नजरिया. जिन युवाओं के दम पर 2014 के आम चुनाव में पीएम नरेन्द्र भाई मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने शानदार कामयाबी का परचम लहराया था, वही युवा वर्ग आज बेहिसाब बेरोजगारी का बड़ा सवाल ले कर खड़ा है?

वर्ष 2014 के आम चुनावों में इन्हीं युवाओं से नरेन्द्र भाई मोदी ने वादा किया था कि... पीएम बनने के बाद वह अपने कार्यकाल के दौरान हर साल एक करोड़ नई नौकरी पैदा करेंगे जिससे देश में बेरोजगारी के आंकड़े को सुधारा जा सके! लेकिन हुआ क्या? रोजगार की परिभाषा ही बदल गई, खुद पीएम नरेन्द्र मोदी ने पकौड़ा रोजगार का उल्लेख किया जिसे बाद में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह संसद तक ले गए और तर्क दिया कि... देश में मोदी सरकार के दौरान स्वरोजगार भी रोजगार सृजन माना जाना चाहिए?

इसके बाद तो गैरभाजपाइयों ने केन्द्र सरकार को ही निशाने पर ले लिया कि... एक ओर तो केन्द्र सरकार नौकरियां देने में असफल रही है, दूसरी ओर पीएम मोदी, मजबूरी में चाट-पकौड़ा बेचने वालों को भी बेरोजगार मानने को तैयार नहीं? और-तो-और त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लब कुमार देब का सुझाव तो यह था कि... युवा नौकरी के लिए नेताओं के पीछे भागने के बजाय पान की दुकान खोल लें या गाय पाल लें? अर्थात... ऐसे पूरा होगा एक करोड़ रोजगार का लक्ष्य! सवाल यह है कि युवाओं को किस ओर ले जाएगी यह नई पान-पकौड़ा रोजगार नीति?

आईएलओ... अंतरराष्ट्रीय श्रम संस्था के हवाले से आई खबरों के अनुसार भारत में 2018 में बेरोजगारों की संख्या बढ़कर 1.86 करोड़ का आंकड़ा पार कर लेगी तो 2019 में यह आंकड़ा बढ़कर 1.89 करोड़ पार हो जाएगा जबकि 2017 में देश में बेरोजगारों की संख्या 1.83 करोड़ मानी गई थी? केन्द्र में मोदी सरकार के चार साल बीत चुके हैं और अगले साल 2019 में एक बार पुन: भाजपा को रोजगार रिपोर्ट कार्ड लेकर जनता के समक्ष जाना होगा!

सवाल यही होगा कि पांच साल में क्या पांच करोड़ युवाओं को रोजगार मिला? जवाब है... करोड़ों के दावे लाखों की रेखा भी ठीक-से लांघ नहीं पाए हैं?

खबरों की माने तो केन्द्र सरकार के श्रम मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार केन्द्र की मोदी सरकार ने 2015 के दौरान 1.55 लाख नौकरियां पैदा कीं तो 2016 के दौरान 2.31 लाख नई नौकरियों निकली, इस तरह 2014 के बाद केन्द्र की मोदी सरकार ने कुल 4.93 लाख नौकरियों का सृजन किया? वर्ष 2014 के आंकड़ो में वे माह भी शामिल हैं जब कांग्रेस की सरकार थी! मतलब? एक करोड़ नौकरियों का वादा केवल चुनावी वादा था!

देश में बेरोजगारी की गंभीर समस्या है और इस दिशा में किसी भी सरकार द्वारा गंभीरता से प्रयास नहीं किए गए हैं? इन चार सालों में केन्द्र की भाजपा सरकार नए रोजगार सृजन के मोर्चे पर तो नाकामयाब रही ही है, नोटबंदी, जीएसटी ने रही-सही कसर भी पूरी कर दी? रोज-रोज के नए नीति-निर्देशों ने प्राइवेट सेक्टर के रोजगार ढांचे को भी हिला कर रख दिया है? प्राइवेट सेक्टर में नए रोजगार की संभावनाएं तो कमजोर पड़ ही गई हैं, कई लोग अपनी नौकरियां भी गंवा चुके हैं!

कहने को तो स्वरोजगार का हंगामा खुब है, लेकिन इसके लिए बैंक से ऋण और सरकारी सहयोग प्राप्त करना बेहद कठिन तो है ही, इन सुविधाओं को प्राप्त करने के अघोषित तौर-तरीके भी पुराने ही हैं?

एक ओर कैश की कमी तो दूसरी ओर पेट्रोल-डीजल के बढ़ते दामों ने स्वरोजगार के सपनों में ही आग लगा दी है? नए-नए नियम, नए-नए तौर-तरीके, नए-नए टैक्स/रिटर्न ने स्वरोजगार के आधार को ही निराधार बना दिया है!

लेकिन... इस संबंध में पीएम नरेंद्र मोदी कहना था कि विपक्षी नौकरियों के मामले में- अपनी इच्छानुसार, एक तस्वीर बना रहे हैं, क्योंकि हमारे पास नौकरियों पर पर्याप्त आंकड़े मौजूद नहीं हैं!

पीएम मोदी ने एक पत्रिका को दिए साक्षात्कार में कहा कि... नौकरियों की कमी से ज्यादा, नौकरियों पर आंकड़े की कमी की समस्या है. हमारे विपक्षी स्वाभाविक रूप से इस अवसर का इस्तेमाल अपनी इच्छानुसार तस्वीर बनाने और हम पर आरोप मढऩे में कर रहे हैं. मैं हमारे विपक्षियों को नौकरी के मुद्दे पर हम पर आक्षेप लगाने का आरोप नहीं लगाता हूं, आखिरकार किसी के पास भी नौकरियों पर वास्तविक आंकड़ा मौजूद नहीं है!

उनका कहना था कि... नौकरियों को मापने का पारंपरिक ढांचा- नए भारत की नई अर्थव्यवस्था में नए रोजगार को मापने के लिए पर्याप्त नहीं है?

पीएम मोदी ने रोजगार सृजन को लेकर राजनीतिक बहस में- स्थिरता की कमी, का आरोप लगाया और कहा कि अगर राज्य सरकारें लाखों नौकरियों के सृजन का दावा कर रही हैं तो, यह कैसे हो सकता है कि केंद्र सरकार नौकरियों का सृजन नहीं कर रही है?

सारांश यही है कि... रोजगार का मुद्दा आंकड़ों के खेल में उलझ गया है? भाजपा के पास अपने तर्क हैं तो विपक्ष के पास अपने आंकड़े, और इन दोनों से हट कर है युवाओं का अपना अनुभव, जो कि वास्तविक है! देखा जाए तो प्रत्यक्ष तौर पर तो इन चार सालों में प्रतिवर्ष एक करोड़ रोजगार का वादा चार प्रतिशत भी पूरा नहीं हो पाया है? सच्चाई तो 2019 में युवाओं के मतदान के बाद ही स्पष्ट हो पाएगी!

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