चार जुलाई, 1965 को अमेरिका हर साल की तरह अपना स्वतंत्रता दिवस मना रहा था. मार्टिन लूथर किंग जूनियर भी हमेशा की तरह अटलांटा के उसी चर्च में प्रवचन दे रहे थे, जिसमें कभी उनके पिता प्रवचन किया करते थे. अक्सर बोलते-बोलते किंग जूनियर को भारत और महात्मा गांधी का कोई प्रसंग याद आ ही जाता था और उस दिन भी ऐसा ही हुआ, लेकिन उस दिन का प्रसंग श्रोताओं के लिए थोड़ा हिला देने वाला था. किंग जूनियर ने कहा, मुझे याद है जब मैं और श्रीमती किंग भारत में थे तो एक दोपहर हम भारत के सुदूर दक्षिणी राज्य केरल के त्रिवेंद्रम शहर गए. उस दोपहर मुझे वहां एक स्कूल में बोलना था. वह अपने देश के हाई स्कूल जैसा ही था. और इस स्कूल में बड़ी संख्या में ऐसे विद्यार्थी भी थे जो पहले अछूत कहे जाने वाले लोगों के बच्चे थे.

प्रिंसिपल ने मेरा परिचय दिया और परिचय के आखिर में कहा - बच्चों, अब मैं आपके सामने प्रस्तुत करना चाहूंगा संयुक्त राज्य अमेरिका के एक साथी अछूत को. एक पल के लिए तो मैं थोड़ा भौचक्का रह गया और खीज भी गया कि अब मुझे अछूत के नाम से बुलाया जाएगा. लेकिन फिर मैंने इस सच्चाई के बारे में सोचना शुरू किया. मेरे दो करोड़ से अधिक भाई-बहन अभी भी इस दौलतमंद समाज में गरीबी के एक घुटनभरे पिंजरे में घुट रहे हैं. मैंने इस सच्चाई के बारे में सोचना शुरू किया कि मेरे दो करोड़ से अधिक भाई बहन अभी भी हमारे देश के बड़े शहरों में चूहों से भरी, असहनीय मलिन-बस्तियों में रहने को मजबूर हैं, बिना सुविधा वाले स्कूलों में जा रहे हैं, उनके मनोरंजन की पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं. और फिर मैंने खुद से कहा- हां, मैं एक अछूत हूं. और संयुक्त राज्य अमेरिका का हर नीग्रो एक अछूत है. बाद में एक अन्य अवसर पर उन्होंने छूआछूत उन्मूलन में गांधी के योगदान को इस तरह याद किया, छूआछूत के खिलाफ सबसे पहला काम गांधी ने यह किया कि एक अछूत लड़की को अपनी बेटी के रूप में गोद ले लिया. उन्होंने उसे अपने आश्रम में अपने साथ रखा. उन्होंने अपने जीवन से दिखाया कि छूआछूत को जाना ही होगा. एक दिन महात्मा गांधी उठ खड़े हुए और अपने देशवासियों से कहा - तुम इन अछूतों का शोषण कर रहे हो. भले ही ब्रिटेन की दासता से निजात पाने के लिए हम जी-जान से लड़ रहे हैं, लेकिन हम अपने ही इन लोगों का शोषण कर रहे हैं और हम उनसे उनका आत्मत्व और आत्म-सम्मान छीन रहे हैं. गांधी ने कहा- मैं तब तक भोजन ग्रहण नहीं करूंगा जब तक सवर्णों के नेता अछूतों के नेता के साथ आकर मुझे यह नहीं कहते कि छूआछूत समाप्त होगा और मंदिरों के दरवाजे अछूतों के लिए खोल दिए जाएंगे. 1950 में 21 साल के इस अश्वेत अमेरिकी नौजवान के हृदय में एक खलबली मची हुई थी.

मनुष्य-मनुष्य के बीच भेदभाव और सामाजिक संघर्ष का हल आखिर क्या हो, यह प्रश्न उसके मन में घूमता रहता. घूम-फिरकर वह बार-बार ईसा मसीह की शरण में जाता कि मनुष्य-मनुष्य के बीच प्रेम ही इसका एकमात्र इलाज है. लेकिन कैसे? इसका सामाजिक या राजनीतिक तरीका क्या हो? इस प्रश्न पर आकर वह अटक जाता था. अंत में तो वह इस हद तक निराश हो गया कि उसने तय कर लिया कि अमेरिका में भी श्वेत-अश्वेत के बीच भेदभाव को समाप्त करने का एकमात्र तरीका हथियार उठाकर सशस्त्र संघर्ष करना ही है. उसी दौरान उन्होंने डच मूल के प्रसिद्ध अमेरिकी शांतिवादी एजे मस्टे का एक व्याख्यान सुना. मस्टे के प्रेम, शांति और भाईचारे के संदेश ने उन्हें बहुत प्रभावित तो किया, लेकिन तरह-तरह के भेदभाव, शोषण, अन्याय और युद्धों से भरी दुनिया में उन्हें उनका शांतिवाद बहुत ही अव्यावहारिक लगा. और इसके बाद जब उन्होंने नीत्शे को पढ़ा, तो प्रेम के जरिए सामाजिक अन्याय को दूर करने में उनकी रही-सही आस्था भी जाती रही. फिर उन्हें पता चला कि हॉवर्ड यूनिवर्सिटी के डॉ मोर्डेकै जॉनसन महात्मा गांधी के बारे में कोई व्याख्यान देनेवाले हैं. रविवार का दिन था और वे इस व्याख्यान को सुनने के लिए फिलाडेल्फिया के लिए चल पड़े.

डॉ जॉनसन हाल ही में भारत का दौरा करके लौटे थे और गांधी से खासे प्रभावित थे. उन्होंने अपने व्याख्यान में महात्मा गांधी के जीवन और विचारों के बारे में विस्तार से बताया. किंग जूनियर ने उस दिन के बारे में लिखा है, गांधी का संदेश इतना गहरा और विचारोत्तेजक था कि उस सभास्थल से मैं निकला और सीधे जाकर गांधी के जीवन और कार्यों के बारे में आधा दर्जन किताबें खरीद लाया. अपनी आत्मकथा में उन्होंने अपने विचारों और कार्यों पर महात्मा गांधी के प्रभाव के बारे में विस्तार से लिखा है. आज पूरी दुनिया और विशेषकर भारतीय समाज जिस प्रकार के संघर्षों में फंस गया है, ऐसे हालात में किंग जूनियर की जयंती पर गांधी के बारे में उनके विचारों को फिर से पढ़ना और समझना बहुत जरूरी लगता है. किंग जूनियर लिखते हैं, ज्यादातर लोगों की तरह मैंने भी गांधी के बारे में सुना जरूर था, लेकिन उन्हें गंभीरता से पढ़ा नहीं था. जैसे-जैसे मैं उन्हें पढ़ता गया, वैसे-वैसे उनके अहिंसक प्रतिरोध के अभियानों के प्रति मैं अत्यधिक मंत्रमुग्ध सा होता गया. खासतौर पर मैं समुद्र तक उनके नमक मार्च (दांडी मार्च) और उनके अनगिनत उपवासों से बहुत अधिक प्रेरित हुआ. सत्याग्रह की पूरी अवधारणा ही मेरे लिए बहुत मायने रखती थी. इसमें सत्य का मतलब है प्रेम और आग्रह का अर्थ है बल. इस तरह सत्याग्रह का अर्थ है सत्य का बल या प्रेम का बल. जैसे-जैसे मैं गांधी के दर्शन में गहरे उतरता गया, प्रेम की शक्ति के बारे में मेरे संदेह भी धीरे-धीरे छंटते गए. और पहली बार सामाजिक सुधार के क्षेत्र में इसकी ताकत मुझे देखने में आई. गांधी को पढ़ने से पहले मैं लगभग इस निष्कर्ष पर पर पहुंच चुका था कि ईसा मसीह द्वारा बताई गई प्रेम की नीति केवल व्यक्तिगत संबंधों में ही प्रभावी हो सकती है, सामाजिक संबंधों में नहीं. मुझे लगता था कि ‘दूसरा गाल आगे कर देने’ या अपने शत्रुओं से प्रेम करने’ वाला दर्शन केवल व्यक्ति-व्यक्ति के बीच होने वाले संघर्षों की स्थिति में ही लागू होता है. प्रजातीय समूहों या राष्ट्रों के बीच संघर्ष की स्थिति में मुझे एक ज्यादा यथार्थवादी दृष्टिकोण जरूरत महसूस होती थी. लेकिन गांधी को पढ़ने के बाद मैंने देखा कि मैं कितना गलत सोचता था. गांधी संभवतः इतिहास के ऐसे पहले शख्स होंगे जिन्होंने ईसा मसीह के प्रेम की नीति को महज व्यक्तियों के बीच की नीति से ऊपर उठाकर बड़े पैमाने पर एक शक्तिशाली और प्रभावी सामाजिक बल के रूप में स्थापित कर दिया. प्रेम गांधी के लिए सामाजिक और सामूहिक परिवर्तन का एक शक्तिशाली उपकरण था. प्रेम और अहिंसा पर इस गांधीवादी जोर में ही मैं सामाजिक सुधार का वह तरीका खोज पाया जिसे मैं कब से ढूंढ़ रहा था.

जो बौद्धिक और नैतिक संतुष्टि मैं बेंथम और मिल के उपयोगितावाद, मार्क्स और लेनिन के क्रांतिकारी पद्धतियों, हॉब्स के सामाजिक अनुबंध सिद्धांत और प्रकृति की ओर लौटो वाले रूसो के आशावाद और नीत्शे के सुपरमैन के दर्शन में नहीं पा सका था, वह मुझे गांधी के अहिंसक प्रतिरोध के दर्शन में मिला. गांधी को पढ़ने के बाद मैं पूरी तरह आश्वस्त हो गया कि सच्चा शांतिवाद बुराई के प्रति अ-प्रतिरोध (नॉन-रेज़िस्टेंस) नहीं है, बल्कि बुराई के प्रति अहिंसक प्रतिरोध है. इन दोनों तरीकों में जमीन आसमान का फर्क है. गांधी ने बुराई का प्रतिकार उतनी ही सख्ती और ताकत से किया है, जितना कि कोई हिंसक प्रतिकार करनेवाला करता, लेकिन उन्होंने घृणा के बजाय प्रेम के साथ प्रतिरोध किया. सच्चा शांतिवाद बुराई के प्रति अयथार्थवादी आत्मसमर्पण नहीं है, बल्कि यह प्रेम की शक्ति के जरिए साहस के साथ बुराई का सामना करना है. इस विश्वास के साथ कि किसी को हिंसक चोट पहुंचाने से अच्छा है, वह हिंसक चोट स्वयं खा लेना. क्योंकि किसी के ऊपर हिंसा करने से पूरे जगत में हिंसा और कड़वाहट का अस्तित्व कई गुणा बढ़ जाता है, जबकि हिंसाकारी की चोट अपने ऊपर ले लेने से प्रतिपक्षी में शर्म की भावना पैदा हो सकती है, और इससे उसका हृदय-परिवर्तन हो सकता है.

 1955-56 में किंग जूनियर की भागीदारी वाला प्रसिद्ध मांटगोमरी बस बहिष्कार आंदोलन महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन और सत्याग्रह से ही प्रेरित था. उस आंदोलन के अपने अनुभव के बारे में किंग जूनियर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है, जैसे-जैसे दिन बीतते गए, महात्मा गांधी की प्रेरणा ने अपना असर डालना शुरू कर दिया. मुझे जल्दी ही पता चल गया कि प्रेम के ईसाई सिद्धांत को यदि अहिंसा के गांधीवादी तरीके से प्रयोग किया जाए, तो यह नीग्रो लोगों को अपने स्वतंत्रता संग्राम में काम आने वाला सबसे शक्तिशाली हथियार के रूप में उपलब्ध था.’ ‘...1957 तक महात्मा गांधी का नाम मांटगोमरी में अच्छी तरह जाना जाने लगा था. वैसे भी लोग जिन्होंने भारत के इस कृषकाय भूरे संत का नाम कभी नहीं सुना था, वे भी अब गांधी का नाम ऐसे ले रहे थे, मानो उन्हें खूब अच्छी तरह जानने का दम भर रहे हों. अहिंसक प्रतिरोध ही इस आंदोलन की तकनीक के रूप में उभरा था, जबकि प्रेम इसको काबू में रखने वाले आदर्श का काम कर रहा था. दूसरे शब्दों में कहूं तो ईसा मसीह ने उत्साह और प्रेरणा दी, जबकि गांधी ने हमें तरीका मुहैया कराया. अपनी भारत यात्रा के अंतिम दिन 9 मार्च, 1959 को आकाशवाणी से प्रसारित किए गए अपने विदाई संदेश में किंग जूनियर ने कहा था- सच्चे अर्थों में महात्मा गांधी का जीवन अपने आप में कुछ सार्वभौमिक सिद्धांतों का मूर्तरूप था. ये सिद्धांत सृष्टि की नैतिक संरचना में अंतर्निहित ऐसे सिद्धांत हैं, जो गुरुत्वाकर्षण के नियम की तरह ही अपरिहार्य हैं. 22 मार्च, 1959 को मांटगोमरी में खासतौर पर गांधी के ऊपर अपने प्रवचन में किंग जूनियर ने कहा था, दुनिया गांधी जैसे लोगों को पसंद नहीं करती. कितना आश्चर्य है, नहीं? वे ईसा मसीह जैसे लोगों को भी पसंद नहीं करते. वे लिंकन जैसे लोगों को भी पसंद नहीं करते. उन्होंने गांधी को मार डाला- उस आदमी को जिसने भारत के लिए सब कुछ किया. ...क्या यह महत्वपूर्ण नहीं है कि ईसामसीह और गांधी दोनों ही शुक्रवार के दिन मारे गए. और अब्राहम लिंकन भी तो एकदम उन्हीं कारणों से मार डाले गए जिन कारणों से गांधी को गोली मारी गई. तब किसे पता था कि करीब नौ साल बाद चार अप्रैल, 1968 को खुद किंग जूनियर भी उन्हीं कारणों से मार डाले जाएंगे, जिन कारणों से उनके मुताबिक ईसा मसीह, लिंकन और गांधी मार डाले गए. हालांकि महज 39 साल जितनी कम उम्र में ही मरकर भी वे भी हमेशा के लिए अमर हो गए. साभार:satyagrah.com

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