इनदिनों. कर्नाटक में हालांकि भाजपा की 55 घंटे पुरानी सरकार को विदा करने में कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन कामयाब रहा, लेकिन खतरा अभी टला नहीं है... भाजपा फिर से मौके की तलाश में है और भविष्य में कभी भी कांग्रेस-जेडीएस सरकार को भाजपा की चुनौती का सामना करना पड़ सकता है?

भाजपा को जोड़तोड़ की राजनीति इसलिए भी जारी रखनी पड़ेगी कि 2019 के लोकसभा चुनाव तक यदि कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन रह गया तो दोनों मिलकर चुनाव लड़ेंगे और ऐसी स्थिति में भाजपा को कर्नाटक में 28 में से आधा दर्जन सीटें मिलना भी मुश्किल हो जाएगा! 

भाजपा का अब भी मानना है कि वह कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस के आपसी विरोध के चलते सत्ता में वापस आ सकती है? 

कर्नाटक विधान सभा चुनाव में सबसे ज्यादा 104 सीटें जीतने, सत्ता को लेकर चली रस्साकशी के बाद भी शपथ ग्रहण करने और बहुमत नहीं जुटा पाने के कारण सीएम बीएस येदियुरप्पा के इस्तीफे के बावजूद भी अभी भाजपा को उम्मीद है कि वह फिर से सत्ता में लौटेगी!

भाजपा नेताओं के हवाले से मीडिया रिपोट्र्स में कहा गया है कि... हम भले ही अभी लड़ाई हार गए हों, लेकिन आगे जंग हम ही जीतेंगे!

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कर्नाटक में सरकार बनाने की भाजपा की जिद दो कारणों से थी, पहला... भाजपा का मानना था कि जनादेश पार्टी के पक्ष में है और दूसरा... कर्नाटक में उसकी सरकार होने से दक्षिण भारत के अन्य हिस्सों में उसकी सियासी सफलता की संभावनाएं बढ़ जाती?

वैसे तो कर्नाटक को छोड़कर भाजपा किसी अन्य दक्षिण भारतीय राज्य में अब तक गंभीर चुनौती पेश नहीं कर पाई है, लेकिन उनका मानना है कि दक्षिण भारत में भाजपा समर्थक मतदाता लगातार बढ़ रहे हैं, खासतौर पर लिंगायतों का भाजपा को सशक्त समर्थन न केवल उसे कर्नाटक में प्रमुख ताकत बनाए रखेगा बल्कि दक्षिण भारत के और राज्यों में प्रवेश के अवसर भी प्रदान करेगा!

हालांकि... येदियुरप्पा सरकार के नाटकीय तरीके से गिरने को भाजपा के लिए तगड़ा झटका माना जा रहा है, लेकिन एक तो भाजपा बहुमत के एकदम करीब है और दूसरा यह कि... सत्ता के बंटवारे को लेकर कभी भी कांग्रेस और जेडीएस में विवाद संभव है, इसलिए भाजपा की कर्नाटक में पारी समाप्त नहीं मानी जा सकती है!  

भाजपा के इस अनुमान से हट कर राजनीतिक जानकारों का मानना है कि क्योंकि कांग्रेस के लिए कर्नाटक की सत्ता से ज्यादा महत्वपूर्ण 2019 के आम चुनाव हैं जब कांग्रेस, क्षेत्रीय दलों के समर्थन के बगैर भाजपा को केन्द्र सरकार से नहीं हटा सकती है इसलिए ज्यादा सीटें होते हुए भी कांग्रेस ने जेडीएस को सरकार बनाने का अवसर दिया, आगे भी कांग्रेस अपनी ओर से शायद ही जेडीएस के लिए सख्त रूख अपनाए, जाहिर है... कम-से-कम 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले तक तो कांग्रेस, जेडीएस पर आक्रामक नहीं होगी? 

कांग्रेस और जेडीएस को असली खतरा तो अपने उन विधायकों से है जो स्वतंत्र होने के बाद भाजपा के दबाव या जोड़तोड़ के प्रभाव में आ सकते हैं? 

भाजपा के लिए कर्नाटक की जोड़तोड़ अभी भी इसलिए जरूरी है कि यदि लोकसभा चुनाव तक कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन सफलतापूर्वक रह गया तो लोकसभा चुनाव दोनों मिल कर लड़ेंगे और ऐसी स्थिति में भाजपा, जो अभी करीब डेढ़ दर्जन सीटें ले कर बैठी है, घट कर लगभग आधा दर्जन सीटों पर आ जाएगी? मतलब... केन्द्र में भाजपा को बड़ा झटका!

ताजा राजनीतिक हालात में लिंगायत नेताओं का महत्व बढ़ गया है और जो भी दल इन्हें साधने में कामयाब हो जाएगा, वही सफलता को थामे रखेगा? अभी भी लिंगायत समुदाय भाजपा के साथ है, ऐसे में कर्नाटक की कांग्रेस-जेडीएस सरकार के लिए परेशानी बढ़ाने में भाजपा को ज्यादा ताकत नहीं लगानी पड़ेगी? 

कर्नाटक फार्मूले की कामयाबी के लिए कांग्रेस को प्रादेशिक स्तर पर और क्षेत्रीय दलों को राष्ट्रीय स्तर पर बड़े त्याग की जरूरत पड़ेगी और यदि ऐसा नहीं हो पाया तो भाजपा को मात देना गैरभाजपाइयों के लिए संभव नहीं होगा?

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