इनदिनों. वर्ष 2019 के आम चुनाव को लेकर कांग्रेस, भाजपा और क्षेत्रीय दल अपने-अपने हिसाब से अपनी जीत की गणित पेश कर रहे हैं. जहां कांग्रेस उपचुनावों में जीत और बढ़ता वोट प्रतिशत का आधार बता रही है, वहीं भाजपा डेढ़ दर्जन से ज्यादा प्रदेशों में अपनी सत्ता का हवाला देकर अपनी जीत का हिसाब लगा रही है तो क्षेत्रीय दल अपनी उपलब्धियों और गठबंधन के दम पर कामयाबी की कहानी सुना रहे हैं, लेकिन आम चुनाव 2019 भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती हैं क्योंकि भाजपा को केन्द्रीय सत्ता बचानी है! 

वैसे, वोटों और सीटों का गणित बेहद उलझा हुआ है, इसलिए केवल वोटों के आधार पर सीटों की गणना जरूरी नहीं है कि सही बैठे और सीटों के दम पर यह नही कहा जा सकता है कि आगे भी नतीजे ऐसे ही रहेंगे, वजह? इस वक्त देश में भाजपा सबसे बड़ा दल है और उसके पास तकरीबन चालीस प्रतिशत वोट हैं, इसलिए यदि चुनाव में बहुकोणीय मुकाबला हुआ तो ही भाजपा की जीत का रास्ता निकलेगा, वरना तो नतीजे 2014 के एकदम उलट हो सकते हैं!

आम चुनाव 2019 में केन्द्र की गद्दी तक नरेन्द्रभाई मोदी को पहुंचने से रोकने के लिए गैरभाजपाई महागठबंधन की चर्चाएं जारी हैं, जिनसे भाजपा के लिए सियासी संकट की आशंकाएं उभरती हैं, लेकिन तीसरे मोर्चे जैसी बात होते ही भाजपा के लिए संभावनाओं के द्वार खुल जाते हैं?

हालांकि, राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा को सबसे बड़ा खतरा यूपी में है, क्योंकि वहां तकरीबन तय है कि सपा-बसपा मिलकर लड़ेंगे और ऐसी स्थिति में भाजपा के लिए 2014 की कामयाबी दोहराना संभव नहीं है. वर्ष 2014 में भाजपा ने अकेले ही लोकसभा चुनाव में 272 का आंकड़ा पार कर लिया था, यदि यूपी की जीती हुई सीटें निकाल दी जाएं तो भाजपा दो सौ सीटों के करीब रह जाती है! 

भाजपा के लिए खतरा इसलिए भी बड़ा है कि एमपी, राजस्थान जैसे आधा दर्जन राज्यों में कांग्रेस बगैर किसी गठबंधन के ही एक सौ सीटों का आंकड़ा पार करने की स्थिति में है? मतलब... यदि यूपी में सपा-बसपा साथ रहे और कांग्रेस अपने प्रभाव वाले राज्यों में एक सौ से ज्यादा सीटें हांसिल करने में कामयाब रही तो भाजपा 2019 में एकल जीत (272 सीटें) तो हांसिल नहीं कर पाएगी!

मतलब... भाजपा को केन्द्र की गद्दी हांसिल करने के लिए यूपी में सपा-बसपा का तोड़ तलाशना होगा? उत्तरभारत की कमी को पूरा करने के लिए पश्चिम बंगाल जैसे गैरभाजपाई प्रदेशों से अधिक-से-अधिक सीटें जीतनी होंगी? और गैरभाजपाई प्रदेशों में नए सहयोगी दल तलाशने होंगे! 

बसपा की सर्वेसर्वा मायावती और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ठीक से जान चुके हैं कि यूपी में सपा-बसपा साथ नहीं आए तो 2019 में भाजपा को रोकना मुश्किल होगा? लिहाजा, मायावती और अखिलेश यादव, दोनों सियासी समझदारी दिखा रहे हैं!

वैसे, बसपा की सर्वेसर्वा मायावती की राजनीति एकदम खुली किताब है और यूपी के अलावा शेष कई राज्यों में भी बसपा का प्रभाव है, लिहाजा मायावती का पहला निशाना केन्द्र है तो दूसरा यूपी? 

बहुत संभव है कि लाभ-हानि की राजनीति के चलते मायावती कभी भाजपा के साथ भी आ जाए, लिहाजा सपा प्रमुख अखिलेश यादव सपा-बसपा गठबंधन में मायावती को अधिक-से-अधिक लाभ देना और दिखाना चाह रहे हैं? एक बार यूपी भाजपा के हाथ से निकल गया तो गैरभाजपाई, केन्द्र में भाजपा से अच्छा मोर्चा ले सकेंगे!

भाजपा को यूपी में कामयाबी के लिए सशक्त दलित और मुस्लिम नेताओं की जरूरत है जो सपा-बसपा की तोड़ निकाल सके? यदि इस तलाश में भाजपा कामयाब रही तो भाजपा की केन्द्रीय सत्ता बची रहेगी!

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