सोशल मीडिया पर trolling एक नए बिजनेस या नौकरी के रूप में सामने  आया है जहां अधिकांश कार्य और कमाई अप्रत्यक्ष रूप से कुछ हद तक अनैतिक रूप से होती है. इसके लिए जो लोग लगाए जाते हैं उन्‍हें ट्रोलिंग आर्मी का नाम दिया गया है.

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के पॉलिटिकल साइंटिस्ट गैरी किंग का कहना है कि पूरी दुनिया में प्रायोजित और आर्गेनाइज्ड किस्म की trolling का चलन बहुत तेजी से बढ़ रहा है.

इसका मतलब ये है कि कुछ कंपनियां, राजनीतिक दल और सरकारें सोची-समझी रणनीति के तहत ट्रोल्स की फौज खड़ी कर देती हैं ताकि उनके खिलाफ सोशल मीडिया में कोई निगेटिव राय न बन पाए.

कहां से आया ट्रोल शब्

स्कैंडेनेविया की लोक-कथाओं में एक ऐसे बदशक्ल और भयानक जीव का जिक्र आता है, जिसकी वजह से राहगीर अपनी यात्रा पूरी नहीं कर पाते थे. इस विचित्र जीव का नाम ट्रोल था.

इंटरनेट की दुनिया में ट्रोल का मतलब उन लोगों से होता है, जो किसी भी मुद्दे पर चल रही चर्चा में कूदते हैं और आक्रामक और अनर्गल बातों से विषय को भटका देते हैं. अगर ये नहीं तो फिर इंटरनेट पर दूसरों को बेवजह ऐसे मामले में घसीटते हैं, जिससे उन्हें मानसिक परेशानी हो.

अंग्रेजी में ट्रोल शब्द संज्ञा और क्रिया दोनों रूपों में इस्तेमाल किया जाता है लेकिन व्याकरण से परे सोशल मीडिया इस्तेमाल करने वालों के लिए ट्रोल का सीधा मतलब सिरदर्द और अपमान है.

ट्रोलिंग की मानसिकता क्या होती है?

आखिर ट्रोल कौन लोग होते हैं और वे क्यों अपना सारा कामकाज छोड़कर औरों के पीछे क्यों पड़े होते हैं? पूरी दुनिया में इस सवाल के मनोवैज्ञानिक और समाजशास्त्रीय पहलुओं पर बात हो रही है.

मनोवैज्ञानिकों की मानें तो जो मानसिकता बिना बात चलती ट्रेन पर पत्थर फेंकने वालों की होती है या पुराने जमाने में ब्लैंक-कॉल करके लोगों को परेशान करने वालों की होती थी, लगभग वही मनोवृति एक ट्रोल की भी होती है.

साइबर एक्सपर्ट रक्षित टंडन के अनुसार हम सभी को अपनी बात कहने की आजादी है. यदि आप किसी ट्वीट या पोस्ट के विरोध में अपनी प्रतिक्रिया सही तरीके से सभ्य भाषा और सही तथ्यों के साथ देते हैं, तो यह ट्रोलिंग नहीं है, लेकिन जब आप गलत उद्देश्य से किसी व्यक्ति विशेष की छवि बनाने या बिगाड़ने के लिए ट्रोल करते हैं और ट्रोल की भाषा एवं उसमें दिए तथ्य आपत्तिजनक हैं तो यह क्रिमिनल एक्टिविटी के दायरे में आ जाता है.

हालांकि इस पर कार्रवाई आसान नहीं है. क्योंकि ऐसी गतिविधियों के लिए फेक अकाउंट का इस्तेमाल किया जाता है. कई बार लोग, संस्थाएं या राजनीतिक पार्टियां अपनी बेहतर इमेज बनाने के लिए सोशल मीडिया मार्केटिंग कंपनियों को नियुक्त करती हैं.

साथ ही कई बार किसी की (प्रतिद्वंदी) छवि बिगाड़ने के लिए इन कंपनियां को कांट्रेक्ट दिया जाता है. यह कांट्रेक्ट कुछ हजार से लेकर लाखों या कभी कभी करोड़ तक के भी हो सकते हैं. ट्रोलिंग का सबसे ज्यादा इस्तेमाल राजनीतिक पार्टियों द्वारा और कभी कभी कॉरपोरेट इंडस्ट्री द्वारा किया जाता है.

शब्दों के चयन पर खास जोर दिया जाता है

ट्रोल करने वाले ज्यादातर जल्दबाजी में काम करते हैं. क्योंकि उन्हें एक ही पोस्ट को कई अकाउंट या पेज पर शेयर करना होता है. ऐसे में उनके द्वारा चयन पर खास जोर दिया जाता है. संबंधित व्यक्ति या विषय से जुड़े कुछ शब्द निर्धारित कर लिए जाते हैं. जिन्हें देखते ही सोशल मीडिया पर ट्रोल का सिलसिला शुरू हो जाता है.

कंप्यूटर रोबोट का भी होता है इस्तेमाल

रक्षित टंडन के अनुसार सिर्फ व्यक्तियों के द्वारा ही नहीं तकनीक के माध्यम से भी ट्रोलिंग या साइबर बुलिंग की घटनाएं होती हैं. हालांकि इन्हें रोकने के लिए सोशल मीडिया साइट्स प्रयासरत रहती हैं. लेकिन फिर भी कंप्यूटर रोबोट से ट्रोलिंग की प्रक्रिया भारत में भी अछूती नहीं रही है.

क्षेत्रीय राजनेता भी सोशल मीडिया मार्केटिंग में उतरे

आगामी 2019 चुनावों के मद्देनजर सोशल मीडिया मार्केटिंग का प्रयोग बढ़ चुका है. लोगों खासकर युवाओं के बीच सोशल मीडिया की बढ़ती लोकप्रियता के कारण कोई भी पार्टी इसे नजरअंदाज नहीं कर सकती है. ऐसे में स्थानीय राजनेताओं एवं पार्टियों द्वारा भी इस दिशा में कार्य किया जा रहा है.

आपत्तिजनक ट्रोल में मिल सकती है सजा 

एसटीएफ एसपी एवं साइबर एक्सपर्ट डॉ. त्रिवेणी सिंह के अनुसार सोशल मीडिया मार्केटिंग अपराध नहीं है, लेकिन यदि इसके लिए अभद्र भाषा, धमकी या किसी भी तरह के आपत्तिजनक ट्रोल का इस्तेमाल किया जाता है, तो वह साइबर क्राइम की श्रेणी में आता है. जिसके लिए सजा का प्रावधान है. राजनीतिक पार्टियों द्वारा सोशल मीडिया मार्केटिंग का इस्तेमाल किया जाता है लेकिन इसके लिए यदि कोई फेक अकाउंट बना रहा है तो उसे सजा मिल सकती है.

साभार:  Legend News

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