दुनिया में इंसानियत से बढ़कर कोई चीज नहीं होती. कहते हैं कि गरीबों और असहायों की मदद करने में जो सुकून मिलता है वो शायद और कहीं नहीं. हैदराबाद में एक ऐसा ही मामला सामने आया है जहां एक व्यक्ति ने सड़क पर मरने को मजबूर गरीबों की मदद का बीड़ा उठाया. हैदराबाद में पले-बढ़े जॉर्ज राकेश बाबू ने गैर लाभकारी 'गुड स्मार्टियन इंडिया' शुरू किया. इवेंट मैनेजर से सामुदायिक डॉक्टर बने जॉर्ज राकेश बाबू ने सड़क पर पड़े बीमार बुजर्गों की मदद करने की ठानी. राकेश बाबू ने पहले एक छोटा सा क्लीनिक खोला लेकिन आज अलवाल, वारंगल और एलर में स्थित तीन शाखाओं के साथ एक पूर्ण विकसित बेसहारा लोगों का घर है.

जॉर्ज राकेश बाबू ने मार्च 2011 में अपने सह-संस्थापक सुनीता जॉर्ज और यसुकला के साथ मिलकर औपचारिक तौर पर 'गुड स्मार्टियन इंडिया' नाम से एक ट्रस्ट रजिस्टर कराया. ये ट्रस्ट चिकित्सकीय प्रशिक्षित व्यक्तियों का एक बहुत छोटा समूह है. ये लोग बुजुर्गों के लिए बुनियादी देखभाल प्रदान करते हैं. साथ ही एक छोटा सा मुक्त फार्मेसी चलाते हैं.

इस ट्रस्ट के लोगों ने बिना किसी पैसों के 300 से अधिक बीमार बुजुर्गों व बेसहारा लोगों की मदद की है जिन्हें सड़क पर मरने ले लिए छोड़ दिया गया था. यहां से ठीक होने के बाद ज्यादातर लोग अपने परिवारों के साथ फिर से मिल जाते हैं. कुछ लोग उस फार्मेसी सरीखे घर को चलाने के लिए वहीं रुक जाते हैं. ये लोग घावों पर पट्टी बांधने से लेकर उन बुजुर्गों के डायपर बदलने तक सभी काम करते हैं जो बेड से उठ नहीं पाते. यही नहीं ये लोग सभी के लिए खाना भी बनाते हैं. इतना सब संभव हो पाया तो केवल जॉर्ज राकेश बाबू के उस सपने की वजह से जिसने उन्हें बुजुर्गों की मदद करने के लिए आगे बढ़ाया.

दरअसल दुनिया के बारे में जॉर्ज का मत एक तमिल पुजारी की गुमनाम मौत ने बदला. ये वह पुजारी था जिसे जॉर्ज कई वर्षों से जानते थे. इन्हीं पुजारी ने एक अनाथालय भी चलाया था. कई चुनौतियों, बाधाओं और परिवार या रिश्तेदारों से कोई समर्थन न मिलने के बावजूद पुजारी ने अपने आनाथालय में 60 से अधिक अनाथ बच्चों को बेहतर जीवन दिया था. पुजारी की मौत ने जॉर्ज को झकझोर कर रख दिया लेकिन उन्हें जीवन जीने का सलीका सिखा गई.

जॉर्ज के मुताबिक बुजुर्ग पुजारी को अनाथालय चलाने में कई बाधाओं का सामना करना पड़ा. एक बार जिस बिल्डिंग में अनाथालय बना था उसी के मालिक ने पुजारी से रेंट देने की मांग कर दी. पुजारी ने इसके लिए कुछ और समय मांगा क्योंकि अनाथालय को वित्तीय संकट का सामना करना पड़ रहा था. ऐसे में पुजारी के लिए रेंट के पैसे जुटाना संभव नहीं था. लेकिन मकान मालिक ने पुजारी की एक भी बात नहीं सुनी और हुक्म दे दिया कि या तो किराया तुरंत दीजिए या सभी 60 बच्चों के साथ तुरंत घर छोड़ दीजिए.

ये सब देखकर जॉर्ज को धक्का लगा. जिस आदमी ने अनाथों के लिए अपने पूरे जीवन को समर्पित कर दिया और उसे अपमान का घूंट पीना पड़े ये समाज की विडंबना है. जॉर्ज ने कुछ अन्य लोगों के साथ मिलकर सभी बच्चों को शहर के दूसरे अनाथालय में भिजवाने का इंतजाम किया. साथ ही जॉर्ज ने पुजारी से अनुरोध किया कि वह उसके घर के सामने किराए पर रहें और किराया वह खुद देगा व अपनी देखभाल करने का मौका दें.

जॉर्ज बताते हैं "कुछ दिनों के बाद मैंने एक जगह किराए पर ली. जब घर तैयार हो गया तब मैंने उन्हें कई बार फोन किया कि मैं तुम्हें अनाथालय से ले आउंगा. लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया. तब मैंने केयरटेकर लड़के को फोन किया तो उसने बताया कि मकान मालिक ने पिता (पुजारी) से कहा था कि वह अपना सामान पैक करें और सुबह ही यहां से चले जाएं. अपना सामान पैक करने के बाद पुजारी अनाथालय के बाहर कुर्सी पर मेरा इंतजार करते रहे. लेकिन तब उनका स्वास्थ्य बिगड़ना शुरू हो गया था. जिसके बाद उस लड़के ने पुजारी को अपने रिश्तेदार के घर में रखने का फैसला किया. जब तक मैं पहुंचा तब तक उनकी धड़कनें रुक चुकी थीं. 

जब जॉर्ज अपने कुछ दोस्तों के साथ मिलकर उस बूढ़े आदमी के शरीर को दफनाने के लिए जगह ढ़ूंढ़ रहे थे तब कोई श्मशान वाले इस पर सहमत नहीं हुए. जॉर्ज बताते हैं कि लोग हैदराबाद को एक महानगरीय शहर कहते हैं लेकिन यह महानगरीय शहर उन लोगों से भरा है जो केवल जाति, पंथ और रंग और संप्रदाय के बारे में बहस करना चाहते हैं. किसी ने भी उस बूढ़े आदमी के शरीर को दफनाने में मदद नहीं कि जिसने 60 अनाथ बच्चों को जीवन दिया.

कई दिक्कतों का सामना करने के बाद जॉर्ज ने शहर से सटी एक बस्ती में जाने का फैसला किया. जहां एक श्मशान पुजारी को दफनाने पर सहमत हो गया. जॉर्ज बताते हैं कि पुजारी के मिट्टी में दफन होने से पहले करीब 50 बच्चे आकर रोने-चिल्लाने लगे. ये वही बच्चे थे जिन्हें पुजारी ने जीवन दिया था.

जॉर्ज आगे कहते हैं "मैं उस तस्वीर को मेरे दिमाग से नहीं निकाल सकता. जब भी मैं उनकी कब्र पर फिर से जाता हूं मेरे कानों में उनके रोने की आवाजें सुनाई देती हैं. उस दिन मैंने फैसला किया कि मैं किसी भी उस व्यक्ति को जो अकेला छोड़ दिया गया है अज्ञात मृत्यु नहीं मरने दूंगा. प्रत्येक व्यक्ति को अपने आखिरी दिनों में पूर्ण जीवन जीने का अधिकार है. एक सम्मानजनक मृत्यु का भी अधिकार है." ये वो कहानी थी जिसने 'गुड स्मार्टियन इंडिया' की नींव रखी. जब जॉर्ज ने अपना स्वयं का क्लिनिक और घर शुरू किया तो कई लोग बेसहारा बुजुर्गों को लाने में मदद करने लगे. लेकिन जॉर्ज याद करते हैं कि कुछ ऐसे बच्चे थे जो अपने स्वयं के बुजुर्ग माता-पिता और रिश्तेदारों को लेकर आए थे.

इनमें से कई कैंसर रोगी थे. वो लोग अपने बुजुर्गों को इसलिए भी ला रहे थे क्योंकि कैंसर का इलाज बहुत महंगा है और वह उसका बोझ नहीं उठा सकते थे. इलाज के लिए पर्याप्त संसाधन न होने के बावजूद मैंने कुछ यूनानी डॉक्टरों से मदद ली, ताकि वो लोग कुछ और दिन जी सकें. जब वह मर जाएंगे तो उनके रिश्तेदार आकर उन्हें ले जाएंगे. जॉर्ज राकेश बाबू द्वारा शुरू की गई उस एक पहल ने आज 300 से ज्यादा बुजुर्गों को एक सम्मानजनक जिंदगी दी है. जॉर्ज ने अपने थेयटर मास्टर की मदद से सोशल मीडिया का सहारा लेते हुए कई ऐसे काम किए हैं जिनकी हर कोई सराहना कर रहा है.

साभार:yourstory.com

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