अश्विनी भटनागर, लखनऊ. लखनऊ और चिकनकारी लगभग पर्यावाची है. लखनऊ का नाम आते ही चिकन की कढ़ाई के कपड़ों का भी अनायास नाम ठीक उसी तरह से आ जाता है जैसे लखनवी कबाब और बिरयानी का आता है. चिकनकारी पिछले 150 सालों से भी ज्यादा लखनऊ के नाम से जुड़ी हुई है. यह नवाबों के काल में विधिवत स्थापित हुई थी.

चिकन के काम से लखनऊ के लगभग पांच लाख बाशिंदे सीधे तौर से जुड़े हुये है. इनमें दर्जी से ले कर कढ़ाई करने वाले और धोबी तक शामिल है. शायद लखनऊ वालों को खुद भी नहीं मालूम होगा कि हिंदुस्तान में कारीगरों का सबसे बड़ा केंद्र उनका शहर है जिसका सालाना टर्नओवर 10,000 से 12,000 करोड़ रुपये है. लगभग आधा उत्पादन (6,000 करोड़ रुपये) एक्सपोर्ट किया जाता है.

लखनवी चिकन की खुसूसियत को मद्देनज़र रखते हुए 2008 में इसे ज्योग्राफिकल इंडिकेशन स्टेटस भी दिया गया था. इसका मतलब यह है कि एक तरह से लखनऊ को चिकनकारी का कॉपीराइट दे दिया गया है.

लखनऊ का चिकन इतना प्रसिद्ध है कि मशहूर नायिका ज्यूडी डेंच जब 2004 में अकैडमी अवार्ड्स में सर्वश्रेष्ट अभिनेत्री का ख़िताब लेने स्टेज पर गयी थी तो संदीप खोसला और अबू जानी की चिकनकारी जड़ी कृति पहनी हुईं थीं. ज्यूडी डेंच जेम्स बांड की फिल्मों में अपनी भूमिका के लिये जानी जाती है. जानी-मानी गायिका मडोना भी लखनवी चिकन की कायल है.

वैसे कायल होने की बात की इन्तिहां लखनऊ में ही पाई जाती है जहां महबूब गंज मोहल्ले में 1878 का बना हुआ मुग़ल साहिबा का इमामबारा है. इसको मुग़ल शासक मोहम्मद अली शाह की बेटी फकरू निसा बेगम ने बनवाया था. इमामबाड़े की दीवारों और खिड़कियों पर बेहतरीन चिकनकारी के डिजाईन बने हुएं है जो काबिले तारीफ है. इन डिजाईनों की नकल आज भी की जाती है.

1911 में इंग्लैंड की महारानी ने भी चिकनकारी को नवाज़ा था. उनकी ताजपोशी के जश्न के तहत लंदन में लगी प्रदर्शनी में चिकनकारी को पेश किया गया था. महारानी ने पसंदगी का सर्टिफिकेट भी दिया था.

पर रोचक बात यह है कि चिकनकारी लखनऊ की इजात नहीं है. अमूमन कहा जाता है कि मुग़ल बादशाह जहांगीर की बेगम नूर जहां (1577-1645) ने इस तरह की कढ़ाई की शुरुआत की थी. चिकन शब्द भी हिंदुस्तानी नहीं है. फारसी के चिकिन या चिकीन से लिया गया है जिसका मतलब कढ़ाई किया हुआ कपड़ा होता है.

नूर जहां इस तरह का सफ़ेद कढ़ाई किया हुआ कपड़ा पर्शिया से लायी थी जिसको शाही घराने में पसंद किया गया था. नूर जहां खुद सिलाई-कढ़ाई में माहिर थीं और उन्होंने ढाका की मलमल पर शैडो वर्क शुरू करवाया था. उनके दौर के कई चित्र है जिनमें बादशाह सफ़ेद रंग का कढ़ाई दार ढीला लिबास पहने हुये है.

नूर जहां ने चिकन कारी को बढ़ावा देने के लिये दिल्ली में कारीगरों को इकहठा किया था और चिकन के फूल–पतियों वाले विशेष लक्षणों को चिन्हित भी किया था. आज जो हम लखनऊ के चिकनकारी देखते है वो नूर जहां की देन है.

वैसे इतिहासकार राहुल शुक्ला अपनी किताब आर्ट बियॉन्ड टाइम में लिखते है कि चिकनकारी के विशेष लक्षण ताज महल (1653) से प्रेरित है. शुक्ला ताज महल की वास्तु कला और डिजाईन के एक्सपर्ट है. उनके अनुसार ताज महल की जालियों और दीवारों पर किया गया बेल-बूटों के काम से ही चिकनकारी की असली पहचान बनी थी. उससे पहले फ़ारसी प्रभाव था जो कि बेहद औपचारिक था, उसमें कलात्मक बहाव नहीं था जो ताज महल और चिकनकारी में पाया जाता है.

1857 के ग़दर के बाद दिल्ली में हाल ख़राब हो गये थे. कुछ कारीगर वहां से भाग कर कलकत्ता चले गये थे तो कुछ ने अवध की तरफ रुख किया था. ढाका की मलमल विशेष होती थी क्योंकि वहां की कापस सीले वातावरण में पकती थी. उससे बना धागा बहुत महीन होता था और आसानी से टूटता भी नहीं था. ढाका की मलमल गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों के चूने वाले पानी में धुलती थी जिससे वो भुर्राक सफ़ेद हो जाती थी. बारीक, हलके और बहुत सफ़ेद कॉटन कपड़े पर ही असली चिकनकारी होती थी पर कलकत्ता में चिकन का काम लंबे समय तक नहीं चला था और ढाका से कपड़ा मंगवा कर उस पर लखनऊ में काम होने लगा था.

माना जाता है चिकन जैसे काम का इतिहास नूर जहां से भी पहले का है. ग्रीस से आये हुये यात्री मेगास्थिनीज तीसरी शताब्दी बीसी में लिखते है कि चन्द्र गुप्त मौर्य के दरबार में मलमल पर फूल–पत्तियों का काम किये हुये लिबास पहने जाते थे. कमला देवी चट्टोपाध्याय का कहना है कि सातवीं सदी के संस्कृत विधावन और कवि बानभट ने दर्ज किया था कि महाराजाधिराज हर्ष वर्धन को सफ़ेद रंग के ढीले कढ़ाई किये हुए वस्त्र बेहद पसंद थे. कुछ इतिहासकार नवी शताब्दी में बने बाग और अजंता गुफ़ाओं में भी चिकनकारी के चित्रण को बताते है.

साभार:hindi.nyoooz.com

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