कुछ करने से बचना हो तो आदमी लाख बहाने निकाल लेता है और वो भी एक से एक. लेकिन अगर कुछ करने की चाह हो तो उसी काम को करने के लिए अनगिनत रास्ते अपने आप निकल आते हैं. हम भी अक्सर सड़कों से गुजरते वक्त न जाने कितने बेबस और लाचार लोगों को भूख से तड़पते और बिलखते देखते होंगे. इनकी ऐसी हालत देख हमारे दिल में भी ऐसे लोगों के लिए कुछ करने का ख्याल दस्तक देता होगा. लेकिन कभी समय का अभाव तो कभी पैसे की तंगी का रोना रोकर हममें से ज्यादातर लोग अपनी इस सोच की दिमाग में भी भ्रूणहत्या कर देते हैं. यह तो हमारी और आपकी बात हुई.

लेकिन सैयद उस्मान अजहर मकसुसी तो हम सबसे एकदम अलग निकले. क्योंकि साल 2012 में जब उन्होंने एक बार सड़क के किनारे पड़ी लक्ष्मी को भूख से बिलखते देखा तब उन्होंने ना सिर्फ लक्ष्मी को खाना खिलाया बल्कि उसी दिन यह तय किया कि वह लक्ष्मी जैसे अन्य भूखे लोगों का भी पेट भरने का काम करेंगे. अपने सीमित संसाधनों से जितना हो सकेगा उतने लोगों को ही सही लेकिन भूखों को खाना खिलाने का काम किसी भी स्थिति में और किसी भी स्तर पर करेंगे. एक दिन अचानक उनके पिता की मृत्यु हो गई.

उस वक्त अज़हर की उम्र महज चार वर्ष थी. चार भाई बहनों में तीसरे नंबर के अज़हर को पिता की मृत्यु के बाद आर्थिक तंगी के चलते अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी. यही वह समय था जब अज़हर को दिन में मुश्किल से एक बार खाना मिलता. कभी-कभी तो उन्हें और उनके परिवार को वह भी नसीब नहीं होता था. साल 2012 की इस घटना को 6 साल हो गए. और पिछले 6 सालों से अज़हर हैदराबाद के दबीरपुरा फ्लाईओवर के नीचे जमा होने वाली भीड़ को दोपहर का खाना खिलाते आ रहे हैं. पिछले 6 सालों में एक भी दिन ऐसा नहीं गया जिस दिन अज़हर दोपहर 12:30 के आसपास खाना लेकर दबीरपुरा फ्लाईओवर न गए हों.

फ्लाई ओवर के नीचे थाली और चटाई लेकर बैठे भिखारियों, बेघरों, कचरा बीनने वालों, मज़दूरों और जरूरतमंदों के लिए 36 वर्षीय अज़हर रोज़ दोपहर 12:30 बजे खाना लेकर किसी मसीहा की तरह प्रकट होते हैं. खाने में गर्म और स्वादिष्ट खाना अज़हर खुद अपने हाथों से सभी को कतारबद्ध तरीके से परोसते हैं. अज़हर का मानना है कि भूख का कोई धर्म नहीं होता. ऐसा वह इसलिए कहते हैं क्योंकि वह खुद अपने बचपन में गरीबी और भूख को बेहद करीब से देख चुके हैं. अपनी कहानी सुनाते हुए अज़हर बताते हैं कि उनके पिता ऑटो चलाया करते थे. ऑटो की कमाई से ही जैसे-तैसे उनका घर चलता था. लेकिन एक दिन अचानक उनके पिता की मृत्यु हो गई. उस वक्त अज़हर की उम्र महज चार वर्ष थी. चार भाई बहनों में तीसरे नंबर के अज़हर को पिता की मृत्यु के बाद आर्थिक तंगी के चलते अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी. यही वह समय था जब अज़हर को दिन में मुश्किल से एक बार खाना मिलता.

कभी-कभी तो उन्हें और उनके परिवार को वह भी नसीब नहीं होता था. भूख क्या होती है इस बात को अज़हर बहुत अच्छी तरह समझते थे. शायद इसलिए बात जब भूखों को खाना खिलाने की आई तो उन्होंने इस काम में अपना सर्वस्व झोंक दिया. सुबह और शाम को अपनी प्लास्टर ऑफ पेरिस की दुकान पर बैठने वाले अज़हर अपना दोपहर लोगों को खाना खिलाने में बिताते हैं.

शुरू में खाना खाने वाले लोगों की संख्या 30-35 हुआ करती थी, जो अब बढ़कर 150 के पार पहुंच गई है. पहले खाना खाने वालों की संख्या कम थी तो खाना बनाने का काम अज़हर की पत्नी ही करती थी. लेकिन आजकल यह काम अज़हर की संस्था ‘सनी वेलफेयर फ़ाउंडेशन’ करती है. तीन साल पहले दबीरपुरा के साथ-साथ अज़हर की संस्था ने सिकंदराबाद स्थित गांधी अस्पताल में भी भूखों को खाना खिलाने की व्यवस्था का शुरू कर दी.

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