आग फैलेगी तो आएंगे कई घर जद में, यहाँ सिर्फ हमारा मकान थोड़ी है...आग लगाने वाले अक्सर भूल जाते हैं कि वे या उनका कोई इस समाज में शामिल है. आप समाज को जाहिल और जहरीला बनाएंगे तो सुरक्षित भविष्य की कल्पना कैसे की जा सकती है. आज मंदसौर में हुए भयानकतम अत्याचार को लगभग 15-20 दिन हो चुके हैं, सुना है लाडली अब मुस्कुराई. इस दौरान लोगों को, मीडिया को, नेताओं को, लोगों को बलबलाते हुए देखा. अव्वल तो इक्का दुक्का नेता ही अपनी जुबान खोल सके, पर जो बोले उन्होंने नाक ही कटवाई. एक मूढ़ तो पीड़ित परिवार से आभार प्रदर्शन कराने उनके घर पहुंच गए और आभार मांग कर ही लौटे. तथाकथित रूप से गुस्साए लोगों ने पुतलों को और पोस्टर में ही प्रतीकात्मक फांसी देकर हलके हो गए. इसे दो धर्मों का मामला बनाने की भी कोशिश हुई, लेकिन वो हमेशा की तरह नाकाम रही.

मीडिया संतुलन साधने के फेर में असंतुलन तक पहुँच गया . प्रदेश से प्रकाशित नामी अखबारों ने इस मामले की उछल उछल कर रिपोर्टिंग की, क्योंकि इसमें उनके हित प्रभावित नहीं हो रहे थे. इस माध्यम से वे अपने जन सरोकारों का भी प्रदर्शन कर सके. वैसे भी मीडिया के लिए ये एक खबर थी, जो दो तीन दिनों में अंदर के पेज पर जाते हुए बाहर हो जाएगी. शासन ये मान रहा है कि इसमें उसका तो कोई दोष ही नहीं है, पुलिस खुश हैं कि उसने एक दिन के अंदर अपराधी को ढूंढ निकाला.

बस, हो गयी इतिश्री हम विकासशील युग में रह रहे हैं सो रुक तो नहीं सकते. अगले हादसे तक सरकार, प्रशासन और हम कुछ और बात करेंगे.

लेकिन अब सोचना उनको है, जो इस घटना से वाकई चिंतित हैं. जिनके बच्चे इन अपराधों में संलिप्त हैं या वे जो इन अपराधों की वेदना से गुजर रहे हैं. बालिकाओं के साथ निरंतर हो रही इन घटनाओं के पीछे के तथ्यों पर भी नजर डालना होगा. हमें समझना होगा कि सड़कों पर फांसी-फांसी चीखने से हालात नहीं बदलने वाले. क्या जमीनी हालात ऐसे हैं जिससे हम महिलाओं या बच्चियों को सुरक्षा की गारंटी दे सकें? हालातों का क्या कहें, आप जितना सोच रहे है, वे उससे कहीं अधिक भयानक हैं.

आजकल हर कुछ डिजिटल है, हर एक घामड़ के पास इन्टरनेट वाला मोबाइल फ़ोन है . जिन लड़कों को अपना जीवन बनाना है, वे संघर्ष में लगे हुए है . लेकिन हर एक तक मोबाइल पहुँचाने के लक्ष्य के चलते हमने उन हाथों में भी मोबाइल थमा दिया जिनके ये किसी काम का नहीं है. इस मोबाइल और उससे बंधे सोशल मीडिया के चलते हर गाँव में दस-बीस उन्मादी, निर्दयी और किसी भी घटना को अंजाम देने के लिए लड़के तैयार बैठे हैं. भले ही इनको राजनीतिक सोच के साथ बनाया गया हो, लेकिन वे आज उससे कहीं आगे जा रहे हैं. जिन्हें वोट की फसल को बचाने के लिए बागड़ के रूप में तैयार किया गया था, अब यह बागड़ ही खेत और आदमियों को खाने लगे हैं. इस गाली गलौच के पीड़ित पुरुष भी हैं, लेकिन महिलाओं के सामने इनका उन्माद चरम पर होता है. ये कहाँ और किस रूप में निकलेगा ये कोई नहीं जानता.

आज गांवों और कस्बों में बिना काम धंधे के लिए घिसट रहे युवाओं के मोबाइल चेक कीजिए, उनमें आपको जो पोर्न कंटेंट मिलेगा वो आपके दिमाग को हिलाकर रख देगा. सस्ते मोबाइल और सस्ता डेटा इस समाज में आग लगा रहा है, और इसका अनियंत्रित होना इसे और भयानक बना रहा है. ये 20-24 साल के लड़के क्या कर रहे हैं, इसकी चिंता माँ बाप को हरदिन करना चाहिए.

सोचिये जरा, गांव का कम पढ़ा लिखा या लगभग अनपढ़ बेरोजगार लड़का डाटा का क्या करता होगा. ज्यादे से ज्यादे गाने ऑनलाइन गाने सुनेगा या वीडियो क्लिप देखेगा . गानों की भी हालत ये है कि फ़िल्मी गानों से इतर ऐसे भद्दे गाने इसमें झोंके जा रहे हैं जिनमें नग्नता की कोई सीमा नहीं . आजकल चलन हो गया है जो सेंसर बोर्ड से जारी नहीं हो सकता है उसे सोशल मीडिया में ठेल दो, मतलब तो कमाई से ही है न. इसके अलावा सोशल मीडिया पर पोर्न वीडियो की बाढ़ आई हुई है.

व्हाट्सएप पर ऐसे कई वीडियो उपलब्ध हैं जिन्हें बलात्कारियों द्वारा खुद ही बनाया गया है. इससे आप उनकी हिम्मत और दिमागी हालत का अंदाजा लगा सकते हैं. मनोरंजन के नाम पर इंटरनेट उनके जेब में समा गया जिनके पास न पैसा है और न अकल है. वे बस जितना देखते है, बस उस को ही पूरा सच मानते हैं. ये वोट कबाड़ने तक तो ठीक है, लेकिन उन बेकसूर लोगों का क्या जो इस भयावहता के शिकार होंगे. जिस हाल में ये युवा हैं उससे अभी कुछ बदलने की उम्मीद नहीं कि सकती. ये दिनों दिन और घातक होंगे, क्योंकि इनका दिमाग पूरी तरह से कुंद हो चुका है.

सरकार को समझना होगा कि सिर्फ बलात्कारी को कठोर दंड का प्रावधान करने भर से बात नहीं बनेगी, इसकी बलात्कारी बनने की प्रक्रिया को भी समझना होगा. अभी तो तत्काल ये देखने की जरूरत है कि व्हाट्सएप पर किस प्रकार का कंटेंट बांटा जा रहा है. सरकार या तो इंटरनेट और व्हाट्सअप शेरिंग के लिए कठोर कानून बनाये या भविष्य में ऐसे और दूसरे केस झेलने के लिए तैयार रहे. निःसंदेह इसके लिए माँ बाप की भी बड़ी जिम्मेदारी है, लेकिन अब ये उनके भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है. ये दिमाग में जहर भरे लोग हमारे सिस्टम ने ही पैदा किये हैं. विडंबना इस बात की है कि इनकी वजह से असुरक्षित वह वर्ग है जिसे अपनी दाल रोटी से ही फुरसत नहीं है. इन्हें मानव बम बनाने वाले आराम से बैठकर तमाशा देख रहे हैं.

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