बन्दगोभी में विटामिन “सी”, “बी1” पर्याप्त मात्रा में पाये जाते हैं. इसके अतिरिक्त विटामिन “ए” और खनिज लवण भी पाये जाते है. बन्दगोभी की सामान्य बढ़वार हेतु अधिक समय तक ठण्डी जलवायु तथ वायुमण्डल में पर्याप्त नमी होनी चाहिए. बन्दगोभी में पाला व ठण्ड सहन करने की क्षमता फूल गोभी से अधिक होती हैं.

उन्नतशील किस्म:

गोल्डन एकर- यह जल्दी उगने वाली किस्म है पत्तियों का रंग बाहर से हल्का अन्दर से गहरा हरा. यह किस्म पौधा लगाये जाने के 60-65 दिन में सब्जी के लिए तैयार हो जाती है.

प्राइड आॅफ इण्डिया- जल्दी उगने वाली, वनज 1 से 1.5 कि.ग्रा., इस किस्म के बन्द ठोस, मध्यम गोल आकार के होते है. सब्जी के लिए 70-80 दिन में तैयार हो जाती है. 20-28 टन एक हेक्टेयर क्षेत्र से उत्पादन लिया जा सकता है.

अर्ली ड्रम है प्रमुख है. फसल रोपाई से 60-70 दिन बाद काटने योग्य हो जाती है. इसका ऊपरी हिस्सा चपटा होता है. इसका बजन 2-3 कि.ग्रा तक होता है. इसकी औसत उपज 25-30 टन प्रति हेक्टेयर की दर से मिल जाती है.

पूसा मुक्ता– इस किस्म का शिखर वाला हिस्सा गोल, मध्यम आकार का होता है, इसकी बाहरी पत्तियां हल्की हरी होती है. वजन डेढ़ से दो कि.ग्रा के बीच होता है. यह ब्लैक राॅट रोग के प्रति सहनशील है. एक हेक्टेयर क्षेत्र से 25-30 टन उत्पादन लिया जा सकता है.

पूसा सिंथेटिक– इसके मथे मध्यम आकार के होते है. इस किस्म की उत्पादकता अधिक होती है. एक हेक्टेयर क्षेत्र से 35-46 टन उत्पादन लिया जा सकता है.

मिड सीजन मार्केट– यह मध्य सीजन की फसल है, इसका फूल गोल होता है और खाने में स्वादिष्ट, फूल का बजन 2 से 4 कि.ग्रा. तक होता है. 40-50 टन प्रति हेक्टेयर उत्पादन लिया जा सकता है.

पूसा ड्रम हैड– यह देरी से तैयार होने वाली सब्जी फसल है. इसका शिखर बड़ा एवं चिपटा होता है. फूल का बजन 3 से 5 कि.ग्रा. तक होता है. 25-30 टन प्रति हेक्टेयर उत्पादन लिया जा सकता है. भूमि शोधन: खेत की अच्छी तरह से तैयारी करने के बाद खेत को छोटी-छोटी क्यारियों में विभाजित करें. इसके बाद मिट्टी में लगने वाली फफूँदी रोगों की रोकथाम हेतु 200 लीटर अमृत पानी घोल प्रति एकड़ की दर से भूमि शोधन के लिए छिड़काव करें.

बीज की मात्रा :

बन्दगोभी की अगेती किस्मों की एक एकड़ में रोपाई करने के लिए 200-250 ग्राम बीज तथा पछेती किस्मों के लिए 175-200 ग्राम बीज की पौध पर्याप्त रहती है. ट्राईकोडर्मा जैविक फफूंदीनाशक 4 ग्राम से 100 ग्राम बीज को शोधित कर नर्सरी में बुवाई करें. ट्राईकोडर्मा के प्रयोग करने से बीजों में अंकुरण अच्छा होता है तथा पौधे फफूंदी जनित रोग से मुक्त रहते हैं. पौध को नर्सरी से उखाड़ने के बाद रोपाई करने से पूर्व बीजामृत या पंचगव्या के 3 प्रतिशत घोल में 30 मिनट डुबोकर खेत में रोपाई करें.

बुवाई का समय:

बन्दगोभी की अगेती किस्मों की बूवाई नर्सरी में अगस्त माह के दूसरे पखवाडे से लेकर मध्य सितम्बर माह तक कर देनी चाहिए. पछेती किस्मों की बुवाई सितम्बर-अक्टूबर माह में करनी चाहिए.

खाद एवं जैविक उर्वरक: बन्दगोभी की उन्नतशील किस्मों से अच्छी पैदावार लेने के लिए खेत तैयार करते समय 100-120 कुन्टल सड़ी गोबर की खाद अथवा 60-70 कुन्टल नोदप कम्पोस्ट अथवा 40-50 कुन्टल वर्मीकम्पोस्ट प्रति एकड़ की दर से खेत में मिलायें. इसके अतिरिक्त बुवाई करने से पहले 1 कि.गा्र. कल्चर-प्ए प्रति एकड़ की दर से सड़ी गोबर की खाद अथवा खेत की मिट्टी में मिलाकर अन्तिम जुताई के समय नमी की अवस्था में मिट्टी में मिला दें. गौ-मूत्र के 10 प्रतिशत घोल का पहला छिड़काव रोपाई के 25-30 दिन बाद तथा दूसरा छिड़काव 40-45 दिन पर करें. पहली निकाई-गुड़ाई के समय खेत में 10-12 कुन्टल प्रति एकड़ की दर से नादेप/वर्मीकम्पोस्ट का प्रयोग करें. वर्मीवाश के 10 प्रतिशत घोल के 3 छिड़काव क्रमशः बन्दगोभी में पत्ते मुडते समय, बन्द बनते समय एवं बन्द विकसित होने की अवस्था में करने से बन्द सुदृढ ठोस एवं हरे रंग के विकसित होते हैं.

खरपतवार नियंत्रण:

बन्दगोभी में साधारणतः 2-3 निकाई-गुड़ाई की आवश्यकता पड़ती है. पहली निकाई पौध रोपाई के लगभग 20-25 दिन बाद तथा दूसरी व तीसरी निकाई-गुड़ाई क्रमशः 35-40 एवं 50-55 दिन बाद करनी चाहिए. यदि खेत में खरपतवार की संख्या अधिक है तो पछेती किस्म में चैथी गुडाई 70-75 दिन बाद करें. दूसरी गुड़ाई के दौरान पौधों पर मिट्टी चढ़ा देने से खरपतवार में कमी एवं सिंचाई पानी की बचत की जा सकती है. बन्द गोभी में पलवार (मंल्च) का प्रयोग करने से खरपतवार पर नियंत्रण के साथ-साथ सिंचाई पानी की बचत भी की जा सकती है.

कीट नियंत्रण:

डायमंड बैक मोथ, बन्दगोभी की सूँड़ी, गोभी की तितली, कीट नियंत्रण हेतु बहा्रमअस्त्र/अग्नि अस्त्र/नीम गुठली पाउडर का 5 प्रतिशत घोल का 15 दिन के अन्तराल पर 2-3 छिड़काव करने चाहिए.

रोग नियंत्रण:

आर्द्र गलन रोग, जीवाणुवीय एवं फफूंदी जनित रोग की रोकथाम हेतु कल्चर-1, से खेत की तैयारी के समय भूमि शोधन करना लाभदायक रहता है. बन्दगोभी मंे जड़ गलन रोग की रोकथाम हेतु 8-10 दिन पुरानी 10 लीटर खट्टी लस्सी/मट्ठा मंे 20 ग्राम हल्दी मिलाकर 100 लीटर पानी में घोलकर 10 दिन के अन्तराल पर 2-3 छिड़काव करना चाहिए. 5 कि.ग्रा. जली लकड़ी की बारीक छनी राख को 20 लीटर पानी में घोलकर 2 घण्टा रखने के बाद बारीक कपडे़ में बनाये गये घोल को छानकर पौधों पर छिड़काव करने से रोगों पर नियंत्रण पाया जा सकता है.

फूलगोभी की कटाई गे्रडिंग, पेंकिंग एवं विपणन:

बन्दगोभी के फूलों की कटाई 3-4 दिन के अन्तर पर परिपक्व अवस्था में समय पर करें. रोग ग्रस्त, सड़े-गले बन्दों को अलग करने के बाद शेष को आकार के अनुसार गे्रड (बड़े, मध्यम एवं छोटे आकार) में रखें. बाजार में बन्दगोभी भेजने हेतु लकड़ी के क्रेटस उपयोग करना लाभदायक व सुविधाजनक रहता है.

बीज उत्पादन:

बन्दगोभी एक परसेंचित फसल है, जिसमें परागण मधुमक्खियों के द्वारा होता हैं. बन्दगोभी की अगेती एवं मध्यम मौसमी किस्मों का उत्पादन ठण्डे पर्वतीय क्षेत्रों में किया जाता है. बन्दगोभी का आनुवांशिक शुद्ध बीज उत्पादन प्राप्त करने के लिए बन्दगोभी व फूलगोभी की दो किस्मों तथा सरसों कुल की फसलों के बीच 1 हजार मीटर की प्रथककरण दूरी रखना अनिवार्य है.

साभार:indiankissan.com

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