हमारे कृषि प्रधान देश में विदेशी सब्जियों का अब एक बड़ा बाजार तैयार हो चुका है. वह हिमाचल प्रदेश के तेजराम शर्मा हों और पंजाब के मेहरबान सिंह हों अथवा उत्तर प्रदेश के रमेश वर्मा, भारतीय मिट्टी में विदेशी सब्जियां उगाकर वे लाखों रुपए कमा रहे हैं. विदेशी सब्जियों की इतनी बड़ी खपत के पीछे एक बड़ा कारण पर्यटन विश्व में बड़ी संख्या में साझा हो रहे वे विदेशी हैं, जो हर साल लाखों की संख्या में भारत आ रहे हैं. भारत में उगाई जाने वाली विदेशी सब्जियों की खपत के सबसे बड़े केंद्र देश के वे सस्ते-महंगे होटल बन चुके हैं, जहां बड़ी संख्या में विदेशी ठहरते रहते हैं.

हिमाचल प्रदेश के करसोग वैली के खड़कन गांव के तेजराम शर्मा कई तरह की विदेशी प्रजातियों की जैविक सब्जियां ब्रोकली, चाइनीज कैबिज, लेटिस, पार्स्ली, सेलरी लेक आदि दो गुने दामों पर सप्लाई कर सालाना लाखों रुपये कमा रहे हैं. उनकी सब्जियों की भारी डिमांड के पीछे एक खास वजह उनका जैविक उत्पादन किया जाना है. इसके लिए उन्हें कृषि वैज्ञानिकों और दिल्ली के सब्जी व्यापारियों से सम्पर्क साधने पड़े, कृषि विभाग एवं गैर सरकारी संस्थाओं से प्रशिक्षण लेने पड़े. तेजराम विदेशी सब्जियां ही नहीं उगाते, बल्कि स्वयं की नर्सनी, जैविक कीटनाशक से लेकर जैविक खाद तक खुद बनाते हैं. सभी तरह की विदेशी सब्जियों के बीज उन्हें दिल्ली से मिल जाते हैं. अब तो वह अपने प्रदेश के किसानों एक सफल प्रेरणास्रोत बन चुके हैं.

 

पटियाला (पंजाब) के साहौली गांव में मेहरबान सिंह भी विदेशी सब्जियों की खेती कर रहे हैं. मेहरबान सिंह को विदेशी सब्जियों की खेती समझने में छह से सात साल लग गए. उन्होंने अन्य सब्जी उत्पादकों और एनआरआई कृषकों से मिलकर विदेशी सब्जी उत्पादकों के लिए एक कंपनी भी स्थापित कर ली. कुछ ही वक्त में उनकी कंपनी में सदस्यों की संख्या दर्जनों में पहुंच गई. इससे पहले उन्होंने लंदन जाकर वही सब्जी मार्केट में निर्यात की स्थितियों को जाना-समझा. आज वह राज्य के उन्नतशील संपन्न और सफल किसानों में शुमार हो रहे हैं. आज परंपरागत खेती की तुलना में उनकी आय कई गुना ज्यादा हो चुकी है. उनको इफको से भी आर्थिक मदद मिल चुकी है. उनके साथ लुधियाना, पटियाला, जालंधर आदि के उन्नतशील किसान भी इसी दिशा में जुटे हुए हैं.

विदेशी सब्जियां उगाने वाले एक ऐसे ही किसान हैं कसीमपुर बिरूहा (लखनऊ) के रमेश वर्मा. उन्होंने पहली बार विदेशी सब्जियों की खेती के लिए केवीके, भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान से संपर्क किया. वहां से ब्रोकली के बीज ले आए. इससे उन्हे अच्छी-खासी कमाई होने लगी. उसी दौरान उन्होंने विदेशी सब्जियां उगाने का प्रशिक्षण लिया. केवीके के वैज्ञानिकों ने ब्रोकली, पार्सले, लाल गोभी, चीनी गोभी, चेरी टमाटर आदि की खेती के लिए बीज सामग्रियां उपलब्ध कराईं. बुआई से लेकर कटाई तक उन्हें इन वैज्ञानिकों से सहयोग मिलता रहा. इसके साथ ही वह विदेशी सब्जियों की खेती विशेष जानकार हो गए. अब विदेशी सब्जियों की खेती से उन्हें हर साल लाखों रूपए की कमाई हो रही है.

विदेशी सब्जियां उगाने में परंपरागत खेती की तुलना में कई तरह की कठिनाइयां तो हैं लेकिन इसमें भरपूर मुनाफे के साथ कई विशेष सुविधाएं भी होती हैं. जैसे कि ये सभी सब्जियां छत पर गमलों में भी उगाई जा सकती हैं. ज्यादा डिमांड की वजह ये है कि इनमें विटामिन ए, सी के साथ-साथ लौह, मैग्नेशियम, पोटाशियम, जिंक आदि बहुत मात्र में पाए जाते हैं. विदेशी सब्जियों में मुख्यतः एसपैरागस, परसले, ब्रुसल्स स्प्राउट, स्प्राउटिंग, ब्रोकली, लेट्यूस (सलाद), स्विस चार्ड, लिक, पार्सनिप व लाल गोभी आदि प्रमुख हैं. ये सब्जियां कैंसर जैसी खतरनाक बीमारियों से भी बचाव करती हैं. साथ ही शरीर में अंदरूनी घावों को भरने के लिए रामबाण का काम करती हैं. इस कारण इन विदेशी सब्जियों की पैदावार पर विशेष ध्यान दिया जा रहा हैं.

अधिक स्वादिष्ट होने के साथ-साथ ये सब्जियां अधिक गुणकारी व लाभदायक भी हैं. पांच सितारा होटलों और महानगरों में तो खासतौर से इनको काफी ऊँची कीमत मिल जाती हैं. पहले इन विदेशी सब्जियों को आयात करना पड़ता था लेकिन अब ये ठन्डे पहाड़ी क्षेत्रों में खूब उगाई जा रही हैं. ऐसे प्रदेशों के किसान और सब्जी उत्पादक विदेशी सब्जियों को उगाकर अधिक धन कमा रहे हैं. एक ऐसी ही सब्जी है एसपैरागस. यह एक बहुवर्षीय विदेशी सब्जीहै, जिसका ऊपर वाला भाग सर्दियों में सूख जाता है लेकिन जड़े जीवित रहती हैं. पौधों की जड़ों में मुलायम तना निकलता है, जिसको स्पीयर्स कहते हैं. इसे सूप में इस्तेमाल किया जाता है. इसकी सब्जी बनाकर भी खाया जाता है

इसे भुरभुरी दोमट और उपजाऊ मिट्टी में सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है. ब्रोकली का पौधा फूलगोभी की भांति होता है. इसमें फूलों के बंद गुच्छे आपस में जुड़े हुए फूलगोभी की तरह ही निकलते हैं. इसकी नर्म शाखाएं 6-8 से.मी. फूलों के गुच्छों के साथ ही काटी जाती हैं. ब्रोकली में कई विटामिन, लोहा, कैल्शियम तथा खनिज पदार्थ प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं. इसके लिए नमी वाली भूमि जिसमे पानी का निकास अच्छा हो, उपयुक्त रहती है. इसकी कई और भी किस्में हैं - पालम हरीतिका, पालम कंचन, पालम विचित्रा, पालम समृद्धि आदि.

एक अन्य विदेशी सब्जी है ब्रुसल्स स्प्राउट. इसको बेल्जियम के ब्रुसल्स शहर के आसपास सैकड़ों वर्षों से उगाया जाता रहा है, जिससे इसका नाम ब्रुसल्स स्प्राउट पड़ गया. इसके गोल स्प्राउट्स अखरोट के बराबर, हरे और लाल रंग के होते हैं तथा तने के चरों और, पत्तियों के अग्र भाग में नीचे से ऊपर तक निकलते है. स्प्राउट को कच्चा सलाद के रूप में, पकाकर तथा आचार बनाकर खाया जाता है. इसमें विटमिन ‘ए’ प्रोटीन, लोहा, कैल्शियम तथा खनिज पदार्थ प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं. इसके लिए बलुई दोमट मिट्टी उपयुक्त होती है.

विदेशी सब्जी सिलेरी को सलाद के रूप में इस्तेमाल करते हैं. इसके पत्ते व डंठल कच्चे तथा पकाकर या फिर सूप में सुगंध के लिए प्रयोग किये जाते हैं. इसका प्रयोग दवा के रूप में भी किया जाता है. इसके लिए धूपदार अधिक नमी वाली भूमि चाहिए. ये विदेशी सब्जियां उगाकर किसान लाखों की कमाई कर सकते हैं. उनकी पंच सितारा होटलों के अलावा विदेशी दूतावासों से जुड़े परदेसियों में भी भारी डिमांड होने लगी है.

साभार:yourstory.com 

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