सोम यानी चंद्रमा. दक्ष प्रजापति के श्राप से सोमदेव की कांति कम हुई तो महादेव के वरदान से उन्हें इस श्राप से मुक्ति मिली. इसलिए सोम के नाथ, महादेव का ये प्रचीनतम मंदिर सोमनाथ के नाम से प्रसिद्ध हुआ. इस मंदिर का इतिहास कितना पुराना है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ईसा पूर्व में भी सोमनाथ मंदिर (गुजरात) का अस्तित्व मिलता है.

…सोम यानी चंद्रमा ने दक्ष प्रजापति की 27 कन्याओं (27 नक्षत्र) से विवाह किया लेकिन उनमें से रोहिणी ही सोमदेव को प्रिय थी. सोमदेव बाकी कन्याओं की उपेक्षा करते थे. शेष कन्याओं ने इसकी शिकायत पिता राजा दक्ष से की. क्रोध में दक्ष ने चंद्रदेव को श्राप दिया कि हर दिन उसका तेज क्षीण होता जाएगा. जिससे रोज़ चंद्रमा का तेज घटता गया. विचलित सोमदेव ने भगवान शंकर की आराधना की. भगवान शंकर ने वरदान दिया कि एक पक्ष में श्राप के कारण जहां चंद्रमा का तेज क्षीण होगा, दूसरे पक्ष में प्रतिदिन बढ़ा करेगा .

12 ज्योर्तिलिंगों में पहला है सोमनाथ 

हिंदू धर्म की हजारों वर्षों की यात्रा का साक्षी रहा ये स्थान 12 ज्योर्तिलिंगों में पहला है. ऋग्वेद, स्कंदपुराण, श्रीमद्भागवत गीता, शिवपुराण सहित कई प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में इस मंदिर का उल्लेख मिलता है.

सोमनाथ ज्योतिर्लिंग का नाम प्राणनाथ होगा

सोमनाथ मंदिर के बारे में मान्यता है कि ये हर सृष्टि में यहां मौजूद रहा है. स्कंदपुराण में उल्लेख है कि सोमनाथ ज्योतिर्लिंग का नाम हर नई सृष्टि के साथ बदल जाता है. सोमनाथ के आठ नाम अबतक बदल चुके हैं. मौजूदा सृष्टि का जब अंत हो जाएगा और ब्रह्माजी जब नई सृष्टि रचेंगे, तब सोमनाथ ज्योतिर्लिंग का नाम प्राणनाथ होगा.

महमूद गजनवी ने अपने लड़ाकों के साथ लूटा

सोमनाथ मंदिर अपने शुरुआती दौर से ही वैभवशाली रहा है. अरब यात्री अलबरूनी ने अपने यात्रा वृतांत में इसका विवरण लिखा, जिसके बाद गजनी के तुर्क आक्रमणकारी महमूद गजनवी ने अपने पांच हजार साथियों 1024 में सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण कर इसकी अकूत संपदा लूट ली. इसके बाद भी अलाउद्दीन खिलजी, सुल्तान मजफ्फरशाह, अहमदशाह और औरंगजेब ने अलग- अलग समय में मंदिर पर आक्रमण कर इसे नष्ट करने की कोशिश की.

तीन भागो में बँटा है

सोमनाथ का ये वैभवशाली मंदिर गर्भगृह, सभामंडप और नृत्यमंडप के रूप में तीन भागों में बंटा है. 150 फुट ऊंचे इसके शिखर पर स्थित कलश का भार 10 टन है और इसकी ध्वजा 27 फुट ऊंची है. मंदिर का शिल्प अत्यंत आकर्षक और भव्य है.

चंद्रदेव ने सोने से किया निर्माण 

मंदिर की दीवारों पर भगवान शंकर के साथ- साथ ब्रह्मा और विष्णु की बेहद आकर्षक मूर्तियां हैं. ऋग्वेद में उल्लेख है कि इस मंदिर का निर्माण स्वयं चंद्रदेव ने सोने से किया था. ऐसा माना जाता है कि बाद में रवि ने चांदी से इसका निर्माण किया. वहीं भगवान श्रीकृष्ण ने काठ से इस मंदिर का निर्माण करवाया था. पहली बार पत्थरों से सोमनाथ मंदिर का निर्माण राजा भीमदेव ने करवाया था.

प्राचीन ज्ञान- विज्ञान का अनूठा संगम

मंदिर के दक्षिण में समुद्र के किनारे एक स्तंभ है. इस स्तंभ के ऊपर एक तीर रखकर संकेत किया गया है कि सोमनाथ मंदिर और दक्षिण ध्रुव के बीच में पृथ्वी का कोई भूभाग नहीं है. ये हमारे प्राचीन ज्ञान- विज्ञान का अनूठा साक्ष्य है.

यहां तीन नदियों हिरण, कपिला और सरस्वती का महासंगम होता है. इस त्रिवेणी में स्नाथ का विशेष धार्मिक महत्व है. ऐसी मान्यता है कि श्रीकृष्ण के नश्वर देह का अंतिम संस्कार इसी संगम पर हुआ था.

बार- बार आक्रमणकारियों का निशाना बने सोमनाथ मंदिर को राष्ट्रीय स्वाभिमान के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है. देश की आजादी के बाद लौहपुरुण सरदार बल्लभ भाई पटेल ने इस मंदिर का पुनर्निमाण शुरू कराया जो कई वर्षों बाद पूरा हुआ. 1995 में देश के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉक्टर शंकर दयाल शर्मा ने इस मंदिर को राष्ट्र को समर्पित किया.

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