नेशनल हेराल्ड ने पूरी कर दी है. उसने एक ऐसा सर्वेक्षण उजागर कर दिया, जिसे कोई और मीडिया समूह तवज्जो ही नहीं दे रहा था. कांग्रेस के इस मुखपत्र ने वह सर्वेक्षण छापा जो कहता है कि कांग्रेस मध्यप्रदेश में बसपा से गठबंधन करे या न करे, बहुमत तो भाजपा को ही मिलना है. पता नहीं, अब इस अखबार ने या इसकी वेबसाइट ने यह बात गांधी की सहमति से उजागर की है या नहीं, जो पता है वह यह कि इसके चलते गठबंधन का तराजू बसपा के पक्ष में और अधिक झुक गया है. क्योंकि इसमें यह भी कहा गया है कि बसपा का साथ मिलने की सूरत में ही कांगे्रस भाजपा को कुछ कमजोर कर सकती है. 

अब नाथ, सिंधिया और बावरिया प्रदेश में बताएंगे कि दिल्ली दरबार की सीख का उन पर कितना असर हुआ है. इसके लिए उनके पास कम समय है. क्योंकि गांधी सितंबर में राज्य में आने वाले हैं. इस बिखरी हुई तिकड़ी के लिए यह जरूरी हो गया है कि इससे पहले राज्य में कांग्रेस के पक्ष मे माहौल बनाए. चुनौती इसलिए भी विकट है कि हैराल्ड में प्रकाशित सर्वेक्षण में नरेंद्र मोदी सहित शिवराज सिंह चौहान की मध्यप्रदेश में लोकप्रियता को बरकरार बताया गया है. यानी गांधी जिस समय यहां तशरीफ लाएंगे, तब तक यदि कांग्रेस की दशा में कुछ सुधार नहीं आया तो उनके सामने और जटिल हालात ही दिखेंगे. 

राहुल गांधी अपने तरीके से कांग्रेस को समय-समय पर पर्याप्त नुकसान पहुंचाते रहे हैं. नाथ, सिंधिया और बावरिया पार्टी को होने वाले नुकसान का स्तर कम नहीं कर पा रहे हैं. भाजपा भारी रूप से आक्रामक है. खुद कांग्रेसी कह रहे हैं कि शिवराज की जनआशीर्वाद यात्रा के मुकाबले कांग्रेस के प्रयास नाकाफी हैं. ऐसी कमियों, गलतियों और तगड़ी चुनौती के बीच विधानसभा चुनाव सिर पर आ रहा है. इसीलिए प्रदेश कांग्रेस में अब यह बात देखने लायक होगी.  

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