इनदिनों. पल-पल इंडिया के प्रिंट के साथ-साथ डिजिटल अंक ने देश-विदेश के लाखों रीडर्स तक अपनी पहुंच बना ली है. पल-पल इंडिया का ताजा अंक करवट बदल रही देश की राजनीति का आईना है! आइए, देखते हैं पल-पल बदलती राजनीति के रंग...

* माना की पीएम मोदी बहादुर हैं, पर प्रेस से क्यों दूर हैं? इसमें पीएम मोदी के प्रेस के प्रति नजरिए को लेकर सवाल हैं... पीएम नरेन्द्र भाई मोदी की जिस तरह की ब्रांडिंग हो रही है, उससे लगता है कि वे बहादुर हैं, पर सवाल यह है कि फिर वे प्रेस से क्यों दूर हैं? प्रेस से बातचीत तो छोडि़ए, वे तो कईं ज्वलंत मुद्दों पर ही चुप्पी साध लेते हैं, और शायद इसीलिए मौन रहने का भाजपाई आरोप झेलने वाले पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी कुछ समय पूर्व पीएम मोदी पर व्यंग्यबाण चलाए थे कि... उन्हें बोलने का उपदेश देने वाले मोदी क्यों ज्वलंत मुद्दों पर चुप्पी साधे रहते हैं?

* जयललिता के समर्थकों का सत्ता संघर्ष जारी है! तमिलनाडु में जयललिता के गुजर जाने के बाद जो सियासी तस्वीर बनी है, उसे दिखाती हे यह रिपोर्ट... सियासी संकेत यही हैं कि पूर्व सीएम जयललिता का एआईएडीएमके का वोट बैंक बिखर गया है लिहाजा अगले चुनावों में एआईएडीएमके के लिए फिर से सत्ता पाना बेहद मुश्किल होगा, हालांकि तमिलनाडु के राजनीतिक माहौल में बदलाव पर केन्द्रीय भाजपा लगातार नजर रखे है, क्योंकि अगले आम चुनाव 2019 में एआईएडीएमके के सहारे ही भाजपा को तमिलनाडु में कामयाबी मिल सकती है? 

* आम चुनाव 2019? अच्छे दिन वाला कि अच्छे दिल वाला पीएम होगा! राहुल गांधी को लेकर जो नजरिया बदल रहा है, उस पर आधारित है यह रिपोर्ट... बदले राजनीतिक नजरियों का भावार्थ यही है कि... गुजरात चुनाव के बाद से राहुल गांधी की इमेज में लगातार सकारात्मक सुधार हुआ है? यदि वे इन सकारात्मक धारणाओं को बनाए रखने में कामयाब रहते हैं तो 2019 का आम चुनाव उनके लिए सियासी सफलता का संदेश लेकर आएगा.

* नौकरशाही में नये प्रयोग की सार्थकता, रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि... प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नया भारत निर्मित करना चाहते हैं, इसके लिये देश के प्रशासनिक क्षेत्र को सशक्त बनाने एवं नौकरशाही को दक्ष, प्रभावी एवं कार्यकारी बनाने की तीव्र आवश्यकता है. नौकरशाही को प्रभावी, सक्षम एवं कार्यक्षम बनाने और उसमें नए तौर-तरीकों को समाहित करने के इरादे से संयुक्त सचिव पद के स्तर पर निजी क्षेत्र के दक्ष, विशेषज्ञ पेशेवर लोगों को नियुक्त करने का फैसला एक नई पहल है, जिसका स्वागत किया जाना चाहिए.

* देश बदलना है तो देना होगा युवाओं  को सम्मान, रिपोर्ट युवाओं पर केन्द्रीत है...

ऐसे युवाओं को जब देश में सम्मान मिलेगा, पहचान मिलेगी, इन्हें शेष युवाओं के सामने यूथ आइकान और रोल मोडल बनाकर प्रस्तुत किया जाएगा, तो न सिर्फ यह इसी राह पर डटे रहने के लिए उत्साहित होंगे बल्कि देश के शेष युवाओं को उन की सोच को एक लक्ष्य मिलेगा, एक दिशा मिलेगी. जब हमारे देश के युवा सही दिशा, सही लक्ष्य पर चल निकलेंगे तो सही मायनों में यह कहा जा सकता है कि आने वाला कल भारत का ही होगा.

* भले ही मुद्दा चुनावी हो, पर रामायण सर्किट का निर्णय एक सार्थक दिशा, यह विचार एक बेहतर निर्णय की जानकारी देता है... धार्मिक-आध्यात्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के मकसद से उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने देश में रामायण सर्किट बनाने की दिशा में पहल की है. लोकसभा चुनाव में अब ज्यादा समय नहीं है और उत्तर प्रदेश सरकार रामायण सर्किट के निर्माण की योजना को आकार दे रही है, जिसमें नौ राज्यों के ऐसे 15 स्थानों को जोड़ा जाएगा, जहां कभी भगवान राम के पांव पड़े थे. यह राजनीति में नया सकारात्मक प्रचलन है जिससे हिन्दू पयर्टन को प्रोत्साहन मिलेगा. 

* क्या नीतीश कुमार तलाश रहे हैं नई राजनीतिक भूमिका? बिहार की राजनीति देश की राजनीति को प्रभावित करती है, इसी पर आधारित रिपोर्ट कहती है कि... तमाम योग्यताओं के बावजूद नीतीश कुमार के लिए पीएम बनना आसान नहीं है और बिहार में सीएम बने रहना बड़ा मुश्किल है, तो क्या करें नीतीश कुमार? राजनीतिक जानकारों के बीच यह सवाल चर्चा का विषय है कि... क्या नीतीश कुमार तलाश रहे हैं- नई राजनीतिक भूमिका?

* गहलोत पर बड़ी जिम्मेदारी है शाह का विजय रथ रोकने की? राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को कांग्रेस में बड़ी जिम्मेदारी दी गई है, आगे उनके सामने क्या चुनौतियां हैं... कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद राहुल गांधी ने राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दे कर कांग्रेस संगठन के लिए बेहतर निर्णय लिया है, लेकिन इस निर्णय से अशोक गहलोत की जिम्मेदारी और भी बढ़ गई है! अशोक गहलोत पर सबसे बड़ी जिम्मेदारी है, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के विजय रथ को रोकने की? इस वक्त भाजपा में सत्ता के मोर्चे पर पीएम मोदी तो संगठन के मोर्चे पर अमित शाह हैं, जबकि कांग्रेस में दोनों मोर्चों पर राहुल गांधी है!

* क्यों चाहते हैं पीएम नरेन्द्र भाई मोदी दोनों चुनाव एकसाथ? देश में एकसाथ चुनाव की चर्चा चल रही है, कुल मिलाकर यदि देश में एकसाथ लोकसभा-विधानसभा चुनाव होते हैं तो... ऐसी व्यवस्था देशहित में है, क्योंकि इससे देश पर चुनावी आर्थिक भार कम होगा और देश को लगातार चुनावी माहौल से छुटकारा मिलेगा! पीएम मोदी इस व्यवस्था का समर्थन इसलिए कर रहे हैं कि यह देशहित में तो है ही, इसका सबसे ज्यादा सियासी फायदा भाजपा को होगा? गैरभाजपाई दल इसलिए इस व्यवस्था से सहमत नहीं हैं कि इससे उन्हें राजनीतिक तौर पर बड़ा नुकसान होगा? 

* राहुल को महागठबंधन की नहीं, महागठबंधन को कांग्रेस की ज्यादा जरूरत है? कांग्रेस बगैर किसी सहयोग के भी आधा दज्रन राज्यों में अच्छीखासी सीटें जीतने की स्थिति में है, ओर इसीलिए... पीएम प्रत्याशी के लिए गैरभाजपाइयों के पास राहुल गांधी के अलावा कोई और नाम नहीं है! वर्तमान सियासी समीकरण तो यही संकेत दे रहे हैं कि यदि गैरभाजपाई मंच से कांग्रेस को किनारे करने की कोशिश होती है तो कांग्रेस को तो सीटों का बड़ा नुकसान नहीं होगा, भाजपा को केन्द्र की सत्ता से हटाने का गैरभाजपाई सपना जरूर टूट जाएगा!

* भाजपा के लिए कांग्रेस से भी बड़ा खतरा है- शिवसेना? शिवसेना लंबे समय से भाजपा से नाराज है, सहयोगी दलों में भाजपा को सबसे बड़ा खतरा शिवसेना से इसलिए है कि दोनों का वोट बैंक एक ही नेचर का है... कोई चमत्कार हो जाए तो कह नहीं सकते? लेकिन, यह तय है कि 2019 के आम चुनाव में भाजपा 272 का आंकड़ा पार नहीं कर पाएगी, उस स्थिति में भाजपा को सहयोगी दलों के समर्थन की खासी जरूरत रहेगी, और क्या तब... सहयोगी दल पीएम पद के लिए नरेन्द्र भाई मोदी के नाम पर सहमत होंगे? शायद नहीं! और इसीलिए भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के सियासी अंदाज बदले-बदले नजर आ रहे हैं? भाजपा संगठन के अंदर ही मोदी के विरोधी बढ़ते जा रहे हैं, उस स्थिति में यदि सहयोगी दल पीएम के लिए नरेन्द्र भाई मोदी के बजाय राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज जैसे नाम पर अड़ गए तो क्या होगा?

* आरएसएस की ताकत? कोई ईष्र्या तो कर सकता है, लेकिन इंकार नहीं! संघ को लेकर राजनीतिक दलों की बेचैनी समझी जा सकती है, परन्तु संघ की ताकत एक दिन में खड़ी नहीं हुई है... भारतीय राजनीति में आरएसएस का प्रत्यक्ष हस्तक्षेप नहीं होने के बावजूद आरएसएस की ताकत को सियासी दुनिया नजरअंदाज नहीं कर सकती है? आरएसएस की ताकत से कोई भी ईष्र्या तो कर सकता है, लेकिन उसकी ताकत से इंकार नहीं कर सकता है. 

* पीएम ही क्यों? फिर से राष्ट्रपति भी बन सकते हैं प्रणब मुखर्जी! प्रणब मुखर्जी संघ के कार्यक्रम में क्या गए, चारों ओर चर्चाओं के दोर चल पड़े... सियासी इतिहास पर नजर डालें तो कांग्रेस में रहते हुए भी प्रणब मुखर्जी ने अपना स्वतंत्र अस्तित्व बरकरार रखा और संभवतया यही वजह रही होगी कि सोनिया गांधी ने उनके बजाय मनमोहन सिंह को पीएम के रूप में पसंद किया, जो कि उनसे सियासी अनुभव में जूनियर थे! 

लगभग यह तस्वीर अब साफ होती जा रही है कि 2019 में भाजपा, कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों का विचित्र त्रिकोण बनेगा? और भाजपा या कांग्रेस एक तरफा निर्णय नहीं कर पाएंगी? ऐसी स्थिति में क्षेत्रीय दलों को राजी किए बगैर किसी का पीएम बनना आसान नहीं रहेगा? जाहिर है, तृणमूल कांग्रेस, तेलुगू देशम, तेलंगाना राष्ट्र समिति जैसे दल प्रणब मुखर्जी को सर्वमान्य उम्मीदवार के रूप में स्वीकार कर सकते हैं!

वे इसलिए भी स्वीकार्य हो सकते हैं कि उनके पास बेहतर सियासी अनुभव है, भाजपा सहित ज्यादातर सियासी दलों के साथ भी उनका अच्छा तालमेल रहा है? संघ के कार्यक्रम में जा कर उन्होंने सियासी संभावनाओं का एक नया दरवाजा खोल दिया है! मतलब... विवादास्पद विषम राजनीतिक परिस्थितियों में वे 2019 के आम चुनाव के बाद पीएम भी बन सकते हैं और पुन: राष्ट्रपति भी बन सकते हैं?

* पल-पल इंडिया का ताजा अंक पढ़ें... 

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