आज देश शहीद दिवस के रूप में देश पर खुद को कुर्बान करने वाले महान सपूतों को याद कर रहा है. साल 1931 में आज ही के दिन भारत की आजादी के मतवाले भगत सिंह को अंग्रेजों ने उनके साथियों सुखदेव और राजगुरु के साथ फांसी पर लटका दिया था. पुण्यतिथि पर देश उन्हें श्रद्धांजलि दे रहा है और आजादी आंदोलन में उनके योगदान को याद कर रहा है. लेकिन क्या शहीद दिवस पर उन्हें याद करके प्रतिमा पर फूलमाला चढ़ाना ही काफी होगा? शायद नहीं क्योंकि अगर वास्तव में हम उनके व्यक्तित्व और विचारों को समझकर उन्हें अपनाने की कोशिश नहीं करते तो इस शहीद क्रांतिकारी को श्रद्धांजलि महज एक औपचारिकता रह जाएगी. यहां हम आज आपको भगत सिंह की कही कुछ बातें बताने जा रहे हैं जिन्हें अपनाकर आप शहीद दिवस देश के वीर सपूतों को सच्ची श्रद्धांजलि दे सकते हैं. 

आज से 87 साल पहले दुनिया छोड़कर जा चुके भगत सिंह के विचार, उनका व्यक्तित्व आज भी अमर है. वास्तव में उन्होंने अपनी ही कही एक बात को चरितार्थ किया कि 'मौत इंसान की होती है, विचारों की नहीं. ये उनके विचार ही हैं जिन्होंने उन्हें लोगों के दिलोदिमाग में आज भी जिन्दा रखा है. उन्होंने अंग्रेजों के बारे में भी कहा था कि वह मेरे सिर को कुचल सकते हैं, विचारों को नहीं. मेरे शरीर को कुचल सकते हैं, मेरे जज्बे को नहीं. भगत सिंह हमेशा से बदलाव के हिमायती रहे. उन्होंने इस बात का जिक्र करते हुए कहा था, लोग हालात के अनुसार जीने की आदत डाल लेते हैं. बदलाव के नाम से डरने लगते हैं. ऐसी सोच को क्रांतिकारी विचारों से बदलने की जरूरत है.

भगत सिंह ने अंग्रेजी संसद में बम गिराने के बारे में बात करते हुए कहा  कि 'बहरों को अपनी बात कहने के लिए आवाज बुलंद होनी चाहिए. उनका कहना था हम किसी को मारने के बजाय बम गिराकर अंग्रेजी हुकूमत को जगा रहे थे कि अब उनके भारत छोड़ने का समय आ गया है. भगत सिंह अपना बलिदान देकर भी यही बात साबित की. आजादी की जिस आवाज के सुर अंग्रेजों के सामने धीमे थे, भगत सिंह की मौत से आहत होने के बाद वह आवाज मुखर हो उठी और अंग्रेजों को कड़े विरोध का सामना करना पड़ा. भगत सिंह मुखर होकर अपनी बात कहने के हिमायती थे. उनका कहना था जो शख्स विकास का समर्थन करता है, उसे हर रूढ़िवादी चीजों की आलोचना करनी चाहिए और चुनौती देकर अपनी बात को जताना भी होगा.

भगत सिंह अपने दम पर जिंदगी जीने के हिमायती थे. उनका कहना था 'जिंदगी अपने दम पर जी जाती है. दूसरों के कन्धों पर तो जनाजे उठते हैं. अपनी इस बात से भगत सिंह देश के युवाओं के स्वाभिमान को आज भी ललकारते नजर आते हैं. भगत सिंह के आजादी के जुनून के कई किस्से सुनने को मिलते हैं. कहते हैं कि जलियावाला बाग में हुए नरसंहार से वह इतने आहत हुए थे कि घर से कई मील दूर घटना स्थल तक पैदल पहुंच गए थे. आज इस बात पर विचार करने की जरूरत है कि एक-दूसरे के हित के लिए ऐसे जुनून की मौजूदगी और गुंजाइश आज समाज में हैं या नहीं. खुद संघर्ष से कतराकर पड़ोस में भगत सिंह के पैदा होने की अपेक्षा के साथ बदलाव नहीं लाया जा सकता.

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