लखनऊ में केडी सिंह बाबू स्टेडियम से ठीक आगे आज का परिवर्तन चौक है और उसके सामने है एक लंबा मैदान जो लगभग सौ साल तक विक्टोरिया पार्क के नाम से जाना जाता था. 1857 से पहले यह कैसरबाग पैलेस कॉम्प्लेक्स और छत्तर मंजिल के बीच का हिस्सा था जिसको वाजिद अली शाह ने एक ख़ूबसूरत बाग की शकल दी थी. पंद्रह अगस्त 1962 को विक्टोरिया पार्क का नाम बदल दिया गया था और उसको एक परी के नाम पर रखा गया था, ‘बेगम हज़रत महल पार्क’.

मुहम्मदी खानुम उर्फ़ महक परी 1820 में फैजाबाद के एक गरीब सैयद परिवार में पैदा हुई थी. उनके वालिद उम्बर एक प्रभावशाली ज़मीदार के ज़रखरीद ग़ुलाम थे. मुहम्मदी की मां उम्बर गुलाम की रखैल थी और साथ ही शहर में तवायफ़ भी थी. कच्ची उम्र में ही मोहम्मदी के परिवार ने उसे दलालों को बेच दिया था जो उसे लखनऊ ले आये थे. हल्की सी सवाली पर सुडौल नैन नक्श वाली मुहम्मदी पर जल्दी ही नवाबी दलालों की नज़र पड़ी और उसे फिर खरीद लिया गया. उसको अवध के ताजदार के हरम में खावासिन बना दिया गया.

मुहम्मदी बड़ी हुनरमंद थी. उसने हरम में आते ही अपनी शख्सियत में वो सारे इल्म शामिल कर लिये जिनसे वो हरम की औरतों में सबसे अलग दिखे. अवध के ताजदार वाजिद अली शाह बन चुके थे और उनके तमाम शौकों में एक बड़ा शौक इंद्र सभा और रास लीला थी जिसके लिये उन्होंने अपने हरम की चुनिंदा औरतों को परी के नाम से नवाज़ा था. इस शौक के चलते मुहम्मदी को उन्होंने महक परी का नया नाम दिया था.

महक परी ने नवाब वाजिद अली शाह की सभाओं में कई अहम किरदार निभाये थे और खरामा-खरामा वो उनके दिल–ओ–दिमांग पर छा गयी थी. नवाब साहब उनके इतने दीवाने हो गये थे कि उन्होंने महक परी पर कई कसीदे लिख दिए थे. इसके चलते उनका बेगम बनना लाजमी था पर अब भी उनका दर्जा नवाब साहब की शाही रखैल का ही था.

इस दौरान वाजिद अली शाह कई और जगह शौक फरमाने के बावजूद महक परी पर लौटते रहे और फिर अचानक उन्हें पता चला की इस परी से उनका वारिस होने वाला है. 1845 में महक परी के उम्मीद से होते ही उन्होंने उसे पर्दा नशी कर दिया और उन्हें इफ्तिखार-उन-निसा का नया नाम दे दिया था. नई फसल के आते ही मोहम्मदी उर्फ़ महक परी उर्फ़ इफ्तिखार-उन-निसा, बेगम हज़रत महल हो गयी और बिरजिस कदर अवध के ताजदार का नया वारिस बन गया था.

मोहम्मदी बेगम हज़रत महल तो बन गयी थी और उनका बेटा पैदाशी नवाब की पदवी ज़रूर पा गया था पर उनकी अपने शौहर से ज्यादा पटती नहीं थी. 1856 के आते-आते बेगम और नवाब के बीच में अवध के मसलों और फिरंगियों से रिश्तों को ले कर दरार आ गयी थी. वाजिद अली शाह धुलमुल किस्म की शख्सियत थे तो हज़रत महल मशवरे के बाद सक्त रवैया अपनाती थी. उनमें राज्य कौशल था और साथ ही कूटनीति का हुनर भी. सबसे बड़ी बात यह थी कि वो अंग्रेजों के मंसूबे पहचानती थी और वाजिद अली शाह को उनके बारे में अगाह भी करती रहती थी. नवाब साहब को यह नकाबिले बर्दाश्त था. उन्होंने हज़रत महल को तालाक दे दिया.

1856 में अंग्रेजों ने वाजिद अली शाह को लखनऊ से बेदखल कर दिया और उन्हें कलकत्ता कूच करवा दिया था. लखनऊ छुटने पर उन्होंने ‘बाबुल मोरा, नैहर छूटो जाए’ जैसी अद्भुत कृति की रचना की थी. जाते समय उन्होंने हज़रत महल को साथ नहीं लिया था क्योंकि वो उन्हें तलाक़ दे चुके थे जैसे वो आठ और बेगमों को छोड़ चुके थे. अपने साथ वो अपनी मां और बेगम खास महल और बेगम अख्तर महल को ले गये थे.

नवाब वाजिद अली शाह की लखनऊ से रवानगी के बाद बेगम हज़रत महल ने कमान अपने हाथों में ले ली थी. उनके साथ खड़े थे आजमगढ़ के राजा जयलाल सिंह जिन्होंने आगे चल कर 1857 के गद्दर में अहम किरदार निभाया था.

वाजिद अली शाह ने मार्च 1856 में लखनऊ छोड़ा था. अगले दस महीने यानी जून 1857 तक बेगम हज़रत महल ने अपने 12 साल के बेटे की कैसरबाग बारादरी में ताजपोशी करवायी और फिर उसके नाम पर राज धर्म निभाया था. बेगम साहिबा की फौजों ने अंग्रेजों को चिनहट की लड़ाई में बुरी तरह से हराया था और फिर दिलकशा से ले कर रेजीडेंसी तक अंग्रेजों को नाकों चने चबवा दिए थे. बेगम साहिबा खुद जंग का नेतृत्व करती थी और झांसी में लक्ष्मी बाई और कानपुर में नाना साहिब के साथ 1857 को ऐतिहासिक और अविस्मरणीय बना दिया.

बेगम साहिबा अंग्रेजों से नवंबर 1859 तक लड़ाई लडती रही. लखनऊ छुट गया था पर वो तेराई के जंगलों से अंग्रेजों पर छापामारी करती रही थी. आखरी मुग़ल बहादुर शाह की हार के बाद वो नेपाल चली गयी जहां पर 1879 में काठमांडू में उनकी मौत हो गयी. अंग्रेजों ने उनको लखनऊ आ कर बसने के कई न्योते दिये और लम्बी पेंशन का भी वादा किया था पर बेगम ने स्वाधीनता को ही स्वीकारा.

लखनऊ में जब भी बेगम हज़रत महल पार्क में जाए या उस के आस-पास से गुजरे तो मोहम्मदी खानुम के अद्भुत जीवन को जरुर याद करे ले. परी थी वो.

- अश्विनी भटनागर

साभार:hindi.nyoooz.com

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