देव उपासना में देवी-देवताओं की परिक्रमा का महत्व है. शास्त्रों में इनकी संख्या भी अलग-अलग बताई गई है. इसी कड़ी में शिव पूजा में शिवलिंग परिक्रमा का विशेष महत्व है, लेकिन शास्त्रों में शिव परिक्रमा के लिए मर्यादाएं नियत है. किंतु इसकी जानकारी के अभाव में भक्त देव अपराध के भागी बनते हैं. हर वह शिव भक्त, जो शिव की पूजा कर कामनाओं को पूरा करना चाहते हैं, पूरी श्रद्धा, आस्था के साथ शिवलिंग परिक्रमा में इन मर्यादाओं का पालन करें.

वहीं, अगर भगवान शिव किसी से नाराज़ हो जाते हैं तो वह रूद्र रूप धारण करने में देर नहीं करते हैं. 

भगवान शिव की प्रदक्षिणा के लिए शास्त्रों का आदेश है कि शिवलिंग की अर्ध-परिक्रमा ही करनी चाहिए.  

‘‘पुष्प दत्त ने भगवान भोले नाथ भंडारी को प्रसन्न कर अदृश्य होने की शक्ति प्राप्त की हुई थी. वह पुष्प तोड़ते हुई भी अदृश्य रहता था इसीलिए किसी को दिखाई नहीं देता था.’’

इस संदर्भ में एक कथा है- पुष्प दत्त नामक गन्धर्वों का एक राजा था. वह भोले नाथ भंडारी का अनन्य भक्त था. भगवान भोले नाथ भंडारी की पूजा के लिए उत्तम सुगंध वाले पुष्प लाने के लिए राजा किसी अन्य राजा की पुष्प वाटिका में जाया करता था और वहां से प्रतिदिन सुंदर-सुंदर फूल चुरा लाता था. 

प्रतिदिन फूलों की चोरी होती देख माली काफी परेशान रहता. उसे बगीची में किसी को आते-जाते न देख कर हैरानी होती. उसने इस संबंध में राजा से बातचीत की तथा फूलों की हो रही प्रतिदिन चोरी को रोकने के लिए एक गुप्तचर की व्यवस्था की जो निगरानी रखेगा कि कौन बगीची से अच्छे-अच्छे फूल चोरी करता है परंतु गुप्तचर नियुक्त करने के बाद भी चोरी ऐसे ही होती रही. 

एक बार जब गन्धर्वराज भगवान शिव भोले नाथ की पूजा-अर्चना कर रहा था तो वह भूलवश शिवलिंग की निर्मली (जल प्रवाहिका) को लांघ गया जिसके फलस्वरूप उसके अदृश्य होने की शक्ति समाप्त हो गई जिसका उसे पता नहीं चला. जब वह दूसरे दिन पुष्प वाटिका में पुष्प लेने गया तो उसे पुष्प तोड़ते माली के रखे हुए गुप्तचर ने पकड़ लिया. उसने अदृश्य होने का प्रयास किया जिसमें वह सफल न हो सका. किसी तरह वह वहां से छूट गया. अगली सुबह पूजा में भगवान मृत्युजंय भोले नाथ भंडारी ने उसकी अदृश्य होने की शक्ति लुप्त हो जाने का रहस्य बतलाया.

सो मुख्य द्वादश ज्योतिर्लिंगों में निर्मली (जहां से शिवलिंग पर जल चढ़ कर जलहरी से नीचे बहता है) के जल वही गड्डा बनाकर एकत्र कर लेते हैं. वहां से निकाल कहीं जमीन में गड्डा बनाकर उसमें जाने देते हैं. यदि निर्मली ढंकी हो और गुप्त रूप से बनी हो तो पूरी परिक्रमा करने पर भी दोष नहीं लगता. आप शिव मंदिर की चारों ओर परिक्रमा कर सकते हैं लेकिन शिवलिंग की निर्मली न लांघने के कारण अर्ध-परिक्रमा दी जाती है. जिन शिवालयों में निर्मली की समुचित व्यवस्था नहीं होती, जल साधारण खुली नालियों की तरह बहता है उसे कदापि नहीं लांघना चाहिए, दोष लगता है.

बता दें कि अगर आप भी भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए शिवलिंग की पूजा करने के बाद परिक्रमा करते हैं तो जान लें परिक्रमा करने का सही तरीका.

हिन्दू देव पूजा परंपराओं में जहां अन्य कई देवताओं की पूरी परिक्रमा ली जाती है, वहीं शिवलिंग की परिक्रमा के लिए आधी ही परिक्रमा का विधान है. अगली स्लाइड्स पर जानिए आखिर क्यों नहीं की जाती है शिवलिंग की पूरी परिक्रमा व कैसे करनी चाहिए शिवलिंग की आधी परिक्रमा-

हिन्दू शास्त्रोक्त पूजा परंपराओं में जहां भगवान विष्णु या मंदिर की परिक्रमा चार बार, गणेशजी की तीन बार व देवी की एक पूरी परिक्रमा नियत है, किंतु शिवलिंग की आधी परिक्रमा की ही मर्यादा नियत हैं. जानिए, कैसे होती और क्यों की जाती है आधी परिक्रमा-

- भगवान शिव की पूजा के बाद शिवलिंग की परिक्रमा हमेशा बाईं ओर से शुरू कर जलाधारी के आगे निकले हुए भाग यानी जल स्त्रोत (जहां से भगवान शिव को चढ़ाया जल बाहर निकलता है) तक जाकर, वहां से फिर विपरीत दिशा में लौट दूसरे सिरे तक आकर परिक्रमा पूरी की जाती है. इस दौरान शिव पंचाक्षरी या कोई भी शिव मंत्र स्मरण किया जाता है.इसे ही शिवलिंग की आधी परिक्रमा कहा जाता है.

- इस दौरान जलाधारी या अरघा के स्त्रोत को लांघना नहीं चाहिए, क्योंकि माना जाता है कि उस जगह पर अद्भुत देवीय ऊर्जा का भंडार और अलौकिक शक्तियों का केन्द्र होता है.

शास्त्रों में शिवलिंग के ऐसे दिव्य ऊर्जा व शक्ति स्थल से गुजरने के बताए प्रभाव व परिणाम भी शिवलिंग की आधी परिक्रमा के विधान की अहम वजह मानी जाती है.

दरअसल, शिवलिंग की जलाधारी या अरघा के सिरे पर स्थित ऐसे ऊर्जा क्षेत्र से गुजरने की क्षमता या यू कहें कि ऐसी शक्ति उसी भक्त के लिए सकारात्मक होती है, जो शिव की तरह योग, तप या संयम के जरिए शरीर, आत्मा व आध्यात्मिक धरातल पर उच्च स्थिति को पा चुका हो. इसके अभाव में अगर किसी सांसारिक व्यक्ति या जीव द्वारा शिवलिंग की परिक्रमा के दौरान जलाधारी को लांघा जाए, तो लांघते वक्त पैर फैलने से वीर्य या रज पैदा करने वाले अंगों और इनसे जुड़ी शारीरिक क्रियाओं पर इस शक्तिशाली ऊर्जा का नकारात्मक असर हो सकता है.

जबकि शिवलिंग स्वयं सृजन का प्रतीक है और धर्मग्रंथों के मुताबिक शिव कृपा से ही यह शक्ति हर जीव को भी प्राप्त होती है, इसलिए जब भी शिवलिंग पूजा करें, इस बात का ध्यान रखकर अनजाने में होने वाले इस देव दोष से बचने के साथ-साथ शिव की आधी परिक्रमा करने से जुड़े सृष्टि व सृजन चक्र को दोषमुक्त रखने के संकल्प को भी आस्था व निष्ठा से पूरा करें.

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