वाराणसी. वैसे तो आपने शादियां बहुत सी देखी होंगी, जिसमें दूल्हा घोड़े पर बैठकर दुल्हन को लेने के लिए बारात लेकर उसके द्वार जाता है. लेकिन धर्म की नगरी काशी में आने वाली 25 फरवरी को एक ऐसी अनोखी शादी होने जा रही है, जिसमें दुल्हन दूल्हे के घर बारात लेकर पहुंचेगी. अपने आप में होने वाली इस अनोखी शादी की तैयारियां इन दिनों जोर-शोर से चल रही है.

दरअसल ये अलग और अनोखी परम्परा की शुरुआत वाराणसी में फ़िल्म व्यवसाय से जुड़े डॉ. डी.एल. कश्यप ने शुरू की है. अपने पांच बेटों की शादी में वधू की बारात बुलाकर इन्होंने वधू की बारात का स्वागत किया और अब आने वाली 25 फरवरी को अपने सबसे छोटे बेटे मिस्टर राजा ठाकुर कश्यप की भी शादी में वधू की बारात का स्वागत करने की तैयारी में जुटे है.

बना दी है परंपरा
कन्दवा गांव निवासी डॉ. कश्यप ने बताया कि छोटा बेटा राजा कैंट रेलवे स्टेशन पर लोको पायलट इंजीनियर है जबकि लड़की राजलक्ष्मी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रही है. उन्होंने बताया कि वे अब तक अपने भाई और अपने कुल पांच बच्चों की शादी के लिए वधू को घोड़ी पर अपने दरवाजे बुलाकर शादी की रस्म को पूरा कर चुके है.

कैसे शुरू हुई ये अनोखी पहल
डॉ. कश्यप ने इस पहल के बारे में बताते हुए कहा कि करीब डेढ़ दशक पूर्व वे अपने बड़े बेटे संजय कुमार की शादी में बारात लेकर वधू के घर पहुंचे, तो देखा कि वधू पक्ष बारातियों के स्वागत के लिए परेशान रहे. उनकी परेशानी देखकर उसी समय कश्यप ने मन ही मन में निर्णय लिया कि अब वह बारात ले जाने के बजाय वधू जिसे लक्ष्मी की संज्ञा देते हैं, उनकी बारात घोड़ी पर अपने दरवाजे बुलाकर स्वागत करेंगे. 

वधू को मंडप तक लाने के लिए घोड़ी का होता है इंतजाम
डॉ. कश्‍यप बताते हैं कि इसके लिए उन्होंने बकायदा वधू को मंडप तक लाने के लिए घोड़ी का इंतजाम किया. उन्होंने बताया कि मैं बहू को घोड़ी पर लाता हूं और घर तक हाथी या बग्घी पर ले जाता हूं. डॉ.कश्‍यप कहते हैं कि जिस तरह बारात जाने पर वधू पक्ष बारात और दूल्हे की आरती करते हैं, उसी तरह वधू को घोड़ी से उतारने के पूर्व कश्यप और उनकी पत्नी सम्पत्ति कश्यप वधू की विधिवत आरती करते हैं.

बहू को मानते हैं लक्ष्‍मी 
कश्‍यप दंपति का कहना है कि जब बेटी को लक्ष्मी मानते है, तो लक्ष्मी का स्वागत हम अपने घर पर क्यों न करें. कुछ इन्ही विचारों के साथ समाज के लिए नजीर बनने की प्रेरणा बनने के लिए कश्‍यप दंपति ने इस प्रथा की शुरुआत की. इन्होंने अपने पुत्रों में से आखरी बेटे की शादी को विशेष करने के उद्देश्य से कुछ नया करने की अबकी ठानी है.

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