वैज्ञानिकों ने ग्वार (क्लस्टर बींस) के गोंद से एक हाइड्रोजेल विकसित किया है जो पानी के कमी वाले इलाकों में किसानों के काम आ सकता है. ये हाइड्रोजेल मिट्टी में नमी की सही मात्रा को बनाए रखने का काम करता है.

हाइड्रोजेल पॉलीमर्स का एक नेटवर्क होते हैं जिनमें काफी अधिक मात्रा में पानी होता है. ये हाइड्रोजेल डाइपर्स और सैनिटरी नैपकिन में इस्तेमाल किए जाते हैं. इंडिया साइंस वायर से बात करते हुए अनुसंधान दल के सदस्य और रांची स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ नेचुरल रेजिन एंड गम्स के वैज्ञानिक नंदकिशोर थोंबरे ने कहा, ''हालांकि अधिकतक सिंथेटिक हाइड्रोजेल बायोडिग्रेडेबल नहीं होते हैं और इनके टूटने से बने उत्पाद पर्यावरण के लिए काफी हानिकारक होते हैं लेकिन ग्वार के गोंद से बने हाइड्रोजेल बायोडिग्रेडेबल होते हैं. ये नमी को बढ़ाने के साथ - साथ मिट्टी में जैविक उत्पादों को भी मिट्टी में बढ़ाते हैं.'' 

द इंडियन एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीट्यूट  (IARI) ने हाल ही में एक सेमी सिंथेटिक हाइड्रोजेल को सफलतापूर्वक विकसित किया था और इसका व्यवसायीकरण भी किया था जिसे पूसा जेल नाम दिया गया. ये पानी की कमी वाली फसलों को बचाने के लिए विकसित किया गया. थंबोर कहते हैं कि हमारा काम भी आईएआरआई की रिसर्च से मिलता जुलता है लेकिन हमने इसमें कुछ शुरुआती मैटीरियल अलग इस्तेमाल किए हैं. पूसा जेल में सेल्यूलोज और जियोलाइट का इस्तेमाल किया जाता है जबकि हमने ग्वार के गोंद का इस्तेमाल किया है.

ये हाइड्रोजेल 800 मिलीलीटर प्रति ग्राम पानी और बेहतर सरंध्रता, नमी अवशोषण और मिट्टी की अवधारण क्षमता तक अवशोषित कर सकता है. इससे मिट्टी की पानी को रोकने की क्षमता 54 फीसदी तक बढ़ जाती है और इसकी पोरोसटी 9 फीसदी बढ़ जाती है. 

हाइड्रोजेल को मिलाने से मृदा के घनत्व की पोरोसिटी यानि सरंध्रता भी 9 फीसदी बढ़ जाती है. सरंध्रता बढ़ने से मिट्टी में हवा का संचरण बढ़ता है और माइक्रोबियल काउंट भी जिससे पूरी मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार होता है. 

ग्वार के गोंद से बने हाइड्रोजेल खेती में काफी अच्छी भूमिका निभाते हैं क्योंकि इनमें पानी को सोखने की क्षमता बहुत ज्यादा होती है लेकिन इस अध्ययन में ये नहीं बताया गया है कि डिग्रेडेड उत्पादों और पॉलीमराइजेशन के बाद के प्रभाव क्या होंगे. थंबोर कहते हैं कि रिसर्च टीम को इससे विकसित होने वाली हाइड्रोजन पर भी अभी काम करना है. हमें उत्पाद की सेल्फ लाइफ बढ़ाने की जरूरत है क्योंकि इसकी अवशोषण क्षमता में समय के साथ में गिरावट आती है. हमारी अगली योजना उस समस्या को हल करने के लिए उत्पाद की संश्लेषण प्रक्रिया को मानकीकृत करना है. हमें इसकी मापनीयता का भी परीक्षण करना है. अनुसंधान दल में थंबोर के साथ सुमित मिश्र, एमजेड सिद्दीकी, उषा झा, देवधर सिंह और गोपाल आर महाजन शामिल थे. अध्ययन कार्बोहाइड्रेट पॉलिमर जर्नल में प्रकाशित किया गया है.

(इंडिया साइंस वायर से अनुवादित)

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