प्रदीप द्विवेदी. इंटरनेट और डिजिटल युग के लेखक/पत्रकारों को यह अंदाज भी नहीं होगा कि बीसवीं सदी के मध्यकाल तक पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशित करना कितने बड़े साहस का काम था? उस समय एक बार में केवल एक रंग की स्याही में पत्र-पत्रिकाएं छपती थी तो ब्लेक एंड व्हाइट फोटो छापना तो बगैर फोटो ब्लॉक के संभव ही नहीं था!

इसलिए विवेक जैसी पत्रिकाएं न केवल पत्रकारिता की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं बल्कि प्रिटिंग टेक्रोलॉजी के विकास का ऐतिहासिक दस्तावेज भी है! आज बड़े-बड़े समाचार पत्र समूह के पास अपने अखबार का पहला अंक उपलब्ध नहीं हैं? 

राजेन्द्र बोड़ा, राजस्थान के वरिष्ठ पत्रकार हैं. वे विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं को उनकी छपाई के नजरिए से नहीं, वरन उनकी सामग्री के स्तर और महत्व के आधार पर संभाल कर रखते हैं. यह उनका विवेक ही है कि विवेक जैसी महत्वपूर्ण पत्रिकाएं उनके यहां सुरक्षित हैं!

आइए, उन्हीं के शब्दों में विवेक के महत्व को समझें...

*अतीत के गलियारे से :

मेरे पिताजी स्वतंत्रता सेनानी रामचंद्र बोड़ा तब 'विवेक' नाम का अखबार निकालते थे. पहले यह अखबार मासिक था जो एक साल बाद ही पाक्षिक हो गया. इस अखबार का जुलाई-अगस्त 1954 का अंक 62 साल पुरानी स्मृतियां जगा देते हुए अचानक हमारे हाथ में आ गया.

इस अंक के मुखपृष्ठ की छवि उस जुझारू दौर की याद कराती है, गुदगुदाती है. इसका साझा करने का जी किया.

सामान्य तौर पर 'विवेक' के मुखपृष्ठ पर किसी समकालीन विषय पर सम्पादकीय टिप्पणी ही हुआ करती थी, मगर यह अंक इस मायने में अलग है कि इस के मुखपृष्ठ पर जोधपुर में हुई एक वैचारिक गोष्ठी का चित्र है. यह चित्र उस ज़माने का दस्तावेज है जो याद दिलाता है कि सूर्यनगरी के नाम से विख्यात जोधपुर नगर कभी राजस्थान में बुद्धिजीवियों और बौद्धिक गतिविधियों से लबरेज होकर अपना विशिष्ट स्थान रखता था.

साथ का यह चित्र विवेक अखबार के मुखपृष्ठ का है जिस पर जो चित्र छपा है वह जोधपुर के विवेकशील लोगों के संगठन 'Jodhpur Rationalist Association' के उदघाटन के अवसर का है. इसका उदघाटन करने जेबीएच वाडिया बम्बई से चल कर आये थे. वे तब Bombay Rationalist Association के अध्यक्ष थे.

जे बी एच वाडिया को अधिकतर लोग एक सफल फिल्मी हस्ती के रूप में जानते हैं जिन्होंने वाडिया मूवीटोन स्थापित किया और अपने छोटे भाई होमी वाडिया के साथ मिल कर एक के बाद एक सफल फिल्में बनाई और जिन्हें मीना कुमारी तथा शम्मीकपूर जैसे कलाकारों को पहली बार पर्दे पर उतारा. वे देश में डॉक्यूमेंटरी फ़िल्मोंके जनक भी कहे जाते हैं.

मगर फिल्मों के इतर भी उनका वज़ूद बहुत बड़ा था. वे देश में कम्युनिज़्म और मार्क्सवाद से आगे जाकर रेडिकल ह्यूमनिज़्म के प्रणेता एम एन रॉय के निकट सहयोगियों में से थे. रॉय के राजनैतिक दर्शन को मानने वाले 'रॉयिस्ट' कहलाये जो मनुष्य को केंद्र में रखने के हिमायती रहे है. 'रॉयिस्ट' का माने एक समय बुद्धिजीवी और खूब पढ़ने लिखने वाला होता था.

जोधपुर और बीकानेर तब रॉयिस्टों के गढ़ माने जाते थे!

आज का दिन : ज्योतिष की नज़र में


जानिए कैसा रहेगा आपका भविष्य


खबर : चर्चा में


1. माना की पीएम मोदी बहादुर हैं, पर प्रेस से क्यों दूर हैं?

2. कैशलेस पर भरोसा नहीं? लोगों के हाथ में रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा कैश

3. अमरनाथ यात्रा के लिए जम्मू-कश्मीर सरकार ने मांगे 22 हजार अतिरिक्त जवान

4. कीनिया को रौंदकर भारत ने हीरो इंटर कांटिनेंटल फुटबॉल कप जीता

5. SCO समिट- भारत समेत कई देशों के बीच महत्वपूर्ण एग्रीमेंट, PM मोदी ने दिया सुरक्षा मंत्र

6. ट्रंप से मुलाकात के लिए उत्तर कोरिया से चाइना होते हुए सिंगापुर पहुंचे किम जोंग

7. उच्च शिक्षा की गुणवत्ता को बेहतर बनाने यूजीसी बड़े बदलाव की तैयारी में

8. सुपर 30 का दबदबा कायम आईआईटी प्रवेश परीक्षा में 26 छात्र सफल

9. रेलवे बोर्ड चेयरमैन अश्विनी लोहानी, भोपाल से लोकसभा का चुनाव लड़ेंगे.?

10. क्या आप भी पूजा-पाठ करने के लिए स्टील के लोटे का करते हैं इस्तेमाल?पहले जान लें ये बात

11. काम में मन नहीं लगता तो यह करें उपाय

************************************************************************************




Disclaimer : इस न्यूज़ पोर्टल को बेहतर बनाने में सहायता करें और किसी खबर या अंश मे कोई गलती हो या सूचना / तथ्य में कोई कमी हो अथवा कोई कॉपीराइट आपत्ति हो तो वह info@palpalindia.com पर सूचित करें। साथ ही साथ पूरी जानकारी तथ्य के साथ दें। जिससे आलेख को सही किया जा सके या हटाया जा सके ।