भगवान भास्कर की उपासना और लोकआस्था के पर्व छठ की तैयारियां अंतिम चरण में है. भक्तों की अटल आस्था का अनूठा पर्व छठ की चर्चा ऋग्वेद में भी की गई है. इस पर्व में कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की षष्ठी आौर सप्तमी को अस्ताचलगामी और उदीयमान सूर्यदेव की उपासना की जाती है और भगवान भास्कर को अर्घ्य देकर नमन किया जाता है.

सूर्यपासना का यह पर्व कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष के चतुर्थी से सप्तमी तिथि तक मनाया जाता है. सूर्यषष्ठी व्रत होने के कारण इसे ‘छठ’ कहा जाता है.सुख-समृद्धि और मनोवांछित फल देने वाले इस पर्व को पुरुष और महिला समान रूप से मनाते हैं, लेकिन आमतौर पर व्रत करने वालों में महिलाओं की संख्या अधिक होती है. कुछ वर्ष पूर्व तक मुख्य रूप से यह पर्व बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में मनाया जाता था, लेकिन अब यह पर्व पूरे देश में मनाया जाता है.

प्राचीन धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस अनुपम महापर्व को लेकर कई कथाएं प्रचलित हैं. ज्योतिषाचार्य पंडित प्रबोध बताते हैं, “सृष्टि के संचालक और पालनकर्ता सूर्य की उपासना की चर्चा ऋग्वेद में मिली है. ऋग्वेद में देवता के रूप में सूर्यवंदना का उल्लेख मिलता है. ऋग्वेद में ‘सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च’ अर्थात सूर्य को जगत की आत्मा, शक्ति व चेतना होना उजागर करता है.”

उन्होंने बताया कि पुराण में वर्णित एक कथा के अनुसार संतान प्राप्ति के लिए राजा प्रियवद द्वारा सर्वप्रथम इस व्रत को किए जाने का उल्लेख है. वहीं महाभारत में सबसे पहले सूर्यपुत्र कर्ण द्वारा सूर्यदेव की पूजा का उल्लेख मिलता है. द्रौपदी भी अपने परिजनों के उत्तम स्वास्थ्य की कामना और लंबी उम्र के लिए नियमित सूर्य उपासना करती थीं, जिसका प्रमाण धार्मिक ग्रंथों में मिलता है.

मान्यता है कि छठ देवी सूर्यदेव की बहन हैं और उन्हीं को प्रसन्न करने के लिए भगवान सूर्य की अराधना की जाती है. व्रत करने वाले गंगा, यमुना या किसी नदी और जलाशयों के किनारे अराधना करते हैं.  कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी तिथि को उपवास रखकर शाम  को व्रतियां टोकरी (बांस से बना दउरा) में ठेकुआ, फल, ईख समेत अन्य प्रसाद लेकर नदी, तालाब, या अन्य जलाशयों में जाकर अस्ताचलगामी सूर्य का अघ्र्य अर्पित करती हैं और इसके अगले दिन यानि सप्तमी तिथि को सुबह उदीयमान सूर्य को अघ्र्य अर्पित कर घर लौटकर अन्न-जल ग्रहण कर ‘पारण’ करती हैं, यानी व्रत तोड़ती हैं.

इस वर्ष 26 अक्टूबर को षष्ठी है. इस पर्व में स्वच्छता और शुद्धता का विशेष ख्याल रखा जाता है. इस पर्व में गीतों का खासा महत्व होता है. छठ पर्व के दौरान घरों से लेकर घाटों तक पारंपरिक कर्णप्रिय छठ गीत गूंजते रहते हैं. व्रतियां जब जलाशयों की ओर जाती हैं, तब वे छठ महिमा की गीत गाती हैं. इस दिन गांव से लेकर शहरों तक के लोग छठव्रतियों को किसी प्रकार का कष्ट न हो इसका पूरा ख्याल रखते हैं.

छठ व्रत कथा

मार्कण्डेय पुराण में इस बात का उल्लेख मिलता है कि सृष्टि की अधिष्ठात्री प्रकृति देवी ने अपने आप को छह भागों में विभाजित किया है और इनके छठे अंश को सर्वश्रेष्ठ मातृ देवी के रूप में जाना जाता है, जो ब्रह्मा की मानस पुत्री और बच्चों की रक्षा करने वाली देवी हैं. कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को इन्हीं देवी की पूजा की जाती है. शिशु के जन्म के छह दिनों के बाद भी इन्हीं देवी की पूजा करके बच्चे के स्वस्थ, सफल और दीर्घ आयु की प्रार्थना की जाती है. पुराणों में इन्हीं देवी का नाम कात्यायनी मिलता है, जिनकी नवरात्र की षष्ठी तिथि को पूजा की जाती है.

छठ व्रत की परंपरा सदियों से चली आ रही है. यह परंपरा कैसे शुरू हुई, इस संदर्भ में एक कथा का उल्लेख पुराणों में मिलता है. इसके अनुसार प्रियव्रत नामक एक राजा की कोई संतान नहीं थी. संतान प्राप्ति के लिए महर्षि कश्यप ने उन्हे पुत्रयेष्टि यज्ञ करने का परामर्श दिया. यज्ञ के फलस्वरूप महारानी ने एक पुत्र को जन्म दिया, किंतु वह शिशु मृत था. इस समाचार से पूरे नगर में शोक व्याप्त हो गया. तभी एक आश्चर्यजनक घटना घटी. आकाश से एक ज्योतिर्मय विमान धरती पर उतरा और उसमें बैठी देवी ने कहा, ‘मैं षष्ठी देवी और विश्व के समस्त बालकों की रक्षिका हूं.’ इतना कहकर देवी ने शिशु के मृत शरीर का स्पर्श किया, जिससे वह बालक जीवित हो उठा. इसके बाद से ही राजा ने अपने राज्य में यह त्योहार मनाने की घोषणा कर दी.

दूसरी छठ व्रत कथा

पौराणिक मान्यता के अनुसार कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी के सूर्यास्त और सप्तमी के सूर्योदय के मध्य वेदमाता गायत्री का जन्म हुआ था. प्रकृति के षष्ठ अंश से उत्पन्न षष्ठी माता बालकों की रक्षा करने वाले विष्णु भगवान द्वारा रची माया हैं. बालक के जन्म के छठे दिन छठी मैया की पूजा-अर्चना की जाती है, जिससे बच्चे के ग्रह-गोचर शांत हो जाएं और जिंदगी मे किसी प्रकार का कष्ट नहीं आए. अत: इस तिथि को षष्ठी देवी का व्रत होने लगा.

तीसरी छठ व्रत कथा

एक कथा के अनुसार जब पांडव अपना सारा राजपाट जुआ में हार गए, तब द्रौपदी ने छठ व्रत किया. इससे उसकी मनोकामनाएं पूरी हुई तथा पांडवों को राजपाट वापस मिल गया.

इसके अलावा छठ महापर्व का उल्लेख रामायण काल में भी मिलता. आज छठ ना सिर्फ बिहार और यूपी बल्कि संपूर्ण भारत में समान हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है.

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