पुणे. चीन सरकार ने पुन इस्तेमाल (रिसाइकल्ड) किये जाने वाले अखबार कागज (न्यूजप्रिंट) पर पाबंदी लगाने की घोषणा की है, इससे भारत सहित कई देशों में अखबार उद्योग के सामने अभूतपूर्व संकट पैदा हो गया है, उन्हें अखबार कागज की बढ़ती कमी और उसके रेट में वृद्धि जैसी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. कई दैनिकों को अपने पत्रों की संख्या मजबूरन कम करनी पड़ेगी, इतना ही नहीं, अखबारों की कीमत बढ़ाने जैसा अनचाहा कदम भी उन्हें उठाना पड़ सकता है. कई अखबारों के पास 15 दिन के लिए पर्याप्त स्टाक ही बचा है, समय पर कागज न मिलने पर संस्करण निकालना भी कठिन होगा. भारतीय कागज उद्योग डूब सकता है.

चीन में दूसरे देशों से विदेशों से चीन में आने वाली इस रद्दी से वातावरण में प्रदूषण बढ़ रहा है. इसलिए इस पर रोक लगाने हेतु पाबंदी का कदम उठाने का कारण चीन ने बताया है. इससे चीन ने अपने लिए विदेशों से अखबार का कागज और पल्प का बड़ा आयात शुरू किया है, इसकी यह जरूरत भी प्रचंड है इससे न्यूजप्रिंट बनाने वाली दुनियाभर की कंपनियों पर तनाव बढ़ गया है, इसका खामियाजा भारतीय अखबार जगत को भी भुगतना पड़ रहा है, इस संकट को अखबार उद्योग के साथ रिसाइकलिंग उद्योग की दृष्टि से भी भयंकर सुनामी भी बताया जा रहा है.

चीन के न्यूजप्रिंट की बढ़ती मांग से रूस, कोरिया, कनाडा, यूरोप के साथ अन्य कंपनियों पर इस मांग का बड़ा दबाव पैदा हुआ है, दूसरे देशों से भी न्यूजप्रिंट की मांग है लेकिन ये कंपनियां सप्लाई नहीं कर पा रही हैं.

चीन की न्यूजप्रिंट की मांग प्रचंड होने से वो अन्य देशों के साथ भारत के हिस्से का न्यूजप्रिंट भी खरीद रहा है. इससे इन मिलों के पास भारत को सप्लाई करने को न्यूजप्रिंट ही नहीं बचा है, अधिकतर न्यूजप्रिंट मिल्स में मार्च 2018 तक की बुकिंग पूरी हुई है, गत छह महीनों में कई मिल्स किसी न किसी कारण से बंद पढऩे से हालात और अधिक कठिन हो गए हैं.

अखबारों के उत्पाद खर्च में कागज का खर्च सबसे अधिक होता है, गत कई सालों से यह खर्च बढ़ रहा है, इससे अखबार प्रकाशित करने वाली कंपनियों की आर्थिक स्थिति पर तनाव बढ़ रहा है, इस बीच इन्कम के अन्य स्त्रोत तलाशना भी आसान नहीं रहा है. जब-जब न्यूजप्रिंट की कमी और रेट वृद्धि होती गई, तब-तब कई अखबारों को विशिष्ट अवधि के लिए पन्नों की संख्या और अखबार का आकार कम करना पड़ा.

भारत में बड़े पैमाने पर न्यूजप्रिंट बाहर के देशों से मंगवायी जाती है, इंडियन न्यूजप्रिंट मैन्युफैक्चर्स एसोसिएशन की रिपोर्ट के अनुसार देश में तैयार होने वाली न्यूजप्रिंट हमारी मांग की तुलना में पर्याप्त नहीं है, इसलिए हमें उत्तर अमेरिका, यूरोप, रूस और स्कैडनेवीयन देशों से उसे खरीदना पड़ता है.

अमेरिका, यूरोपिय देश, जापान ऐसे कुछ देशों में अखबारों की कीमतों पर नजर डालें तो उनकी तुलना में भारत में अखबारों की कीमतें अत्यंत कम है.

अमेरिका, यूरोप में डॉलर, यूरो, पौंड, येन ऐसे विदेशी चलन में अखबार मिलते हैं, भारतीय चलन विनिमय मूल्य पर गौर करेंगे तो उनकी कीमत बहुत अधिक है, इतना ही नहीं, भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका जैसे पिछड़े देशों में अखबारों की कीमतें भी भारत से कई अधिक है, इसका मतलब यहां के पाठकों को अखबारों की वो कीमत मंजूर है.

भारत के भी विभिन्न राज्यों में कीमतों में भी बड़ा फर्क दिखाई देता है, दक्षिण और उत्तर के राज्यों की अपेक्षा महाराष्ट्र में तो स्थिति अधिक दयनीय है, महाराष्ट्र में देश के अन्य सभी अखबारों से अधिक सस्ते रेट में अखबार मिलते हैं.

यह भीषण वास्तविकता है, देश-विदेशों में तथा एशिया में प्रमुख अखबारों की कीमतों पर तुलनात्मक ब्यौरा यहां पेश किया है, इस पर नजर डालेंगे तो भारतीय और विशेष रूप से महाराष्ट्रीय अखबारों की दयनीय स्थिति स्पष्ट हो जाती है.

टूटने की कगार पर उद्योग

भारतीय अखबार कागज उद्योग डूबने के हालात में है, यह निरीक्षण इंडिया न्यूजप्रिंट मैन्युफैक्चर्स एसोसिएशन ने दर्ज किया है, न्यूजप्रिंट तैयार करने वाली कुल 121 मिलों में से आधी मिले सरकार की आयात नीति में कमजोर प्रावधानों के कारण बंद पड़ी हैं, शेष मिलों में कैपेसिटी का 60 प्रतिशत उत्पादन होता है.

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