हम सब शहीद भगतसिंह को तो जानते है. लेकिन हम में से बहुत ही कम लोग होंगे जो भारत के लिए शहादत देने वाले उस क्रबटुक को जानते हो जिन्हें खुद शहीद-ए-आजम भगतसिंह अपना गुरु मानते थे. महज 19 साल की उम्र अपने देश को अंग्रेजों के चंगुल से छुड़ाने के लिए कुर्बानी देने वाले देश के इस गुमनाम क्रांतिकारी का नाम है करतार सिंह सराभा. शहीद भगत सिंह भी करतार सिंह सराभा को अपना प्रेरणा स्रोत मानते थे. शहीद भगत सिंह तो उनका फोटो भी अपने जेब में रखते थे.

24 मई 1896 को पंजाब के लुधियाना में शहीद करतार सिंह का जन्म हुआ. उनके पिता का नाम सरदार मंगल सिंह और माता का नाम साहिब कौर था. करतार सिंह अपनी शुरुआती शिक्षा लुधियाना में ही प्राप्त करने के बबाद उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका चले गए. वहां उन्होंने पढ़ाई के लिए मजदूरी तक की. इस दौरान उन्होंने जब मजदूरों के साथ नस्लीय भेदभाव होते देखा तो अंग्रेजों के खिलाफ उनके दिल में नफरत भर गई. उसी समय उनका संपर्क लाला हरदयाल से हुआ, जो अमेरिका में रहते हुए भी भारत की स्वतंत्रता के लिए प्रयत्नशील थे.

25 मार्च, 1913 ई. में ऑरेगन प्रांत में भारतीयों की एक बहुत बड़ी सभा हुई, जिसके मुख्य वक्ता लाला हरदयाल थे. लाला हरदयाल ने सभा में कहा था, ‘मुझे ऐसे युवकों की आवश्यकता है, जो भारत की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण दे सकें.’ इस पर सबसे पहले करतार सिंह सराभा ने उठकर अपने आपको पेश किया. 21 अप्रैल, 1913 को अमेरिका में भारतीयों ने गदर पार्टी की स्थापना की और ‘गदर’ नाम का साप्ताहिक अखबार निकालने का फैसला किया जिसकी जिम्मेदारी करतार सिंह सराभा को सौंपी गई. इस अखाबर में देशभक्ति से पूर्ण जोशीली कविताएं छपती थीं जिसका लोगों पर काफी असर हुआ.

इसके गदर पार्टी ने अंग्रेजों के खिलाफ देश में विद्रोह के लिए 21 फरवरी, 1915 का दिन तय किया था. लेकिन गद्दार मुखबिर किरपाल सिंह ने ब्रिटिश सरकार को इसकी सूचना दे दी. इस बात की भनक जब क्रांतिकारियों को लगी तो उनलोगों ने विद्रोह की तारीख 19 फरवरी कर दी, इसके बारे में भी अंग्रेजों को पता लगा गया. इसके बाद अंग्रेज शासन ने उनलोगों के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी. उन्होंने अपने साथियों के साथ अपने एक हमदर्द के यहां शरण लिया था लेकिन वह भी गद्दार निकला और सभी को गिरफ्तार करवा दिया.

करतार सिंह सराभा और उनके साथियों के खिलाफ राजद्रोह, डकैती और कत्ल का मुकदमा चलाया गया. अदालत ने सराभा समेत सभी 24 क्रांतिकारियों को फांसी की सजा सुनाई. 16 नवंबर, 1915 को करतार सिंह सराभा और उनके 6 साथियों को फांसी दे दी गई. उस समय करतार सिंह सराभा की उम्र सिर्फ 19 साल थी. सराभा और उनके साथी हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूल गए. शहीद करतार सिंह जैसे कितने ही वीर सपूत भारत की आजादी के लिए मौत के गले लगकर इतिहास के पन्नों में कहीं खो गए.

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