डॉ. सुधाकर रिलायंस इंडस्ट्रीज में ऊंचे ओहदे पर कार्यरत थे. आज वो अपने परिवार की समाजसेवा की परंपरा को जारी रखते हुए ये शानोशाकत वाली नौकरी छोड़कर अपने गांव के विकास में लग हुए हैं. डॉ. सुधाकर की एनजीओे गांव के बच्चों तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पहुंचाने के लिए काम कर रही है. वो चिकबल्लापुर जिले में स्वास्थ्य और कल्याण शिविरों का भी आयोजन कराते रहते हैं. डॉ. सुधाकर ने अपने दो दशक पुराने कॉर्पोरेट कैरियर को सामाजिक कार्य के लिए छोड़ दिया. रिलायंस इंडस्ट्रीज के कॉरपोरेट मामलों के प्रमुख के रूप में उनका करियर चरम पर था. ऐसे वक्त में उन्होंने अपने बचपन के सपने यानि कि लोगों की सेवा और उनके गांव के कल्याण के लिए नौकरी छोड़ने का मन बना लिया और एक स्वयंसेवी संस्था, श्री साई कृष्णा चैरिटेबल ट्रस्ट की नींव रखी.

कर्नाटक के चिक्कबल्लापुर जिले में एक छोटे से गांव में जन्मे डॉ सुधाकर अपने गांव और जिले को विकसित बनाने के सपने के साथ बड़े हुए थे. जरूरतमंदों को अपने घर में से भोजन, कंबल, यहां तक की जमीन भी बांट देना उनके परिवार वालों की एक नियमित आदत थी. सुधाकर के घरवालों ने अपने पूर्वजों की भूमि के विशाल इलाकों का उपयोग डाकघर, अस्पतालों, विनियमित बाजार, बिजली स्टेशनों, पुलिस स्टेशनों, आवास कॉलोनी और स्कूल के विकास और निर्माण के लिए किया था. सुधाकर बताते हैं, जब हमारे गांव को प्लेग से फैल गया था तो मुझे याद है कि मेरे परिवार ने 40-50 परिवारों में अपने भंडार में से सामान निकालकर वितरित किया था. मैंने उनके बलिदानों से ही देशभक्ति के सबक और ये सब सीखा है. इसने मेरे लिए समाज की सेवा के लिए जुनून जगाया है. यहां तक कि मेरे दादा एक स्वतंत्रता सेनानी भी थे. 

1999 में, डॉ. सुधाकर ने अपना एनजीओ बनाया. तब से उन्होंने वार्षिक चिकित्सा स्वास्थ्य शिविर स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. वो मुफ्त में क्लेफ्ट लिप सर्जरी शिविरों का आयोजन भी करते हैं. इसके अलावा, उन्होंने अपने जिले के सरकारी स्कूलों में छात्रों को परिवहन सुविधा, स्टेशनरी और कंप्यूटर प्रदान किए हैं. उनका मानना है कि शिक्षा एक हथियार है जो देश को सशक्त कर सकता है. 'मूल्य-आधारित गुणवत्ता शिक्षा' को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने अपने दिवंगत मां की याद में शांता विद्या निकेतन स्कूल शुरू किया.

2006 तक उन्होंने अपनी कॉर्पोरेट नौकरी छोड़ दी और सार्वजनिक और सामाजिक कल्याण के लिए पूर्ण समय देना शुरू कर दिया. 2013 में अपने पिता केशव रेड्डी के नक्शेकदम पर चलते हुए उन्होंने 2013 के विधानसभा चुनावों में चुनाव लड़ा और चिकबल्लापुर निर्वाचन क्षेत्र के लिए विधायक बने. वह अब विभिन्न परियोजनाओं के माध्यम विकास के रुके कार्य को आगे बढ़ा रहे हैं. हाल ही में सितंबर 2017 में, कर्नाटक में लोगों को लगातार सूखे का सामना करना पड़ रहा था. किसानों की दिक्कत को देखते हुए उन्होंने 943 करोड़ रुपये की राज्य सरकार की परियोजना की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. इस परियोजना के तहत बेंगलुरू के हेब्बल और नागावाड़ा टैंकों से पानी लिया गया.

चिकबल्लापुर के 44 छोटे सिंचाई टैंक के बारे में वो बताते हैं, 2000 के बाद बार-बार रूठे मानसून के कारण हमारे सभी जल स्रोत सूख गए हैं. मेरा ध्यान अपने निर्वाचन क्षेत्र के लिए पानी पाने के लिए था. पिछले दस सालों में ज्यादा बारिश के बिना पानी की गंभीर कमी से 1,981 टैंकों में पानी कम हो गया था. डॉ सुधाकर को उम्मीद है कि इस परियोजना के माध्यम से चिकबल्लापुर को लगभग एक टीएमसी फुट (हजार मिलियन क्यूबिक फीट) पानी मिलेगा. इसके अलावा टैंकों का पुनरुद्धार भी करा रहे हैं.

हाल ही में बनवाया गया 330 एकड़ में फैला सबसे बड़ा टैंक सूखने वाले शुष्क भूमि को राहत देगा. उस इलाके की खेती मौसमी वर्षा पर निर्भर है. डॉ सुधाकर का मानना है कि बहुत अधिक काम अभी करना बाकी है और चिकबल्लापुर में काफी हद तक बेरोजगारी है. उद्योगों को बनाने पर ध्यान देने की आवश्यकता है. हमें बिजली, पानी और अधिशेष भूमि के मामले में राज्य में एक समान विकास की आवश्यकता है.

साभार: yourstory.com

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