याद होगा, हाल ही में इंग्‍लैंड के पूर्व क्रिकेटर केविन पीटरसन छत्तीसगढ़ पहुंचे. जंगल सफारी से रायपुर गए. मुख्यमंत्री रमन सिंह से मिले. इसके बाद उन्होंने घोषणा की- 'मैंने एक अनाथ बच्चा (शावक तेंदुआ) गोद ले लिया है.' अच्छी बात है, वन्य जीव संरक्षण की दृष्टि से पीटरसन का कदम सराहनीय है लेकिन सच का दूसरा पहलू, बिजनौर (उ.प्र.) के अरुण शर्मा अनाथ आश्रम के बच्चों को नि:शुल्क पढ़ा रहे हैं. 

भारत में अनाथ बच्चों (स्ट्रीट चिल्ड्रेन) की तादाद बेतहाशा बढ़ती जा रही है. ऐसे में दो सुखद सूचनाएं मिलती हैं महाराष्ट्र से. इसी साल जनवरी में महाराष्ट्र सरकार घोषणा करती है कि राज्य में अनाथ बच्‍चों को अब सरकारी सेवाओं की ओपन कैटगरी में 1.0 प्रतिशत आरक्षण दिया जाएगा. दूसरी महत्वपूर्ण खबर भी महाराष्ट्र से ही आती है अम्रुता करवंदे की. 

अम्रुता की स्टोरी से पहले आइए, देश में अनाथ बच्चों की स्थतियों पर सरसरी नजर डालते हैं. आज दुनिया भर में अनाथ बच्चों की संख्या 40 करोड़ से ज्यादा हो चुकी है. भारत में लगभग इतनी ही (लगभग 40 करोड़) बच्चों की कुल संख्या है. देश की कुल आबादी में से करीब 29 फीसदी लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन कर रहे हैं. एक आकड़ा और. भारत में एड्स संक्रमित 55,764 मामलों में 2,112 संक्रमित बच्चे हैं. एचआईवी (एड्स) संक्रमण के चार करोड़ बीस लाख मामलों में चौदह फीसदी मामले ऐसे बच्चों के हैं, जो चौदह साल से कम उम्र के हैं. इसके अलावा देश में लगभग 11.28 मिलियन बाल श्रमिक हैं और संरक्षण अनुमान के मुताबिक करीब तीन लाख बच्चे व्यापारिक यौनवृति में झोक दिए गए हैं.

मानवाधिकार संगठन के एक अनुमान के देश के एक करोड़ से अधिक अनाथ बच्चे सड़कों पर दिन बिता रहे हैं. इनमें से ज्यादातर बच्चे अपराधों, यौनवृत्तियों, सामूहिक हिंसा और नशे की गिरफ्त में हैं और गैर सरकारी संस्था 'एसओएस चिल्ड्रेन्स विलेजेज' की रिपोर्ट के मुताबिक हमारे देश में इस समय करीबन दो करोड़ बच्चे अनाथ हालत में हैं. ऐसे में पूर्व क्रिकेटर केविन पीटरसन के शावक गोद लेने की खबर हमे उतना नहीं रिझाती है, जितनी कि रोजाना धामपुर से बिजनौर के अनाथ आश्रम जाकर अरुण शर्मा द्वारा वहां के लावारिस बच्चों को नि:शुल्क पढ़ाने की खबर. और ऐसे में जब पता चलता है कि महाराष्ट्र की अम्रुता करवंदे ने तो अनाथ बच्चों के लिए और भी महत्वपूर्ण रोल अदा किया है तो निश्चित ही हम विस्तार से जानना चाहते हैं कि उन्होंने ऐसा क्या किया है, जो उन्हें इतना कद्दावर बना देता है.

अम्रुता की कोशिश महाराष्ट्र सरकार द्वारा अनाथ बच्चों को आरक्षण दिए जाने की घोषणा से काफी पहले शुरू हो जाती है. अनाथों के हक़ की एक बड़ी लड़ाई जीतने वाली अम्रुता की जिंदगी की कहानी आइए उन्ही की जुबानी जानते हैं. लगभग दो दशक पहले पिता अम्रुता को गोवा के एक अनाथालय में छोड़ आए थे. अनुमान के तौर पर उस समय अम्रुता की उम्र लगभग दो-तीन साल की रही होगी. अम्रुता को तो अपने पिता का चेहरा तक याद नहीं है. अनाथाश्रम के रजिस्टर में उनका नाम 'अम्रुता करवंदे' लिखाया गया था. इससे ज्यादा अपने बचपन के बारे में और कुछ खास याद नहीं. आज 23 वर्षीय अम्रुता को उनके दोस्त अमू कहते हैं. वह 18 साल की उम्र तक उसी अनाथालय में ही रहीं. उस अनाथालय में उनकी जैसी और भी तमाम बच्चियां थीं. अम्रुता का सपना डॉक्टर बनना था लेकिन उम्र 18 साल होते ही उन्हें बालिक हो जाने की जानकारी देते हुए अनाथालय छोड़ देने का अल्टीमेटम मिला. उन दिनो अनाथालय की ज्यादातर लड़कियों की शादी करा दी गई थी. उनके लिए लिए भी एक लड़का ढूंढा गया लेकिन वह शादी नहीं, पढ़ाई पूरी कर देश-समाज के लिए कुछ अलग ही कर गुजरना चाहती थीं.

मां बनना दुनिया का सबसे खूबसूरत एहसास होता है. एक नई जिंदगी को दुनिया में लाना बहुत जिम्मेदारी का काम होता है लेकिन कई बार माएं इस जिम्मेदारी को उठाने के लिए तैयार नहीं होती हैं. अनचाहे बच्चों को कोई अस्पताल में ही छोड़ आता है, कोई मंदिर की सीढ़ियों पर तो कई बार तो नवजात बच्चे कूड़ेदान में पड़े मिलते हैं. दुनिया भर में इसी तरह से बच्चों को अनाथ छोड़ दिया जाता है. अम्रुता को संयोग से अनाथालय मिल गया. वहां से पृथक कर दिए जाने के बाद वह सीधे ट्रेन से पहुंचीं पुणे और पहली रात वहां के रेलवे स्टेशन पर बिताई. उस समय वह अंदर से किंचित डरी हुई भी थीं. उनको समझ नहीं आ रहा था कि कहां जाएं, क्या करें. उसी समय उनके मन में कुछ पल के लिए खुदकुशी का भी दुखद खयाल आया लेकिन हिम्मत नहीं हारीं. अगली सुबह से वह जिंदा रहने भर के लिए रोजी-रोटी की फिराक में निकल पड़ीं. इधर-उधर हाथ पैर मारा तो कभी घर-मकानों में, कभी अस्पताल तो कभी दुकानों में भूख मिटाने भर की कमाई होने लगी. इस दौरान कुछ संचित पैसों से उन्होंने सबसे पहले अहमदनगर के कॉलेज में एडमिशन लिया. दिन भर रोजी-रोटी के लिए नौकरी और शाम को कॉलेज में ग्रैजुएशन क्लास अटेंड करने लगीं. संयोग से बाद में दोस्तों के टिफन से खाना और रहने के लिए हॉस्टल का इंतजाम हो चला. उन्हीं दिनो जब वह महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग (एमपीएससी) की प्रतियोगी परीक्षा में बैठीं तो 39 फ़ीसदी मार्क्स मिलने के बावजूद अनाथ होने की वजह से कामयाबी नहीं मिली क्योंकि उसमें क्रीमीलेयर के लिए 46 फ़ीसदी, नॉन क्रीमीलेयर के लिए 35 फ़ीसदी कट ऑफ़ था. उसी असफलता ने उनके जीवन की एक नई राह खोल दी और वह उस पर चल पड़ीं. हुआ ये कि प्रतियोगी परीक्षा में खुद के असफल होने की वजह जानने के दौरान ही उन्हें पता चला कि पूरे देश में कहीं भी उनकी तरह के अनाथों के लिए आरक्षण का कानून अथवा कोई अन्य सुविधा नहीं है.

इसके बाद वह अक्टूबर, 2017 में पुणे से मुंबई पहुंचीं. सीधे मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के यहां दस्तक दी. मुख्यमंत्री ने उन्हें इस दिशा में कुछ करने का आश्वासन दिया. उसके बाद ही देश की ऐसी पहली महाराष्ट्र सरकार ने इस साल जनवरी में अनाथों के लिए सरकारी नौकरियों के लिए सामान्य वर्ग के लिए उपलब्ध सीटों के अंतर्गत ही एक फ़ीसदी आरक्षण सुनिश्चित करने की घोषणा की. इस समय अम्रुता पुणे (महाराष्ट्र) के मॉडर्न कॉलेज में अर्थशास्त्र से एमए करने के साथ साथ ही प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी कर रही हैं. वह कहती हैं कि मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी में इतनी ख़ुशी कभी महसूस नहीं की थी जितनी उस दिन की. ऐसा लगा जैसे मैंने एक बहुत बड़ी जंग जीत ली है. हम अनाथों की न जाति का पता होता है न धर्म का. न जाने कितने अनाथ मदद के इंतज़ार में बच्चे सड़कों पर ज़िंदगी काट देते हैं. उम्मीद है कि हमारा ये छोटा सा कदम उनकी बेहतर ज़िंदगी के लिए मीलों का सफ़र तय करेगा. वह चाहती हैं कि अब पूरे देश में अनाथों के लिए इस तरह के आरक्षण की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए.

साभार:yourstory.com 

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