निरंकारी बाबा जी कहते हैं संसार के हर इन्सान को प्रेरित किया जाता है कि इस एक परमात्मा से नाता जोड़ लो. इससे जुड़कर ही जागरूकता प्राप्त होती है और आनन्द महसूस होता है. अगर यह समझ प्राप्त कर ली कि राम और रहीम जुदा नहीं हैं तो फिर झगड़े समाप्त हो गए. जब यह बोध हो गया तो फिर कोई दीवार बाकी नहीं रही. उसी अनुसार व्यावहारिक पहलू बना लिया तो मिलवर्तन, एकत्व और भाईचारा स्थापित हो गया. फिर प्रेम भाव को मज़बूती मिली और वातावरण सुखद हो गया. इस प्रकार से ऐसे पल नसीब हुए कि चैन के साथ जीवन का सफर तय किया गया.

जिनके जीवन में जागृति आ जाती है, जिन्हें सत्य का बोध हो जाता है, वे आप भी प्रभु से जुड़ते हैं, औरों को भी जोड़ते हैं. आप भी भेदभाव की दीवारें गिराते हैं, औरों को भी प्रेरित करते हैं. फिर उन्हें कबीर जी की तरह राम और रहीम एक नजऱ आना शुरू हो जाते हैं. एक नूर है सबके अंदर, नर है चाहे नारी है, यह दृष्टि मिल जाती है. चाहे कोई हरियाणवी, राजस्थानी, गुजराती, मारवाड़ी, पंजाबी हो या अरबी या अमेरिकन हो, उन्हें सभी में इसी प्रभु का रुप नजऱ आता है. इस धरती पर जितने भी बखेड़े हैं, ये उन्हीं के कारण हैं जिनकी मान्यताएं ज्ञान, सत्य और बोध पर आधारित नहीं हैं. वे भ्रम और भ्रांतियों से ग्रस्त होकर अज्ञानता का अंधकार ढोते चले आ रहे हैं. वे हकीकत को जानते नहीं हैं. इसलिए, पीढ़ी दर पीढ़ी नफऱत की आग में जलते और जलाते रहते हैं.

तमाम वलियों, गुरु-पीर-पैगम्बरों ने यही जागरुकता प्रदान की. वे ही साधन बने कि इन्सान ठोकरों से बच पाए. उन्होंने किसी एक कौम या तबके के लिए नहीं बल्कि हर किसी के लिए ये उजाले वाले संदेश दिये. क्योंकि अज्ञानता तो अज्ञानता है, अंधकार तो अंधकार है. अंधकार में अंग्रेज़ जाए, वह भी ठोकर खाएगा. हिन्दुस्तानी जाए, वह भी ठोकर खाएगा. कौन किस कुल, जाति या कौम का है, कौन औरत, मर्द, बुजुगऱ् या जवान के रुप में है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है. अंधेरा तो अंधेरा है.

संतों महापुरुषों ने यह बात समझाने का प्रयास किया कि हे इन्सान, तू जो भेदभाव की दीवारें खड़ी करता है, दूसरे को नीची दृष्टि से देखता है, यह वास्तविकता में नुकसान का कारण है. तू हकीकत को जान ले. तू भी ऐसी अवस्था को प्राप्त कर ले, अपने जीवन में उजाला ले आ. तू भी यह जान ले कि वाकई ही ये सारे बंदे इस मालिक के हैं. ये सभी पाँच तत्व के बने हुए पुतले हैं. तू अपनत्व वाली दृष्टि प्राप्त कर ले. जब तू इस दृष्टि से देखेगा तो फिर सभी में इसी का नूर नजऱ आएगा. फिर किसको तू नीचा करके देखेगा. अपनी जाति को ऊंचा और दूसरे की जाति को कहाँ नीचा मानेगा. फिर तेरा नफऱतों से दामन छूट जाएगा.

जिन्होंने यह समझ हासिल कर ली, वे वास्तविकता में धरती के लिए वरदान हो गए. वे सच्चे धर्मी हो गए. वे दूसरों के लिए शांति भरा जीवन जीने का ज़रिया बन गए. ठीक वैसे ही, जैसे जलते हुए दीपक औरों के लिए ठोकरों से बचाव का साधन बन जाते हैं.

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