प्रशांत सौरभ, बेतिया. कहते हैं परिस्थितियां चाहे लाख विपरीत हों, लेकिन मेहनतकश व्यक्ति वही होता है जो उन विपरीत परिस्थितियों को भी अपने अनुकूल बना लेता है. जी हां,इस कहावत को सच कर दिखाया है बिहार के पश्चिमी चंपारण के मझौलिया प्रखंड के लालसरैया पंचायत के किसान सुशील कुमार जायसवाल ने. जब भी किसी नई परंपरा की शुरुआत होती है या किसी नए आयाम की शुरुआत होती है, उसमें चंपारण का इतिहास सदैव अग्रणी रहा है. महात्मा गांधी से लेकर आज के दौर में भी कई नई चीजों के शुरूआत का गवाह चंपारण बना है. खेती में भी चंपारण के किसान उच्च तकनीक का इस्तेमाल कर एक नई परंपरा विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं. अपने वैज्ञानिक तरीके से खेती के बल पर सुशील ने कुछ ऐसा कर दिखाया है जो किसानों के लिए एक नया मार्गदर्शक साबित हो रहा है.

दरअसल धान की फसल सभी किसान उगाते हैं लेकिन सीधे धान खेतों में नहीं रोपा जा सकता. इसके लिए पहले बिचड़े गिराने होते हैं,और फिर इन तैयार बिचड़ों को खेतों में रोपा जाता है.लेकिन इसे चमत्कार न कहें तो क्या कहें. ना अथाह जुताई की झंझट,ना हेंगाई,ना बियाराड़ की व्यवस्था न पानी की पटाई और ना हाथ से धान की रोपाई, फिर भी धान की भरपूर उपज. दरअसल संरचना के अभाव ज्यादा लागत और मौसम की मार के चलते परंपरागत विधि से धान की खेती घाटे का सौदा बनती जा रही है. इसे देखकर सुशील ने कुछ नया करने की ठानी. इस विकट परिस्थिति में जीरो टिलेज मशीन की सहायता से धान की सीधी बिजाई अर्थात् डायरेक्ट सोईंग ऑफ राइस या डीएसआर का प्रयोग किया. वे बताते हैं कि यह एक चमत्कारिक पद्धति है क्योंकि इस विधि से धान की रोपाई करने में 40% पानी की बचत होती है. बिचड़ा नहीं बनाना पड़ता. लेवाठ या कदवा कराने में पैसे खर्च नहीं होते और न ही रोपाई के लिए मजदूरों की आवश्यकता पड़ती है. इतना ही नहीं फसल की कटाई भी 10-15 दिन पहले ही होती है,जिससे रबी की आगत खेती भी संभव हो जाती है. इस विधि से प्रति एकड़ चार से पांच हजार रुपये की बचत होती है. सुशील जायसवाल बताते हैं कि आज से 3 साल पहले जब मैंने निर्णय लिया था कि इस साल धान की खेती सीधी बिजाई या डीएसआर विधि द्वारा जीरो टिलेज मशीन की सहायता से करूंगा तो घर के बड़े बुजुर्ग जैसे बगावत पर उतर आए. वे पारंपरिक विधि को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हो रहे थे. इस दौरान पूर्व प्रधानमंत्री अटल जी की पंक्तियां मेरे लिए प्रेरणा स्रोत का काम कर रही थी.

चम्पारण किसान

हार नहीं मानूंगा,रार नई ठानूंगा

काल के कपाल पर लिखता मिटाता हूं,

गीत नया गाता हूं.

दरअसल परंपरावादी किसानों के दिमाग में यह सोच घर कर गई है कि बिचड़े से उखाड़ कर चार पांच पौधो को दूसरे खेत में रोपने में या ट्रांसप्लांट करने से वह कलम का रूप धारण कर लेता है जिससे अधिक कल्ले आते हैं,और तीव्र विकास होता है. लेकिन सुशील कहते हैं कि हकीकत यह है कि यह बात पूर्ण सत्य नहीं है. धान की खेती सीधी बिजाई या डीएसआर विधि द्वारा करने पर धान का एक-एक दाना जो पौधा का रुप ले चुका  होता है,उसमें 40 से लेकर 100 तक कल्ले निकल आते हैं,और प्रति वर्ग मीटर 16 से 20 पौधे निकल आते हैं.धान की बालियों की लंबाई भी 25 से 30 सेंटीमीटर की हो जाती है,जो की सामान्य पारंपरिक विधि से अधिक है. वह बताते हैं कि जून के प्रथम सप्ताह से डीएसआर शुरूआत ट्रैक्टर चालित जीरो टिलेज मशीन द्वारा की जाती है. जीरो टिलेज मशीन में खाद और बीज रखने के लिए अलग-अलग चेंबर बने रहते हैं. लेकिन चूंकि प्रति एकड़ धान का बीज मात्र 8 से 9 किलोग्राम और डीएपी या मिश्रण खाद कोई 25 किलोग्राम के आसपास हीं लगता है,अतः दोनों को मिलाकर एक ही चेंबर में रख दिया जाता है.जीरो टिलेज मशीन से खाद बीज गिरने की दर को किसी प्रशिक्षित या जानकार व्यक्ति द्वारा समायोजित करवा लिया जाता है. बिजाई से 7 दिन पूर्व खेत को पानी से भर दिया जाता है, जिससे बीज के जमवट और और खरपतवार के नियंत्रण में सहूलियत होती है. खरपतवार से निपटने के लिए कृषि वैज्ञानिक से परामर्श कर खरपतवारनाशी दवाओं का उपयोग किया जा सकता है.

चम्पारण किसान

बता दें कि सुशील जायसवाल ने इस मौसम में तुलसी की खेती भी की थी और चंपारण के लिए एक नई तकनीक का इजाद किया था. आमतौर पर ऐसा माना जाता है कि तुलसी की खेती बाहर के राज्यों में होती है लेकिन सुशील जायसवाल ने बड़े पैमाने पर तुलसी की खेती की और मुनाफा भी कमाया जिससे किसानों को  एक नई राह मिली.

जहां इन दिनों खेती को बोझ समझकर किसान आत्महत्या कर रहे हैं,खेती छोड़ रहे हैं वही चंपारण के किसान सुशील जायसवाल के इस खेती तकनीक की चारों और प्रशंसा हो रही है,सुशील जायसवाल बताते हैं कि वह आगे भी कृषि में वैज्ञानिक तरीकों की खोज करते रहेंगे,ताकि ज्यादा से ज्यादा किसानों को फायदा हो सके.

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