आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जन्मदिन विशेष 

सिर्फ राजनीतिक नहीं साहित्यक क्षेत्र में भी अव्वल है रायबरेली 

इसमें दो राय नहीं कि देश की राजनीति में उत्तर प्रदेश का रायबरेली क्षेत्र एक विशेष महत्व रखता है. यही वो  क्षेत्र है जिसने इंदिरा गांधी , सोनिया गांधी जैसे दिग्गज राजनेता देश को दिए हैं. कहा तो ये भी जाने लगा था कि रायबरेली से ही राजनीति दिल्ली तक पहुँचती है. किन्तु इस क्षेत्र को महज राजनीतिक दायरे में देखना भी अनुचित है क्योंकि यहां से साहित्य के क्षेत्र में देश को एक ऐसा महामानव प्राप्त हुआ है जिसके नाम के सम्मुख राजनीति के इन दिग्गजों का मूल्यांकन कमतर पड़ जाता है. किन्तु ये दुर्भाग्य ही है कि साहित्य के क्षेत्र में देश के इस इलाके का नाम बहुत पीछे छूट गया है. जबकि उसे अव्वल होना था. क्योंकि इस क्षेत्र की  मिट्टी को आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी और मलिक मुहम्मद जायसी जैसे महान साहित्यकारों ने न केवल पावन किया है बल्कि भारत का नाम भी रोशन किया है.  

महावीर प्रसाद द्विवेदी हिन्दी के ऐसे पहले साहित्यकार थे, जिनको ‘आचार्य’ की उपाधि मिली थी. किन्तु अफ़सोस है कि आज उनके नाम की जगह गांधी परिवार के नाम से रायबरेली को देखा-पढ़ा और सुना जाता है. हालांकि राजनीतिक मामले में इसके महत्त्व को किसी प्रकार से कम नहीं किया जा सकता मगर साहित्य के इस आचार्य को भुला देना देश की भी सबसे बड़ी भूल ही माना जाएगा. बहरहाल, साहित्य में आचार्य होना कम बड़ी बात नहीं है. संस्कृत में आचार्यों की एक परंपरा थी. आचार्य वही बन सकता था जो प्रकाण्ड पंडित हो यानी जिसे अपने विषय का शत प्रतिशत ज्ञान हो, जिसने साहित्य के क्षेत्र को अपनी प्रतिभा से बागबान बनाया हो.  

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी

महावीर प्रसाद द्विवेदी ऐसे ही महान साहित्यकार हुए हैं और कितना बड़ा सौभाग्य है रायबरेली का उसके  जिले दौलतपुर गाँव में उनका 9 मई 1864 में जन्म हुआ था. आचार्य के पिता का पं॰ रामसहाय दुबे ईस्ट  इंडिया कंपनी की सेना में नौकरी करते थे. सामान्य और मध्यम वर्ग के परिवार में बालक महावीर प्रसाद की प्रारम्भिक शिक्षा गाँव की पाठशाला में ही हुई. ये भी जानकारी वाला तथ्य है कि घरेलू परिस्थितियों और धनाभाव के कारण इनकी शिक्षा का क्रम अधिक समय तक न चल सका. और उन्हें जी आई पी रेलवे  (Great India Peninsula Railway) में नौकरी करनी पडी थी. 

उन्होंने रेलवे विभाग अजमेर में एक वर्ष का प्रवास किया. नौकरी छोड़ कर मुंबई प्रस्थान किया और टेलीग्राफ का काम सीख कर इंडियन रेलवे में तार बाबू के रूप में नियुक्त हुए. उन्होंने बड़ी लगन और परिश्रम से काम किया तथा उन्नति करते-करते एक महत्वपूर्ण पद पर पहुँच गए. अपने  उच्च  अधिकारी से ना पटने और स्वाभिमानी स्वभाव के कारण इन्हें अपनी नौकरी से इस्तीफ़ा देना पड़ा. सबसे बड़ी खूबी ये रही कि नौकरी के साथ-साथ द्विवेदी जी अध्ययन में भी जुटे रहे और हिंदी के अतिरिक्त मराठी, गुजराती, संस्कृत आदि का अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया.

जीवन क्रम में वे सन् 1903 में ‘सरस्वती’ के सम्पादक बनाए गए. ‘सरस्वती’ का संपादक बनने से पूर्व ही द्विवेदी जी अपने अनुवाद-कार्य और आलोचनात्मक लेखों के कारण हिन्दी भाषा में लिखने वाले चर्चित व्यक्ति बन चुके थे. ‘सरस्वती’ के सम्पादक के रूप में द्विवेदी जी ने हिन्दी भाषा को परिष्कृत करते हुए हिन्दी साहित्य के विकास को गति और दिशा प्रदान की साथ ही हिन्दी भाषा को ज्ञान-विज्ञान के अन्य विषयों का माध्यम बनाने की कोशिश भी की  सन् 1920  तक ‘सरस्वती’ का सम्पादन करने के बाद द्विवेदी जी 18 वर्ष तक अपने पैतृक गाँव में ही रहे. इनका अंतिम समय बड़ी कठिनाई में बीता. 21 दिसंबर सन् 1938 में द्विवेदी जी का निधन हो गया. 

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी

यह माना जा सकता है कि द्विवेदी जी ने हिंदी भाषा और इसके साहित्य के प्रति अगाध लगाव के वश एक बड़ा त्याग किया था. जरा सोचिये अगर वे अपनी रेलवे की नौकरी में ही जुटे रहते तो फिर क्या होता. क्या हिंदी भाषा को वे बहुत से लेखक मिल पाते जो उनके बताए-दिखाए रास्ते पर उनकी सोच और नैतिकता को केंद्र में रखकर एक आदर्श संसार की संकल्पना लेकर उनके साथ चले थे. रामचंद्र शुक्ल, विश्वम्भरनाथ शर्मा कौशिक, पदुमलाल पन्नालाल बख्शी, मैथिलीशरण गुप्त जैसे हिंदी साहित्य के न जाने कितने चमकते नाम इसी काल की देन हैं जिसे हम द्विवेदीकाल के नाम से जानते हैं.

द्विवेदी जी ने विज्ञान के विविध क्षेत्रों, अर्थशास्त्र, इतिहास, पुरातत्व, विज्ञान, चिकित्सा, राजनीति, जीवनी आदि सामग्री से हिंदी के अभावों की पूर्ति की| हिंदी गद्य को संवारने और परिष्कृत करने में आजीवन संलग्न रहे| उस समय टीका टिप्पणी करके सही मार्ग का निर्देशन देने वाला कोई नहीं था आपने इस अभाव को दूर किया तथा भाषा के स्वरूप, संगठन, वाक्य विन्यास, विराम चिन्हों के प्रयोग तथा व्याकरण की शुद्धता पर विशेष बल दिया| स्वयं लिखकर तथा दूसरों से लिखवाकर हिंदी गद्य को पुष्ट और परिमार्जित किया, द्विवेदी जी ने विस्तृत रूप में साहित्य रचना की. इनके छोटे-बड़े ग्रंथों की संख्या कुल मिलाकर 81 है. पद्य के मौलिक-ग्रंथों में काव्य-मंजूषा, कविता कलाप, देवी-स्तुति, शतक  विनय-विनोद,स्नेह-माला आदि प्रमुख है. गंगा लहरी, ॠतु तरंगिणी, कुमार संभव सार आदि इनके अनूदित पद्य-ग्रंथ हैं. गद्य के मौलिक ग्रंथों में तरुणोपदेश, नैषध चरित्र चर्चा, हिंदी कालिदास की समालोचना, नाटय शास्त्र, हिंदी भाषा की उत्पत्ति, कालीदास की निरंकुशता आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं. अनुवादों में वेकन विचार, रत्नावली, हिंदी महाभारत, वेणी संसार आदि प्रमुख हैं.

महावीर प्रसाद द्विवेदी की कोई संतान नहीं थी. उन्होंने अपने भांजे कमला किशोर त्रिपाठी को गोद लिया था. मनोरमा देवी शर्मा अपने पिता कमला किशोर त्रिपाठी की अकेली ही संतान ही थीं. इस प्रकार महावीर प्रसाद द्विवेदी की पौत्री मनोरमा देवी थी. विवाह के  बाद इनके पति का स्वर्गवास हो गया. मनोरमा देवी जी ने जीवन में बहुत सी कठिनाइयों का सामना किया और अंत में संन्यास ले लिया था. इन्होंने अपनी अन्तिम सांस हरीद्वार में ली थी. मनोरमा देवी के बाद द्विवेदी जी के पैतृक संपत्ति की देखभाल करने वाला कोई नहीं है. द्विवेदी जी की पैतृक संपत्ति में 60 से 65 विगहे ज़मीन है जिसमें बाग बगीचे भी आते हैं. 

यूं तो साहित्य की धरोहर को बचाने और उसे नित नए ढंग से प्रचारित करने के लिए कुछ विशेष कार्य होते रहे हैं , जिनकी वजह से ही यदि ये कहा जाए कि द्विवेदी जैसे साहित्य के पुरोधा आज भी हमारे बीच अमर  हैं तो गलत नहीं कहा जाएगा.आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के नाम पर एक समिति का गठन 1998 में हुआ जिसका नाम आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी राष्ट्रीय स्मारक समिति है. इस समिति द्वारा हर वर्ष आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी पर एक पत्रिका निकाली जाती है जिसका नाम आचार्य पथ है. इस समिति के अध्यक्ष  श्री विनोद शुक्ला जी है. इस समिति के गठन होते ही समिति के कार्यकर्ताओं के द्वारा तहसील स्तर पर, जिला स्तर पर आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के स्मृतियो को समेटने के लिए धरना प्रदर्शन किया जाता है.जब इनकी मांग की सुनवाई नहीं होती है तो  इस समिति के लोगों के द्वारा दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना प्रदर्शन होता है.तब सांसद श्री  कैप्टन सतीश शर्मा द्वारा सांसद कोष से 5 लाख रुपए की राशि इस समिति को दी जाती है.

जिससे आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के भवन के ठीक सामने एक पुस्तकालय और स्मारक का निर्माण किया जाता है.इस राष्ट्रीय स्मारक का अनावरण 30 नवम्बर 2010 में सोनिया गांधी के द्वारा होता है. आज जब हम दौलत पुर गांव जाते हैं तो हमें एक अच्छी पुस्तकालय देखने को मिलती है लेकिन सड़क से दौलत पुर  करीब -करीब 4 किलोमीटर दूर होने के कारण पुस्तकालय में हमें पुस्तकों का आभाव देखने को मिलता है जैसा कि आप हम सभी जानते हैं कि किसी भी पुस्तकालय का महत्व तभी बढ़ता है जब वहां पढ़ने वाले पाठकों की पहुंच हो.

इस समिति के लोगों ने जिला मुख्यालय रानी बिहार में गुहार लगाई तब उस समय के डीएम श्री रेणुका कुमार ने 8 लाख रूपया आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी स्मृति भवन और कृषि पंचायत भवन बनाने के लिए दिया.जब द्विवेदी जी के भवन का स्लैप पड़ रहा था तभी पंचायत के सचिव और प्रधान के बीच विवाद हो गया और भवन का काम वही पर रुक गया. द्विवेदी जी ने निरंतर अपनी भाषा और संस्कृति में निजता की भावना को प्रमुखता देते हुए राष्ट्रीयता की भावना को बल दिया और हिन्दी क्षेत्र में नवजागरण की पृष्ठभूमि तैयार की.

आचार्य द्विवेदी ने हिन्दी भाषा के उत्थान का जो कार्य किया उसके लिए हिन्दी साहित्य समुदाय सदैव उनका ऋणी रहेगा, साथ ही हिन्दी में इनके जैसा आचार्य होने पर हमेशा स्वयं को गौरवान्वित भी महसूस करेगा. जैसा कि हम आप सब जानते है कि द्विवेदी जी के नाम पर हिंदी साहित्य में एक युग चला था उस स्तर को देखते हुए केवल उनके नाम पर डाक टिकट , जो कि भारतीय डाक विभाग द्वारा 15 मई 1966 में प्रसारित हुआ  एक स्मार्क और एक पुस्तकालय या भवन का निर्माण कर प्रशासन  इस तरफ से पल्ला नहीं झाड़ सकता  है.

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी का कद इतना ऊंचा है और हिंदी के प्रति उनका योगदान इतना अतुल्य है जिसे देखते हुए न केवल रायबरेली अपितु उत्तर प्रदेश सरकार, भारत सरकार के साथ समस्त विश्व विद्यालयों के हिंदी विभाग के साथ-साथ यू जी सी के सभी लोगों को कंधे से कंधा मिलाकर द्विवेदी जी का सपना साकार करते हुए हिंदी के प्रति निस्वार्थ भाव से अपना योगदान देना  चाहिए. ये भी एक गहरा अफ़सोस  है कि देश के इतने बड़े साहित्यकार होने के बावजूद आज तक उन्हें पद्मश्री या  पद्मभूषण जैसे राष्ट्रीय सम्मान से भी नवाजे जाने जैसा कदम नहीं उठाया.  सरकार को इस ओर शीघ्रातिशीघ्र ध्यान देना आवश्यक है. क्योंकि जब साहित्य बचेगा, उसके पुरोधा बचेंगे तभी देश भी बचेगा और देश की सनातन साहित्यिक साँसे भी बचेंगी. उसकी संस्कृति को आक्सीजन मिलेगा और देश ज्ञान बल से पुष्ट हो सकेगा.

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