पूर्णिमा देवी बर्मन बचपन से ही प्रकृति के प्रति आकर्षित रही हैं . उनके इसी प्रकृति प्रेम ने उन्हें जीवविज्ञान पढ़ने को प्रेरित किया. और इसी प्रेम ने पेड़ों पर मौजूद घोसलों की सुरक्षा के लिए उन्हें उकसाया. प्रकृति प्रेमी पूर्णिमा देवी बर्मन के शब्दों में उनकी ही कहानी  ......

असम में बहने वाली ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे स्थित एक गांव में मेरा जन्म हुआ था. मेरा बचपन का ज्यादातर समय प्रकृति को निहारने उसे समझने मे ही बीता. संभवतः यही कारण होगा कि प्रकृति से मेरी दोस्ती बहुत जल्द और प्रगाढ हो गई थी. इतनी कि मैं उसके लिए समर्पित हो गई.

बचपन के कुछ दृश्य मुझे आज भी अच्छी तरह याद हैं. आसमान में राजा की तरह उड़ने वाले गिद्धों और सरसों के खेतों में जानवरों के शवों को खाते गिद्ध. उन्हें देखना मैं कैसे भूल सकती हूं. अक्सर मैं उनके बारे में दादी से खूब सवाल किया करती थी. तब न दादी को पता था और न ही मुझे ही कि ये पूछताछ एक दिन मेरे भविष्य का आधार बनेगी और मैं पर्यावरण को बचाने के लिए हो रहे प्रयासों में अपना भी कुछ योगदान कर सकूंगी.

पूर्णिमा देवी बर्मन

प्रकृति से बढ़ते लगाव के कारण ही जीव विज्ञान में भी मेरी दिलचस्पी बढ़ती गई. जाहिर है कि फिर इसी विषय पर मैंने अपनी पढ़ाई भी जारी रखी. जब मैं ग्रेजुएशन कर रही थी, तभी मैंने प्रकृति को अपने ज्ञान के आधार पर कुछ वापस करने का फैसला किया. आज की तरह उस समय भी जीवों की कई प्रजातियों के विलुप्त होने के खतरे से जुड़ी खबरें सामान्यतया समाचार पत्रों में पढ़ने को मिलती रहती थी.

मैंने गुवाहाटी के बगल के जिले कामरुप के दादरा और पचरिया गांवों में विलुप्त हो रही जीव प्रजातियों के हक में अपना काम करना शुरु करने का फैसला किया. काम के सिलसिले में मैंने पहले कई सर्वेक्षण किए. इस सर्वेक्षण के दौरान मैंने पाया कि कई दुर्लभ चिड़ियों की प्रजातियां इसलिए खतरे में थी, कि जिन पेड़ों को काटने का प्लान होता था, उन पर काटते समय ये ध्यान नहीं दिया जाता कि उनमें घोंसले भी हो सकते है. अक्सर पेड़ों की कटान में अंडे समेत घोसले भी नष्ट हो जाते हैं. पेड़ों की सूखी लकड़ियां टूटकर गिरते हुए घोसलों को और अधिक नुकसान पहुंचाती थीं.

यही सब देखकर मैंने पेड़ों पर मौजूद घोसलों की सुरक्षा के लिए उनके नीचे एक जाल लगाना शुरु किया. वाइल्ड लाइफ कंजर्वेशन के लिए काम करने वाले गुवाहाटी के एक एनजीओे ‘आर्यटन‘ और क्षेत्रीय लोगों के साथ मिलकर मैंने ऐसे कई जाल लगवाए. इस पूरी कवायद को करते समय मेरे लिए ज्यादा जरुरी ये था कि मैं यहां के लोगों और उनका अपनी संस्कृति के लिए समर्पण का पूरा ध्यान रखूं. कई त्योहारी मौकों पर असम के लोग पक्षियों की पूजा करते हैं. और मुझे इन्हीं पक्षियों का ही अस्तित्व खतरे में नजर आ रहा था.

पूर्णिमा देवी बर्मन

पक्षी संरक्षण, मेरे लिए यह काम इतना आसान भी नहीं था. दस हजार से ज्यादा आबादी वाले इलाके में मैं काम कर रही थी. सबको अपने साथ लेकर चल पाना बहुत मुश्किल काम था, लेकिन नामुमकिन नहीं, ये मैं जानती थी लेकिन ये काम ऐसा था कि बिना जनभागीदारी के पूरा नहीं हो सकता था. फिर भी मैंने अपना काम जारी रखा. कई मर्तबा ऐसे मौके भी आए कि कुछ असामाजिक तत्वों ने हमारे पक्षी संरक्षण अभियान को प्रभावित करने की कोशिश की. मगर मेरा सौभाग्य कि ऐसे समय में मेरे साथ की महिलाओं, बच्चों और दूसरे लोगों की ताकत हमेशा उन पर हावी रही.

कुछ समय बाद महिलाओं के साथ लेकर मैंने एक टीम भी बनाई और गर्व के साथ अपना काम जारी रखा. फिर चाहे पुलिस की मदद लेनी हो या अन्य संरक्षण प्रयासों से जुड़ने की बात हो, मेरा उत्साह हर जगह बरकरार रहा. इस काम में मुझे मेरे पति का पूरा सहयोग मिला. चूंकि वह खुद एक जीवविज्ञानी हैं तो ये अच्छी तरह से समझते थे कि मैं क्या कर रही हूं. सच तो ये है कि उन्होंने मेरे काम को हमेशा सराहा. आज मैं दो बच्चों की मां हूं और साड़ी पहनकर भी पेड़ों के पास बांस के बने टावरों पर चढ़ने मे जरा भी नहीं हिचकिचाती.

अपना काम करते वक्त मैंने महसूस किया कि एक अकेली महिला को पक्षियों की प्रजातियों के संरक्षण के लिए इस तरह काम करते देखना कई लोगों को भद्दा भी लगता है. लेकिन मैंने इन सब बातों पर कभी ध्यान नहीं दिया. यही मेरा जुनून है और अपने काम से मैं बहुत खुश हूं. मैं मानती हूं कि अपने लक्ष्य पर ध्यान बनाए रखा जाए, तो कोई भी चुनौती आपके रास्ते का रोड़ा नहीं बन सकती.

साभार: kusumaa.com

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