ललित गर्ग. कोई भी राष्ट्र या समाज स्वयं नहीं बोलता, वह सदैव अपनी प्रबुद्ध प्रतिभाओं की क्षमता, साहस, योग्यता एवं विलक्षणता के माध्यम से बोलता है. बोलना, मात्र मुंह खोलना नहीं होता. बोलना यानि अपने राष्ट्र के मस्तक को ऊंचा करना है, सम्मानित करना है. जिस राष्ट्र, समाज, समूह या वर्ग का प्रबुद्ध तबका जागरूक है, सक्रिय है और राष्ट्रीय एवं सामाजिक दायित्व के प्रति अपनी भूमिका निभा रहा है, वहां ज्यादा गतिशीलता है.

चाहे वह शिक्षा हो, चाहे संगठन, चाहे सेवा हो, चाहे रूढ़ि-उन्मूलन, चाहे सामाजिक न्याय. सोनम वांगचुक और डॉ. भरत वटवाणी को रैमन मैगसायसाय अवॉर्ड मिलना हर भारतीय के लिए खुशी की बात है, गर्व की बात है. यह नया भारत बनने का सुखद संकेत भी है. क्योंकि यह पुरस्कार एशिया का नोबेल पुरस्कार माना जाता है. इन दोनों भारतीयों का नाम उन छह लोगों में शामिल है जिन्हें इस पुरस्कार के लिये विजेता घोषित किया गया.

सोनम वांगचुक और उनके काम से देश का बच्चा-बच्चा परिचित रहा है, क्योंकि चमक-दमक से दूर रहकर अपने काम में जुटे रहे हैं. वे एक लद्दाखी अभियंता, अविष्कारक और शिक्षा सुधारवादी हैं. वे प्रकृति, संस्कृति और शिक्षा की दिशा में भारत के सम्मान को बढ़ाने वाले जमीनी नायक हैं. उनको यह पुरस्कार उत्तर भारत के दूरदराज के क्षेत्रों में शिक्षा के क्षेत्र में नवीन प्रयोगों एवं जमीनी उपक्रमों के लिये दिया गया है. उनका भारत की शिक्षा जगत को अविस्मरणीय योगदान है. क्योंकि उन्होंने भारत की व्यावसायिक शिक्षा में व्याप्त मशीनीपन के प्रति समाज को आगाह किया हैं.

शिक्षण प्रक्रिया को लीक से हटाकर उसमें छात्रों की रचनात्मकता के लिए जगह बनानी बनायी है, इसी से लद्दाखी युवाओं के जीवन में तकनीकी शिक्षा एवं नवीन प्रयोगों का उजास फैला है और उन्होंने कुछ अनूठे एवं विलक्षण कार्यों से देश को आश्वस्त किया है. शिक्षा की प्रासंगिकता को उन्होंने किताबों से निकाल कर प्रायोगिक बनाया है. उनके योगदान की झलक लोकप्रिय फिल्म ‘3 ईडियट्स’ के नायक फुनशुक वांगडू में के रूप में लोगों को देखने को मिली थी. लीक से हटकर किए गए उनके प्रयासों से ही कई लद्दाखी युवाओं का जीवन बदल गया. सोनम ने 1988 में इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल हासिल की और स्टूडेंट्स एजुकेशनल एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख (एसईसीओएमएल) के जरिए शिक्षा के क्षेत्र में नए प्रयोगों में जुट गए. इसका असर यह हुआ कि इंटरमीडिएट स्तर तक की परीक्षा पास करने वाले छात्रों की संख्या वहां काफी बढ़ गई.

सरकारी स्कूल व्यवस्था में सुधार लाने के लिए उन्होंने सरकार और ग्रामीण समुदायों के सहयोग से 1994 में ऑपरेशन न्यू होप शुरू किया. वांगचुक ने इंजीनियरिंग के क्षेत्र में भी कई प्रयोग किए हैं. बर्फ के स्तूप बनाकर वह पश्चिमी हिमालय के सूखे, बंजर इलाकों में खेती के तरीके ईजाद करने में जुटे हैं. इसके साथ ही वे आर्थिक प्रगति के लिए विज्ञान एवं संस्कृति का उपयोग करने के लिए रचनात्मक रूप से स्थानीय समाज के सभी क्षेत्रों को सकारात्मक रूप से लगाने को लेकर प्रयासरत है. उनके ये कार्य विश्व में अल्पसंख्यक लोगों के लिए एक उदाहरण बने हैं. लद्दाख में वह हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ आल्टर्नेटिव नाम का एक विश्वविद्यालय स्थापित करना चाहते हैं, जिसके लिए लद्दाख हिल काउंसिल ने जमीन भी आवंटित कर दी है. प्रारंभिक कोष के लिए वांगचुक ने क्राउडफंडिंग के जरिये 14 करोड़ रुपये में से सात करोड़ जुटा भी लिया है. 

मैगसायसाय अवार्ड से सम्मानित दूसरे महानायक है डॉ. भरत वटवाणी. वटवाणी को यह सम्मान भारत के मानसिक रूप से पीड़ित निराश्रितों को सहयोग एवं उपचार मुहैया कराने के लिये दिया गया है. उन्होंने अपने साहस और करुणा के बल पर समाज द्वारा नजरंदाज किये गए व्यक्तियों की गरिमा को बहाल करने का सराहनीय कार्य किया है, सेवा के नये प्रतिमान गढ़े हैं. इसके लिये उन्होंने दृढ़ और उदार समर्पण का उदाहरण प्रस्तुत किया है. वे अपनी पत्नी के साथ मिलकर मानसिक बीमारियों के शिकार ऐसे लोगों का इलाज करते रहे हैं जो अपने घर से निकलने के बाद वापस नहीं लौट पाते. ऐसे लोगों के इलाज के लिए उन्होंने सड़क से अपने निजी क्लीनिक में लाने का एक अनौपचारिक अभियान शुरू किया. इसके लिए 1988 में उन्होंने श्रद्धा पुनर्वास फाउंडेशन का गठन किया. यह फाउंडेशन भटके हुए मनोरोगियों के लिए मुफ्त आश्रय और भोजन की व्यवस्था तो करता ही है, साथ में उन्हें अपने परिवारों से मिलाने का इंतजाम भी करता है. उन्होंने अपने काम से साबित किया कि मानव जीवन का सौंदर्य परोपकार और सेवा में ही है.

हमें वांगचुक और डॉ. वटवाणी की तरह दृढ़ मनोबली बनना होगा और इस सोच को बल देना होगा कि हम चाहे दायें जाएं चाहे बायें, अगर श्रेष्ठ बनेंगे और शिखर पर होंगे. गीता से लेकर जितने ग्रंथ हैं वे सभी हमें यही कहते हैं कि ”मनोबल“ ही वह शक्ति है जो भटकते हुए व्यक्ति को लक्ष्य तक पहुंचाती है. घुटने टेके हुए व्यक्ति को हाथ पकड़ कर उठा देती है. अंधेरे में रोशनी दिखाती है. विपरीत स्थिति में भी मनुष्य को कायम रखती है. एक दृढ़ मनोबली व्यक्ति के निश्चय के सामने जगत् झुक जाता है. बाधाएं अपने आप हट जाती हैं. जब कोई मनुष्य समझता है कि वह किसी काम को नहीं कर सकता तो संसार का कोई भी दार्शनिक सिद्धांत ऐसा नहीं, जिसकी सहायता से वह उस काम को कर सके. यह स्वीकृत सत्य है कि दृढ़ मनोबल से जितने कार्य पूरे होते हैं उतने अन्य किसी मानवीय गुणों से नहीं होते.

दोनों ही हस्तियां एशिया की उम्मीद के नायक और महान् मनोबली हैं जिन्होंने अपने प्रयासों से समाज को आगे बढ़ाया. वंचित और हाशिये पर रहने वाले लोगों के साथ वास्तव में एकजुटता दिखाते हुए इनमें से प्रत्येक ने वास्तविक और जटिल मुद्दों का साहसिकता, रचनात्मकता और व्यावहारिक कदमों से समाधान किया है, जिससे अन्य वैसा ही करने में लगे. वे प्रेरणा बने हैं. ऐसे ही रोशनी बने नायकों ने भारत को शक्तिशाली बनाया है. ”भारत एक क्षेत्रीय अधिशक्ति (रीजनल सुपर पावर) बन रहा  है“- यह टिप्पणी अमेरिका से प्रकाशित होने वाले विश्व विख्यात साप्ताहिक ”टाइम“ में दशकों पूर्व प्र्रकाशित हुई थी, तब भारत के निवासी ही चकित नहीं हुए, बल्कि देश के दोस्त-दुश्मन दोनों में यह चर्चा का विषय बनी थी. आज देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ऐसी ही शक्तियों के बल पर भारत को महाशक्ति बनाने की बात करते हैं. इन्हीं लोगों ने अपने अनूठे अवदानों से ”मेरा भारत महान्“ के उद्घोष को सार्थक किया है. ऐसे ही लोग इतिहास बनाते हैं. इतिहास कभी भी अपने आपको समग्रता से नहीं दोहराता. अपने जीवित अतीत और मृत वर्तमान के अन्तर का ज्ञान जिस दिन देशवासियों को हो जाएगा, उसी दिन हमें मालूम होगा कि महानता क्या है. हम स्वर्ग को जमीन पर नहीं उतार सकते, पर अपनी क्षमता एवं प्रतिभा से निराला रच अवश्य सकते हैं, यह लोकभावना जागे. महानता की लोरियाँ गाने से किसी राष्ट्र का भाग्य नहीं बदलता, बल्कि तन्द्रा आती है. इसे तो जगाना होगा, भैरवी गाकर. महानता को सिर्फ छूने का प्रयास जिसने किया वह स्वयं बौना हो गया और जिसने संकल्पित होकर स्वयं को ऊंचा उठाया, महानता उसके लिए स्वयं झुकी है. यह आदर्श स्थिति जिस दिन हमारे राष्ट्रीय चरित्र में आ जायेगी उस दिन महानता हमारे सामने होगी. तब ”मेरा भारत महान्“ होगा और तभी हमारे राष्ट्र की झोली में नोबेल एवं मैगसायसाय अवॉर्ड की झड़ी लग जायेगी. 

बाबा आमटे को पूछा गया कि क्या आप मृत्यु के बाद पुनः जीवन में विश्वास करते हैं, तो उन्होंने कहा - मैं इस जीवन में कई जिन्दगियां जीने में विश्वास रखता हूं. जीवन को संग्राम समझने वाला ही क्षण-क्षण जीता है. मूल्यवान 100 वर्ष नहीं होते, बल्कि सैकेण्ड का वह 100वां हिस्सा होता है जो शताब्दियों को उजाल देता है. नियति एक बार एक ही क्षण देती है और दूसरा क्षण देने से पहले उसे वापिस ले लेती है. वर्तमान भविष्य से नहीं अतीत से बनता है. वांगचुक और डॉ. वटवाणी की तरह हमें शेष जीवन का एक-एक क्षण जीना है- अपने लिए, दूसरों के लिए यह संकल्प सदुपयोग का संकल्प होगा, दुरुपयोग का नहीं. बस यहीं से शुरू होता है नीर-क्षीर का दृष्टिकोण. यहीं से उठता है अंधेरे से उजाले की ओर पहला कदम. और यही से मिलती है राष्ट्र के अस्तित्व एवं अस्मिता को एक ऊंचाई, एक सम्मान और एक नया मस्तक.

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