विज्ञान के भय और डर को दूर करने के लिए वैसे तो सरकारों ने काफी कुछ किया है लेकिन एक ऐसा शख्स भी है जो छोटे बच्चों के अंदर से विज्ञान का भय खत्म कर उसे अभी से मजेदार बना रहा है. ऐसा इसलिए भी है ताकि वे बच्चे आगे चलकर अब्दुल कलाम के इस देश में विज्ञान की शाखा को आगे आसानी से बढ़ाते रहें. ये शख्स है ध्रुव वी. राव.

ध्रुव वी. राव मैसूर में गुज्जर अंगदी (रद्दीखाना) के चारों ओर घूमकर बिताई गईं अपनी खास छुट्टियों को याद करते हुए बताते हैं कि वो समय बेहद बदलाव का था. दरअसल ध्रुव वी. राव और उनके दोस्त रोहन रामानुजा वहां उनकी टिंकर परियोजनाओं के लिए मैकेनिकल और इलेक्ट्रिकल स्पेयर पार्ट्स इकट्ठा करने के लिए गए थे. ध्रव बताते हैं कि "एक बच्चे के रूप में हमने वहां ऐसी बहुत सी चीजें बनाईं जैसे सेगवे, स्पीकर, मिनी क्रेन आदि.

श्री जयचमाराजेन्द्र कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग, मैसूर से इंजीनियरिंग खत्म करने के बाद इन दो बचपन के दोस्तों ने अलग-अलग तरीके का करियर चुना था. हालांकि कुछ समय बाद भाग्य से वे एक बड़े मिशन के लिए दोबारा एक साथ मिले. जीई और इंफोसिस जैसी कंपनियों में पांच साल के कार्यकाल के बाद अपनी आईटी नौकरी छोड़ने वाले ध्रव कहते हैं कि "अलग-अलग समय पर हमने महसूस किया कि हम कॉर्पोरेट जगत में फिट नहीं थे. इसलिए हमने कुछ और करने की ठानी." रोहन और ध्रुव दोनों ने 2014 में विज्ञान आश्रम शुरू करने से पहले मैसूर में उच्च विद्यालय के बच्चों को पढ़ाना शुरू किया. इन दोनो का मकसद आने वाले पीढ़ियों में ज्ञान प्रदान करने में उनके जुनून का पता लगाना था. दोनों ने नई पीढ़ी के बच्चों को सिखाने का जिम्मा लिया.

दोनों ने विज्ञान आश्रम खोला. ये एक ऐसी प्रयोगशाला है जहां पर बच्चे विज्ञान के प्रयोग को अपने तरीके से करते हैं. व्यावहारिक-आधारित शिक्षा के माध्यम से बाल-केंद्रित शिक्षण और नवीनता को बढ़ावा देने के लिए विज्ञान आश्रम प्रयोगशाला खोला गया. ध्रुव कहते हैं कि यह विचार बच्चों को STEM (विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग, गणित) को एक अलग तरह से सिखाने का था.

ध्रुव आगे कहते हैं कि "दस साल पहले, एआई इंजीनियर्स, एप डेवलपर्स, यूट्यूबर्स, ड्रोन विशेषज्ञ, वीआर डेवलपर्स जैसी नौकरियां मौजूद नहीं थीं. चूंकि हम नहीं जानते कि आगे क्या आ रहा है, हमें अपने बच्चों को सीखने की कला सिखाने की जरूरत है और टिंकर (किसी भी चीज को कैजुअली तरीके से सुधार या सुधार करने का प्रयास करना) बच्चों को खुद से सीखने और काम करने में सक्षम बनाता है."

खुद के पैसों से शुरू किया गया विज्ञान आश्रम को सफल होने में थोड़ा वक्त लगा. ध्रुव के मुताबिक "चूंकि हम एक ट्यूशन सेंटर नहीं थे, इसलिए लोगों को समझने में कुछ समय लगा कि टिंकरिंग क्या है. शुरू में पहले तीन महीनों में हमारे पास एक बच्चा भी नहीं था. सितंबर 2014 तक हमारे पास तीन बच्चे थे, और दिसंबर 2014 तक, हमारे पास 10 बच्चे." आज विज्ञान आश्रम की बेंगलुरु, मैसूर और कूर्ग में टिंकरिंग लैब्स हैं, जहां करीब 3,000 बच्चों ने विभिन्न कार्यक्रमों में भाग लिया. जैसा कि ध्रुव बताते हैं कि, "इनमें से ज्यादातर समस्याएं भी एक तरह से तैयार की गई हैं ताकि छात्रों को ऐतिहासिक रेखाओं पर अधिक शोध करने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके. एक बार जब वे संदर्भ को अच्छी तरह से समझ जाते हैं, तो वे उचित आविष्कार करने में सक्षम हो जाते हैं."

चार अलग-अलग चरणों में विभाजित (मैकेनिकल और भौतिक विज्ञान से संबंधित समस्या हल, विद्युत संबंधी समस्याएं, इलेक्ट्रॉनिक्स और प्रोग्रामिंग समस्या का हल ) पर मेकर वर्ग एक एक विशेष मॉडल के तहत काम करता है. इसके तहत माता-पिता अपने 10 से 18 वर्ष तक के बच्चों को दो महीने से लेकर एक साल तक के लिए नामांकन कर सकते हैं. ये टिंकरिंग प्रयोगशाला हर उस बच्चे के लिए खुली है और बिल्कुल मुफ्त है जो विभिन्न समस्या के समाधान के लिए प्रयोग करना चाहता है. ध्रुव बताते हैं कि सभी बच्चों के लिए लैब में साधारण हाथ से आयोजित टूल्स से लेकर 3 डी प्रिंटर तक मौजूद हैं और वे इन्हें आराम से इस्तेमाल कर सकते हैं.

विज्ञान आश्रम की टिंकरिंग प्रयोगशालाओं की सफलता में जोड़ी गई सबसे अनोखी प्रक्रियाओं में से एक उनका 'वर्चुअल करेंसी' सिस्टम है. ये कैसे काम करत है- दरअसल पहले एक समस्या चुनी जाती है. फिर प्रत्येक बच्चे को प्रासंगिक समाधान विकसित करने के लिए उपयुक्त टूल्स और सामग्री चुनना होता है. इन उपकरणों को किराए पर लेने के लिए बच्चों को पाना, विशेष रूप से वर्चुअल करेंसी खर्च करनी होती है. ये करेंसी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बच्चों खाते में जमा होती है.

ध्रुव बताते हैं कि अधिक से अधिक पाना बचाए रखने का मतलब है कि बच्चे भविष्य की परियोजनाओं के लिए बेहतर टूल्स का इस्तेमाल कर सकते हैं. दरअसल इसको विशेष तौर पर इसलिए भी डिजाइन किया गया है ताकि बच्चों के अंदर कम से कम टूल्स में अच्छे से अच्छे सामाधान देने के लिए प्रोत्साहित कर सकें. प्रारंभिक चरणों में, बच्चों को ज्ञान-आधारित समर्थन भी प्रदान किया जाता है. जैसे वीडियो, मॉडल और विभिन्न विज्ञान तंत्र चित्र आदि.

2016 में दो करोड़ रुपए का निवेश मिलने के बाद विज्ञान आश्रम इस वर्ष दो नए टिंकरिंग प्रयोगशालाओं को खोलने के लिए तैयार है. अगले दो वर्षों में इस नए स्टार्टअप का लक्ष्य सभी महानगरों और टियर सेकेंड शहरों में अपनी उपस्थिति को दर्ज कराने का लक्ष्य है.

विज्ञान आश्रम के संस्थापक भारत में स्कूलों में अटल टिंकरिंग प्रयोगशालाओं (एटीएल) की स्थापना में सहयोग करने के लिए नीति आयोग- अटल इनोवेशन मिशन से भी बातचीत कर रहे हैं. अपने फ्यूच प्लान के बारे में बात करते हुए ध्रुव बताते हैं कि जिस तरह से पर्सनल कंप्यूटर 90 के दशक में एक क्रांति थे, हम व्यक्तिगत टिंकरिंग लैब को एक क्रांति बनाना चाहते हैं. हम हर स्कूल को टिंकरिंग लैब तक पहुंच में मदद करना चाहते हैं.

साभार: yourstory.com 

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