जिन दिनों तिलिस्म और ऐयारी में डूबे साहित्य ने देश के नवयुवको को एक आभासी और कल्पनाओं की दुनिया में रख छोड़ा था, उन्हीं दिनों प्रेमचंद ने अपनी लेखनी से यथार्थ के दर्शन कराए, जमीनी स्तर का बोध कराया. प्रेमचंद हिंदी के एक युग प्रवर्तक रचनाकार के तौर पर साहित्य की दुनिया में देखे और पढ़े जाते हैं. उनकी रचनाओं में तत्कालीन इतिहास बोलता है. उपन्यास साहित्य की दशा और दिशा दोनों को प्रेमचंद ने अपनी कलम से बदल कर रख दिया. उन्होंने अपनी रचनाओं में जन साधारण की भावनाओं, परिस्थितियों और उनकी समस्याओं का मार्मिक चित्रण किया. उनकी कृतियाँ भारत के सर्वाधिक विशाल और विस्तृत वर्ग की कृतियाँ हैं. प्रेमचंद की रचनाओं को देश में ही नहीं विदेशों में भी आदर प्राप्त हैं. प्रेमचंद और उनकी साहित्य का अंतर्राष्ट्रीय महत्व है. आज उन पर और उनके साहित्य पर विश्व के उस विशाल जन समूह को गर्व है जो साम्राज्यवाद, पूँजीवाद और सामंतवाद के साथ संघर्ष में जुटा हुआ है. निश्चित ही प्रेमचंद हमारे देश की साहित्यिक जमीन की ऐसी उपज थी जो आज भी फलदार बनी हुयी है. भले ही प्रेमचंद सदेह हमारे बीच नहीं है किन्तु आज भी प्रेमचंद का साहित्य किसी भी लेखक की नींव को मजबूत करता है. आज भी प्रेमचंद प्रेरणा के मुख्य स्त्रोत हैं और साहित्यिक सूर्य की रश्मियों के प्रवाहक के रूप में हम सबके मध्य हैं. 

साहित्य की चली आ रही परम्परा को मोड़कर यथार्थवादी परंपरा की नींव रखने वाले महान रचनाकार प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 में एक गरीब घराने में हुआ. काशी से चार मील दूर बनारस के पास लमही  नाम गांव में इस साहित्यकार ने जन्म लिया. अजायब राय और आंनदी देवी के घर उस वक्त किसे ज्ञात था कि जो बालक उनकी गोद में खेल रहा है वो एक दिन देश का सबसे महान उपन्यासकार के रूप में नाम कमाएगा. दरअसल अभाव और पीड़ा या तो व्यक्ति को निस्तेज कर देता है या फिर उसे इतना सक्षम बना देता है कि वो साहित्य की साधना में रत हो जाए. ये प्रेमचंद का बाल्याकाल था जब उन्हके बालमन में अभावो ने अपने बाण छोड़ना शुरू किये जिसके आघात सहते सहते प्रेमचंद कलमकार बन गए. जब वे 8 वर्ष के थे तब इनकी माता का देहांत हो गया और पिता ने दूसरी शादी कर ली. दूसरी मां का व्यवहार इनके साथ अच्छा नहीं था.14 वर्ष की अवस्था में पिता का भी स्वर्गवास हो गया. घर में पहले से ही गरीबी थी पिता की असमय मृत्यु के पश्चात मुसीबतों के पहाड़ टूटना स्वभाविक ही था. ऐसे में पढ़ाई-लिखाई से ज्यादा रोटी कमाने की चिंता उनके सर पर आ गई.

दाम्पत्य जीवन में भी प्रेमचंद ने वो सबकुछ देखा और भोगा जो ठेठ देहाती परिवार में होता था. 15 वर्ष की आयु में विवाह कर दिया गया. पत्नी उम्र में बड़ी और झगड़ालू स्वभाव की थी, जिसके कारण दाम्पत्य जीवन का जो सुख मिलना चाहिए था वो नहीं मिल सका. ऐसे माहौल के मध्य भी मैट्रिक की परीक्षा पास की. और 1905 में बाल विधवा शिवरानी देवी से विवाह कर लिया. शायद भाग्य ने यहां उनके साथ बेरुखी नहीं दिखाई और इस विवाह के बाद आर्थिक स्थिति में कुछ सुधार आया. एक सरकारी स्कूल में अध्यापक की नौकरी मिल  गई. उस समय भारत की राजनीति से भी प्रेमचंद काफी प्रभावित थे. इसका असर हमें उनके द्वारा लिखित पुस्तकों में साफ दिखाई देता है. इस दैरान अपने लेखन से समाज को जागरूक  करने की कोशिश कर रहे थे. 1907 में सोजे वतन (पांच लघु कहानीयो की किताब) नवाब राय नाम से लिखी. जो काफी मशहूर हुई. इस किताब से अंग्रेज सरकार इस तरह भयभीत हुई कि  उसने इस किताब की सारी प्रतियां जब्त कर के उसे आग के हवाले कर दिया. और प्रेमचंद के लेखन पर भी प्रतिबंध लगा दिया. तब उनके परम मित्र दयाराम और दूसरे मित्रों के आग्रह पर उन्होंने अपना नाम प्रेमचंद रखा. प्रेमचंद के नाम से इनकी पहली कहानी "बड़े घर की बेटी "1910 में प्रकाशित हुई और 1916 मे पंच परमेश्वर प्रकाशित हुई. प्रेमचंद के लगभग 9 कहानी संग्रह प्रकाशित हुए. जो सोजे वतन,सप्त सरोज, समय यात्रा, नव निधि, प्रेम पूर्णिमा, प्रेम पचीसी, प्रेम प्रतिमा, प्रेम द्वादसी, गुप्त धन  है. हिंदी में 1918 में  सेवासदन लिखा. जो उस समय के लोगों को बहुत पसंद आया.

प्रेमचंद का लेखन स्वाधीनता आंदोलन के दौर का लेखन है. इसलिए इनके लेखन पर स्वाधिनता आंदोलन की गहरी छाप हमें दिखाई देती है.

प्रेमचंद ने सदैव सामंती संस्कृति का ही नहीं, सामंतवादी व्यवस्था का भी विरोध किया है. सामंती व्यवस्था जाति -पाति, वर्ण, संप्रदाय, धर्म,मजहब,इन सबको पालते हुए इनका इस्तेमाल अपने हितों के लिए करती है. प्रेमचंद ने बहुआयामी शोषण चक्र को उसके समूचे घिनौनेपन के साथ उभारा है. शोषण चक्र के शिकार छोटे किसानों, भूमिहिनो, खेत मजदूरों, अछूतों, औरतों तथा कर्ज पर जीने वालों और जिंदगी भर के लिए जमींदारों पंडे-पुरोहितों का बंधुआ बन जाने वालों के प्रति अपार मानवीय संवेदना व्यक्त करते हुए उनके हक को लेकर प्रेमचंद जीवन भर लड़ते रहे.

39 वर्ष की आयु में बी ए की डिग्री इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्राप्त की और स्कूल मास्टरी के चलते सन् 1921 में डिप्टी इंस्पेक्टर बने. 1923 में उन्होंने सरस्वती प्रेस की स्थापना की. 1930 में हंस पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया. इसके अलावा आपने "मर्यादा" "हंस" "जागरण" तथा "माधुरी" जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं का संपादन किया. बचपन के अभावो के पश्चात भी जीवन में सदैव मस्त रहने वाला मन्त्र उनके साथ था. वे अपने दिल की सुनते थे. जब गांधी जी ने सरकारी नौकरी से इस्तीफा देने का नारा दिया तो उन्होंने भी अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया.

इसके बाद कुछ दिन तक मुंबई में रहे और फिल्म की स्क्रिप्ट लिखी. इन लिखित स्क्रिप्ट पर "मजदूर" फिल्म भी बनी. यह ऐसी फिल्म बन गई थी जिसे मुंबई तथा आसपास के उद्योगपति ने मजदूर आंदोलन के डर से अपने क्षेत्र में प्रदर्शित नहीं होने दिया. और जहां भी इस फिल्म का प्रदर्शन हुआ वहां के लोग इस फिल्म से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने आंदोलन किया. इन सब घटनाओं के चलते प्रेमचंद का मन मुंबई में नहीं लगा और मुंबई छोड़कर वे इलाहाबाद चले गए. यही लंबी बिमारी के बाद 8 अक्टूबर 1936 को उनका देहान्त हो गया. 

प्रेमचंद बहुमुखी प्रतिभा के धनी साहित्यकार थे. आप अपने रचनाओं के द्वारा आज भी पाठकों के दिलों में जीवित है. प्रेमचंद जी ने अपने जीवन काल में लगभग 300 कहानियां लगभग एक दर्जन उपन्यास (प्रेमा,रुठी रानी, सेवा सदन, प्रेमाश्रय, रंग भूमि, कायाकल्प  निर्मला, गबन, कर्मभूमि, गोदान, मंगलसूत्र (अपूर्ण) 3 नाटक (कर्बला, संग्राम, प्रेम की बेदी) 10 अनुवाद 7 बाल पुस्तकें और हजारों पृष्ठ के लेख संपादकीय भाषण भूमिका पत्र आदि की रचना की.

मुंशी प्रेमचंद को 20 वीं सदी के सबसे प्रसिद्ध लेखक होने का गौरव प्राप्त है. कारण स्पष्ट है कि वे न केवल  हिंदी बल्कि  उर्दू, और अंग्रेजी के अच्छे जानकार थे. ये बहुत कम लोग ही ये जानते है कि प्रेमचंद अपनी रचनाओं की रुपरेखा पहले अंग्रेजी में लिखते थे. जब रचनाएं पूर्ण हो जाती थी तब उसे हिंदी अथवा उर्दू में अनूदित कर विस्तारित करते थे. ये बात हिंदी के समालोचक और हिंदी के दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रह चुके डाक्टर कमल किशोर गोयनका ने भोपाल स्थित बहुकाल केंद भारत भवन की रजत जयंती के उपलक्ष्य पर प्रेमचंद के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर आयोजित कार्यक्रम में इस तथ्य की जानकारी देते हुए कहा " प्रेमचंद अपनी कृतीयो की रुपरेखा पहले अंग्रेजी में लिखते थे उसके बाद उसका अनुवाद करते हुए हिंदी या उर्दू में रचना पूरी कर देते थे.यहां तक कि अपनी महान कृति गोदान की भी रुप रेखा आपने पहले अंग्रेजी में लिखी थी."

प्रेमचंद के उपन्यास में वस्तुचित्रण, कथोपकथन तथा सरल एवं प्रभावशाली भाषा है. उनकी मृत्यु के उपरांत पुत्र अमृत राय ने उनके लिखित 300 कहानियों को सरस्वती प्रेस वनारस से "मानसरोवर" शीर्षक से 8 खंडों में प्रकाशित किया. साहित्य के क्षेत्र में प्रेमचंद का योगदान अतुलनीय है. सचमुच हिंदी कहानी को एक नयी दिशा और दृष्टि यदि प्राप्त हुई तो वो प्रेमचंद की कलम की स्याही से बाह कर ही हुई.  ये कहानीयां आज भी प्रेमचंद के कथाशिल्प के क्रमिक विकास को सजोये हुए हैं. उनका पहला उर्दू उपन्यास "हम खुर्मा व हम सवाब" जिसका आगे चलकर "प्रेमा" नाम से हिंदी अनुवाद प्रकाशित किया गया था. वैसे देखा जाए तो प्रेमचंद का पहला हिंदी उपन्यास सेवा सदन ही है. वैसे तो प्रेमचंद के सन्दर्भ में जितना लिखा जाए उतना कम है. वे साहित्यिक सागर है, जिसमे डुबकियां लगा लगा कर सिर्फ मोती  ही ढूंढ कर लाए जा सकते हैं, पूरे समुद्र को नहीं परखा और देखा जा सकता. ये देश का अहोभाग्य कहा जा सकता है कि साहित्य की धरोहर प्रेमचंद जैसे कलमकार से पोषित होती है और साहित्य उनकी सेवाओं से धन्य है. भरा पूरा है. 

आज का दिन : ज्योतिष की नज़र में


जानिए कैसा रहेगा आपका भविष्य


खबर : चर्चा में


1. माना की पीएम मोदी बहादुर हैं, पर प्रेस से क्यों दूर हैं?

2. कैशलेस पर भरोसा नहीं? लोगों के हाथ में रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा कैश

3. अमरनाथ यात्रा के लिए जम्मू-कश्मीर सरकार ने मांगे 22 हजार अतिरिक्त जवान

4. कीनिया को रौंदकर भारत ने हीरो इंटर कांटिनेंटल फुटबॉल कप जीता

5. SCO समिट- भारत समेत कई देशों के बीच महत्वपूर्ण एग्रीमेंट, PM मोदी ने दिया सुरक्षा मंत्र

6. ट्रंप से मुलाकात के लिए उत्तर कोरिया से चाइना होते हुए सिंगापुर पहुंचे किम जोंग

7. उच्च शिक्षा की गुणवत्ता को बेहतर बनाने यूजीसी बड़े बदलाव की तैयारी में

8. सुपर 30 का दबदबा कायम आईआईटी प्रवेश परीक्षा में 26 छात्र सफल

9. रेलवे बोर्ड चेयरमैन अश्विनी लोहानी, भोपाल से लोकसभा का चुनाव लड़ेंगे.?

10. क्या आप भी पूजा-पाठ करने के लिए स्टील के लोटे का करते हैं इस्तेमाल?पहले जान लें ये बात

11. काम में मन नहीं लगता तो यह करें उपाय

************************************************************************************




Disclaimer : इस न्यूज़ पोर्टल को बेहतर बनाने में सहायता करें और किसी खबर या अंश मे कोई गलती हो या सूचना / तथ्य में कोई कमी हो अथवा कोई कॉपीराइट आपत्ति हो तो वह info@palpalindia.com पर सूचित करें। साथ ही साथ पूरी जानकारी तथ्य के साथ दें। जिससे आलेख को सही किया जा सके या हटाया जा सके ।