नई दिल्ली. भारतीय समाज की संस्कृति एवं सभ्यता हजारों सालों से अक्षय रही है. पर्व एवं उत्सव भारतीय समाज की आवश्यकताओं और उनमें ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बनाये गए हैं. लोगों में अपनी संस्कृति एवं साहित्य के प्रति अनुराग बना रहे, इस दृष्टि से भी कोशिश हुई है. इन्हीं में से एक है अक्षय तृतीया. अक्षय तृतीया का अनेक महत्व है. अपने नाम के अनुरूप कभी क्षय अर्थात नष्ट ना होने वाली संस्कृति. भारतीय समाज में माना गया है कि अक्षय तृतीया के दिन कोई भी शुभ कार्य बिना मुहूर्त किया जा सकता है. अक्षय तृतीया का सर्वसिद्ध मुहूर्त के रूप में भी विशेष महत्व है.

मान्यता है कि इस दिन बिना कोई पंचांग देखे कोई भी शुभ व मांगलिक कार्य जैसे विवाह, गृह-प्रवेश, वस्त्र-आभूषणों की खरीददारी या घर, भूखंड, वाहन आदि की खरीददारी से संबंधित कार्य किए जा सकते हैं. नवीन वस्त्र, आभूषण आदि धारण करने और नई संस्था, समाज आदि की स्थापना या उदघाटन का कार्य श्रेष्ठ माना जाता है. पुराणों में लिखा है कि इस दिन पितरों को किया गया तर्पण तथा पिन्डदान अथवा किसी और प्रकार का दान, अक्षय फल प्रदान करता है. इस दिन गंगा स्नान करने से तथा भगवत पूजन से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं. यहाँ तक कि इस दिन किया गया जप, तप, हवन, स्वाध्याय और दान भी अक्षय हो जाता है. यह तिथि यदि सोमवार तथा रोहिणी नक्षत्र के दिन आए तो इस दिन किए गए दान, जप-तप का फल बहुत अधिक बढ़ जाता हैं. इसके अतिरिक्त यदि यह तृतीया मध्याह्न से पहले शुरू होकर प्रदोष काल तक रहे तो बहुत ही श्रेष्ठ मानी जाती है. 

जब यह माना गया है कि इस दिन किया गया कार्य उत्तम परिणामों के साथ आता है. तब बदलते समय में अक्षय तृतीया को उसके उच्चतर परिणामों के साथ देखा जाना चाहिए. आज इस दिवस का विशेष महत्व है क्योंकि समाज के विभिन्न वर्गों में जब नैतिक रूप से पतन हो रहा है तब इस दिन का स्मरण किया जाना चाहिए. एक पौराणिक कथा के अनुरूप महाभारत के अनुसार जिस दिन दु:शासन ने द्रौपदी का चीर हरण किया था, उस दिन अक्षय तृतीया तिथि थी. तब भगवान कृष्ण ने द्रौपदी को कभी न खत्म होने वाली साड़ी वरदान स्वरूप दी थी. आज फिर एक बार वक्त आ गया है कि हमारे बीच भगवान श्रीकृष्ण अवतार लें और हर समाज को नैतिक साहस प्रदान करें ताकि हम अपने याज्ञिक पर्व अक्षय तृतीया को अक्षय बनाकर युगांतर तक मनाते रहें.

अक्षय तृतीया कई संदेशों के साथ हम में इस बात का ही संदेश नहीं देता है कि हम उत्सव मनायें बल्कि हर पर्व का संदेश होता है कि जो सीख इन पर्व और उत्सव के माध्यम से हमें दी गई है, उसे अपने जीवन में उतारें. अपने जीवन को उत्सव के लिए नहीं बल्कि उत्सव पूर्ण बनाने की कोशिश करें. माना जाता है कि अक्षय तृतीया पर ही युधिष्ठिर को अक्षय पात्र की प्राप्ति हुई थी. इस पात्र की खूबी यह थी कि इसका भोजन कभी समाप्त नहीं होता था. इसी पात्र की सहायता से युधिष्ठिर अपने राज्य के भूखे और गरीब लोगों को भोजन उपलब्ध कराते थे. यह सच है कि आज युधिष्ठिर हमारे बीच नहीं हैं लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था ऐसी है जिसमें सभी की थाली में भोजन की व्यवस्था करने की जवाबदारी सरकारों को दी गई है. सस्ते दरों पर अनाज आम आदमी को उपलब्ध कराया जाना इसी उपक्रम का एक हिस्सा है.

अक्षय तृतीया के पर्व पर विवाह की श्रेष्ठ परम्परा है किन्तु कतिपय रूढिग़त विचारों के लोग नाबालिगों को विवाह बंधन में बांधने के लिए आतुर रहते हैं. बाल विवाह एक तरह से समाज के लिए कोढ़ बन चुका है किन्तु यहां भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में इस कोढ़ से मुक्ति दिलाने की पूर्ण व्यवस्था की गई है. शिक्षा एवं शक्ति प्रदान करने की विविध योजनाओं के माध्यम से बेटियों को इतना सशक्त किया जा चुका है कि अब वे स्वयं होकर बाल विवाह के खिलाफ मोर्चा खोल लिया है. दहेज जैसे मामलों से तो अब लगभग नकरात्मक रवैया हो चला है. सशक्त समाज की दिशा में हम बढ़ रहे हैं और अक्षय तृतीया जैसे पर्व के संदेशों की सार्थकता को हम पुष्ट कर रहे हैं. 

इस तरह से भारतीय पर्व और उत्सव केवल जश्र मनाने का संदेश नहीं देते हैं बल्कि हमें वह सीख देते हैं कि इन पर्व के पीछे जो उद्देश्य से है, उसे हम अपने जीवन में उतारें और लोककल्याण के लिए काम करें. अक्षय तृतीया भी यही संदेश देती है कि हम, हमारा समाज और हमारा राष्ट्र लोक कल्याण के मार्ग से ना भटके. निहित उद्देश्यों की पूर्ति करे और जीवन को सुखमय बनाये, अक्षय रखे. 

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