सिनेमा और समाज के नायकों से अक्सर ही हर आम और खास व्यक्ति प्रभावित होता है. आम तौर पर नायक के बारे में बात करते हुए हमारे मन में एक चमत्कृत कर देने वाले व्यक्तित्व की छवि ही दिमाग में कौंधती है. लेकिन मनोहर श्याम जोशी की यह किताब नायकों की चमकीली छवि के ठीक उलट, आम इंसानों को नायक की तरह स्थापित करती है. इस किताब में महानगरी मुम्बई के आम लोगों के, राष्ट्रीय और रोजमर्रा के जीवन से जुड़े विषयों पर दिलचस्प साक्षात्कार/बातचीत दर्ज हैं.

जिंदगी का चक्का कुछ ऐसे घूमता है कि बहुत से व्यक्तियों को एक जीवन में कई व्यक्तित्व जीने पड़ते हैं. और इस काम में मुखौटे बड़ी मदद करते हैं, फिर चाहे वे दिखने वाले मुखौटे हों या फिर अदृश्य. दिखने वाले मुखौटे लगाकर घूमने वालों का सिर्फ चेहरा ही छिपता है, किंतु अदृश्य मुखौटे लगाकर जीने वालों का तो पूरा व्यक्तित्व ही लंबे समय तक अंजाना बना रहता है. मुश्किल बात यह है कि ऐसे अदृश्य मुखौटे लगाने वालों की शिनाख्त करना भी बड़ी चुनौती है. लेकिन मनोहर श्याम जोशी अपनी पैनी नजर से ऐसे अदृश्य मुखौटे लगाने वालों के असली चेहरों को पहचान लेते हैं. किताब के एक अध्याय में लेखक ऐसे ही कुछ पात्रों के छिपे हुए असली व्यक्तित्वों को सामने लाता है. ‘असली चेहरा’ नामक अध्याय में ऐसे ही एक वेटर के छिपे हुए, लेकिन असली व्यक्तित्व का वर्णन करते हुए वे लिखते हैं -

‘रंजन एक कैंटीन में वेटर है. दिन में आप उसे गन्दी हाफपैंट-कमीज़ पहने हुए, त्यौरियों पर आक्रोश और आंतों में अलसर धारण किये हुए, दर्जनों ट्रे एक साथ उठाये हुए कैंटीन से दफ़्तर और दफ़्तर से कैंटीन जाते हुए पायेंगे. लेकिन सांझ-ढले रंजन कुछ और ही नज़र आयेगा. पीछे को संवारे घुंघराले केश, पान से रचे हुए ओंठ, चिकन का कुरता, बढ़िया लट्ठे का पायजामा, जयपुरी पगरखी. ये हैं संगीत-साधक रंजन भट्टाचार्य - ओपेरा हाउस के एक संगीत विद्यालय के छात्र.’

भारत में रहने वाले लोग भारतीयता के बारे में कई तरह के विचार रखते हैं. कुछ बिंदुओं पर वे विचार परस्पर विरोधी भी लग सकते हैं. लेकिन इस बात पर सभी का एकमत होगा कि भारत में जन्म लेने और रहने वाला ही असली भारतीय है. यानी कोई विदेशी व्यक्ति आत्मा से भारतीय नहीं हो सकता. लेकिन यह किताब स्विट्जरलैण्ड में जन्मी और भारत में बसी सोफिया वाडिया के माध्यम से हमें असली भारतीय होने का नया और बेहद गहरा तर्क देती है. भारतीयता के बारे में बात करते हुए सोफिया कहती हैं -

‘यहां लोग अपने को पहले गुजराती, मराठी...आदि कहलाना चाहते हैं फिर भारतीय, मैं एकदम भारतीय हूं...भारत दुनिया का एकमात्र देश है जिसके इतिहास की धारा कभी टूटी नहीं...हमारी आज हालत यह है कि हमारे पास एक उत्तम औषधि रखी है, मगर हम उसका सेवन नहीं करते. गहन आस्था का भण्डार भरा है, मगर हम उसे नहीं खोलते. अपनी परम्परा और प्रगति का समन्वय कर सकने की योजना हम लगभग छोड़ बैठे हैं...लोग आज समझौते की ओर, सुविधा की ओर बढ़ रहे हैं, फल की चिंता न करते हुए कर्मरत होने का सिद्धान्त उन्होंने छोड़ दिया है. बातें हमारे देश में बड़ी-बड़ी बनायी जाती हैं, पुरखों की जयन्तियां भी धूमधाम से मनायी जाती हैं, लेकिन पुरखों के पदचिन्हों पर कोई चलना नहीं चाहता...मुझसे बड़ा भारतीय और कौन होगा? मैंने उसके उसूलों को समझा है और अपने जीवन में उतारने की कोशिश की है.’

शादी से पहले का प्यार कैसे विवाह संस्था में जाने के बाद बदल जाता है, इसका बहुत ही मनोविश्लेष्णात्मक अध्ययन लेखक ने ‘मांग के साथ तुम्हारा’ नामक अध्याय में करने की कोशिश की है. गुजरात के प्रसिद्ध लेखक तारक मेहता और उनकी पत्नी इला मेहता से बात करते हुए पता चलता है कि शादी के बाद अक्सर ही पति अपनी महत्वाकांक्षाएं नहीं छोड़ता, लेकिन पत्नी की महत्वाकांक्षांए विवाह संस्था में आते ही घर-परिवार के हिसाब से बदलने लगती हैं. महत्वाकांक्षाओं के इस बदलाव में ही प्रेमिका पत्नी बनने लगती है. पति विवाह के बाद भी अक्सर ही उस पूर्व प्रेमिका की छवि को ढूंढता है, लेकिन उससे हर बार टकराती पत्नी है. इसी तथ्य की पुष्टि करता तारक और इला के संवाद का एक टुकड़ा -

‘तारक : ...मैं तुझे मामूली औरत नहीं समझता. मैं मानता हूं कि तू कलाकार है जबकि मैं महज एक कारीगर. तू क्यों नहीं रियाज करती, घरवाली बनने के लिए क्या अपनी सारी महत्वाकांक्षा ख़त्म कर देना जरूरी है? महत्वाकांक्षा की तेरी मेरी ज्वाइंट स्टॉक कम्पनी थी और अब तू अपने सारे शेयर खींचे ले रही है. तू हेलीकॉप्टर की तरह घर-आंगन पर मंडराती है और मैं चाहता हूं कि तू जेट की तरह आनन-फानन कहां से कहां पहुंच जाये.

...मैं दो इलाओं के प्रेम में हूं, एक वह जो मेरे मन में है और एक वह जो मेरी पत्नी बन बैठी है. प्रेयसी से तुझे पत्नी बनाया अब वापस पत्नी से प्रेयसी बनाना चाहता हूं.’

इस किताब की सबसे दिलचस्प बात यह है कि यहां लेखक ने आम लोगों से हर तरह के विषयों के बारे में बातचीत/साक्षात्कार करके उन्हें बहुत खास महसूस करवाया है. मनोहर श्याम जोशी उन मामूली लोगों को ‘नायक’ कहते हैं, जिनकी गिनती व्यवस्था ‘इंसानों’ में भी नहीं करती! यह किताब जाने-अंजाने उन असंख्य लोगों को नायक का खिताब देती है, जिनकी बदौलत न सिर्फ मुम्बई महानगरी बल्कि पूरा देश अपनी रफ्तार से अनवरत चल रहा है. नायकों की भाषा को लेखक ने बिना किसी छेड़छाड़ के उन्हीं के देसी अंदाज में दर्ज किया है. इस कारण पाठकों की रसानुभूति बढ़ जाती है और वे इन नायकों को अपने सामने बात करते हुए महसूस कर पाते हैं.

मनोहर श्याम जोशी आम आदमी के सबसे कुशल चितेरे हैं. वे इस किताब में देश की संस्कृति, मध्यम वर्ग, भारतीयता, समाज, विवाह, प्रेम आदि बड़े मुद्दों को छोटी-छोटी नजरों की रौशनी में देखने का सफल और रोचक प्रयास करते हैं. इस किताब की बातचीत हमारा खुद से और इस देश की आत्मा से साक्षात्कार करवाने में सफल होती है.

इस पुस्तक के अध्याय ‘दिल्ली की देवियां’ का एक अंश:

‘मैं तो यहां तक कहूंगी कि सही जिज्ञासा की यह कमी ही भारत की खुसूसियत है. शोध-प्रबन्ध की सामग्री जुटाने के लिए विश्वविद्यालयों के इर्द-गिर्द काफ़ी रह चुकने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंची हूं कि भारत में विद्या भी वृत्ति नहीं, व्यवसाय है. डिग्रियों की यहां न कोई कद्र है, न कीमत. रेवड़ी की तरह बंटती हैं. योरोप में जितना ज्ञान विश्वविद्यालय में प्रवेश पाने के लिए अपेक्षित होता है, उतना, माफ़ कीजिएगा, आपके कई पीएचडी वालों को भी नहीं होता. जिज्ञासा का अभाव, कूपमण्डूकता, चापलूसी, अनुदारता, नौकरी-पेशा निगाहें- विद्या के क्षेत्र में इन्हें पाकर सचमुच बड़ी कोफ़्त हुई...

विदेशों में भारत को सपेरों और राजाओं का देश समझने की गलती अमूमन हो जाती है. एक और भ्रान्ति योरोप के शिक्षित वर्ग में दृष्टिगत होती है - भारत को आदर्श, अध्यात्म और अनुशासन का देश समझने की. अब यह देखिये कि भौतिक सुख की, रुपये-पैसे की, जितनी कद्र भारत में है, उतनी शायद...सम्भव है, किसी स्तर पर ज्ञान-विज्ञान का यहां सम्मान होता हो, मगर आम ज़िदगी में तो सिक्का ही सर्वोपरि है.’

किताब : महानगरी के नायक

लेखक : मनोहर श्याम जोशी

प्रकाशन : वाणी

कीमत : 195 रुपये

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