तू मेरी आँखों का पानी भी पढ़ लेता था

* सलिल सरोज

क्या हुआ ऐसा कि इस कदर बदल गया है तू

पहले तू मेरी आँखों का पानी भी पढ़ लेता था.

 

वो हँसी- ठिठोली और कहकहे सब छूट गए

यूँ तो बात-बेबात भी तू तो मुझसे लड़ लेता था.

 

मेरी ज़रा सी नाराज़गी से निजात पाने के लिए

तू कितने ही किस्से-कहानियाँ झट गढ़ लेता था.

 

बस कोई लफ्ज़ कील बनके दिल में चुभ गई है

नहीं तो आँधियों-तूफानों से भी तू अड़ लेता था.

 

मैं रहूँ या न रहूँ निगाहों में तेरे काबिज़ हमेशा

पर ख्वाबों-ख्यालों में तो बाँहों में भर लेता था.

*B 302 तीसरी मंजिल

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