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*शब्दभेदी बाण? कभी राजीव गांधी थे निशाने पर, आज कोई और...

राजनीति में शब्दभेदी बाण की खास जगह है? यह बगैर सबूत किसी को भी घेरने का बड़ा सियासी हथियार है!

बीसवीं सदी में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी बोफर्स सौदे मामले में ऐसे ही शब्दभेदी बाणों का शिकार हुए थे, आज राफेल डील पर भी ऐसे ही शब्दभेदी बाण चल रहे हैं?

सियासत में शब्दभेदी बाण बड़े घातक होते हैं, इन्हें किसी ठोस सबूत की जरूरत नहीं होती है? जब ये चलते हैं तो इसके शिकार को बेबस कर देते हैं! भीष्म पितामह बना कर ही छोड़ते हैं?

लेकिन... इतिहास साक्षी है, ये शब्दभेदी बाण निर्दोष श्रवण कुमार के प्राण भी ले सकते हैं!

*आंख ही तो मारी है? जाने भी दो यारों...

पीएम मोदी सरकार के खिलाफ  पहले अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के मौके पर राहुल गांधी का दिया हुआ भाषण तो चर्चा में रहा ही, भाषण के बाद राहुल ने पीएम मोदी को गले भी लगाया, और इसके बाद उन्होंने अपनी सीट पर बैठने के दौरान आंख मारकर जो इशारा किया वह तो सबसे बड़ी चर्चा का केन्द्र बन गया? अलबत्ता, इस मामले में कुमार विश्वास ने राहुल का समर्थन किया!

जहां सोशल मीडिया पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के इस एक्शन पर कई खट्टे-मीठे कमेंट्स थे, वहीं आप नेता कुमार विश्वास ने उनका समर्थन करते हुए ट्वीट किया कि... अमां छोडि़ए भी! जरा दिल बड़ा करिए! आंख ही तो मारी है, वरना इन सदनों में क्या-क्या मारा गया है, मुल्क को मालूम है?

*वे मजाक उड़ाते रहे लेकिन राहुल गांधी छा गए!

राहुल गांधी को अज्ञानी साबित करने का अभियान अपनी अधिकतम सीमा पार कर चुका है, यदि अब भी यह अभियान जारी रहा तो राहुल गांधी का नुकसान नहीं होगा, बल्कि बहुत बड़ा फायदा ही होगा!

पीएम मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्ररुताव के दौरान सदम में राहुल गांधी के भाषण से भूकंप आया हो या न आया हो, उनके अंदाज से एक बार तो सभी चकरा गए! 

भाजपा नेता अविश्वास प्रस्ताव पर राहुल गांधी के बयानों को लेकर मजाक उड़ाते रहे और राहुल गांधी इस मौके पर सारे देश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने में कामयाब रहे!

देश के सामने तस्वीर थी... भाजपा के मोर्चे पर सेनापति पीएम नरेन्द्र मोदी तो गैरभाजपाई मोर्चे पर सबसे आगे राहुल गांधी! न ममता, न मायावती?

इस दौरान सवाल-जवाब में किसी की दिलचस्पी खास नहीं थी, न ही हार-जीत को लेकर रहस्य था? असली बात यह थी कि इस मौके पर पीएम मोदी के खिलाफ विपक्ष का कौनसा चेहरा उभर कर सामने आता है?

यकीनन्, राहुल गांधी खुद को पीएम मोदी का विपक्षी विकल्प साबित करने में कामयाब रहे!

*अविश्वास, विश्वास! पीएम मोदी सरकार पर अर्धविश्वास का संकट? 

यह तो तय है कि गैरभाजपाइयों को अविश्वास प्रस्ताव पर जीत हांसिल नहीं होगी? लेकिन... इसके जो संकेत हैं वे भाजपा के लिए अच्छे नहीं हैं!

इस वक्त सदन के भीतर क्या हो रहा है? इससे भी बड़ा सवाल है कि 2019 में बाहर क्या होगा? क्योंकि पीएम नरेन्द्रभाई मोदी की सरकार पर न अविश्वास, न विश्वास, अर्धविश्वास का संकट है!

कारण? जनता को पीएम मोदी सरकार के इरादों पर कोई शक नहीं है, लेकिन वादों पर भरोसा नहीं है! पीएम मोदी सरकार की ईमानदारी पर आपत्ति भले ही नहीं हो, परन्तु भ्रष्टाचार मिटाने के दावे में दम नहीं है? पीएम मोदी सरकार की राष्ट्रभक्ति जगजाहिर है, किन्तु चीन/पाकिस्तान की बदमाशियों पर नियंत्रण, अनियंत्रित है! देश का कालाधन वापस आया नहीं, लेकिन बैंकों से सफेद धन लेकर कई माल्यामाल हो गए?

और इसीलिए, सबसे बड़ा प्रश्र यह है कि 2019 में इस अर्धविश्वास की दिशा क्या होगी? यह फिर से विश्वास में बदेलेगी या फिर अविश्वास की ओर हो जाएगी!

*स्मृति शेष: नीरज ने कहा था- वो उतना ही महंगा होगा, जो जितना ही सस्ता होगा!

पैतीस साल पहले प्रसिद्ध गीतकार गोपालदास नीरज ने माही रेस्ट हाउस, बांसवाड़ा में विशेष इंटरव्यू में कहा था... गीतों की किस्मत में एक दिन ऐसा आना है, वो उतना ही मंहगा होगा जो जितना ही सस्ता होगा!

*क्या जम्मू-कश्मीर में भाजपा का पहला सियासी कदम कामयाब रहा?

राजनीतिक जानकारों के सामने बड़ा सवाल है कि जम्मू-कश्मीर में पहले काहे भाजपा ने पीडीपी के साथ सरकार बनाई? और फिर बनाई तो अब अलग क्यों हो गए?

कई जवाब हैं, लेकिन इस जवाब में दम नजर आता है कि जम्मू-कश्मीर में भाजपा का पहला मकसद पूरा हो गया है- जम्मू-कश्मीर के सियासी हालात एवं भूगोल को देखना और समझना? और यदि अब भी साथ रहते तो आतंकवाद के खिलाफ देश को सख्त कार्रवाई नहीं दिखा पाते जिसका भरोसा 2014 में जनता को दिया था और केन्द्र में भाजपा ने सत्ता पाई थी! अब आगे क्या? 

*आम चुनाव में किसकी चलेगी? राजनेताओं की चतुराई या जनता की चाहत!

सियासी संकेत यही हैं कि केन्द्रीय भाजपा राजनीतिक हालातों का मूल्यांकन कर रही है और जैसा फायदा नजर आएगा, वैसा फैसला हो जाएगा?

एक देश-एक चुनाव! पर सभी दल राजनीतिक चतुराई दिखा रहे हैं, लेकिन वे भूल जाते हैं कि चुनावी नतीजे राजनेताओं की चतुराई पर नहीं, जनता की चाहत पर निर्भर हैं? 

*केन्द्र से जनता की नाराजगी एमपी के शिव-राज को भारी पड़ेगी?

इनदिनों. मध्य प्रदेश के सीएम शिवराज सिंह चौहान के तमाम बेहतर प्रयासों के बावजूद मध्य प्रदेश में भाजपा 2013 जैसी बेहतर स्थिति में नहीं है! दरअसल, केन्द्र सरकार की गलतियों के कारण बढ़ी जनता की नाराजगी ने प्रादेशिक सरकार की कोशिशों पर असर डाला है?

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