हस्तरेखा में मंगल पर्वत को दो स्थान दिए गए हैं अत: माना जा सकता है कि मंगल कितना शक्तिशाली और प्रमुख पर्वत है. मंगल पर्वत को हथेली में दो स्थानों पर माना जाता है- एक ऊपर और दूसरा नीचे. एक उच्च का पर्वत होता है और दूसरा नीच का होता है. उच्च मंगल पर्वत हृदय रेखा जहां से शुरू होती उसके ऊपर स्थित होता है जबकि नीच का मंगल जहां से जीवन रेखा शुरू होती है वहां से कुछ ऊपर होता है. ऊपर के मंगल का ज्यादा उन्नत और उभरा होना व्यक्ति में आक्रामकता एवं साहस को बढ़ावा देता है क्योंकि वह सेनापति है, ऐसे जातक स्वभाव से जुझारू होते हैं तथा विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी हिम्मत से काम लेते हैं तथा सफलता प्राप्त करने के लिए बार-बार प्रयत्न करते रहते हैं और अपने रास्ते में आने वाली बाधाओं तथा मुश्किलों के कारण आसानी से विचलित नहींं होते. इस स्थान पर किसी वृत्त, दाग या तिल का होना इसे और ज्यादा पुष्ट करता है. उसे दुर्घटना द्वारा चोट भी लग सकती है और उसका कोई अंग भंग हो सकता है. ऊपर का मंगल यदि बुध पर्वत की ओर खिसका हो तो जातक का स्वभाव उग्र होता है. वह हमेशा अपने को एक कुशल योद्धा समझता है और जिसके कारण जातक के शरीर की चीर-फाड़ हो सकती है तथा अत्याधिक मात्रा में रक्त भी बह सकता है. मंगल पर्वत से निकलकर कोई रेखा यदि जीवनरेखा तक आये तो वह रेखा को जीवनरेखा जहां काट रही हो, उस समय तथा उम्र में किसी दुर्घटना अथवा लड़ाई में अपने शरीर का कोई अंग भी गंवा सकता है. इसके अतिरिक्त मंगल पर्वत पर कोई क्रास का निशान या द्वीप होना जातक को सिरदर्द, थकान, गुस्सा जैसी समस्याएं दे सकता है. यह पर्वत अविकसित हो तो जातक डिप्रेशन का मरीज होता है. यदि मगंल के उस पर्वत से कोई रेखा चंद्र पर्वत तक जाये तो ऐसा जातक निर्णय लेने में विलंब तथा लगातार अनियमित कार्य करने का आदी होता है. यह मंगल पर्वत यदि चंद्र पर्वत से दबा हो तो उसे सफलता ना मिलने के कारण चिड़चिड़ापन भी होता है. इस पर्वत पर कोई अशुभ चिह्न व्यक्ति को आर्थिक मुसीबतों और पारिवारिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है और उसकी वाणी प्रभावित होती है.

नीचे का मंगल क्षेत्र भी इसी प्रकार से उन्नत होने पर जातक अति आत्म विश्वास से युक्त होता है. वह किसी भी कार्य को चुनौती देकर स्वीकार करता है. इस स्थिति का मंगल अंगुठे की तरफ खिसका हो तो जातक कूटनीति करने वाला होता है. फलत: वह नित नवीन परेशानियों एवं उलझनों से घिरा रहता है. मंगल का अनेक रेखाओं से दबा होना और उस स्थान पर जाल का चिह्न रक्त प्रवाह को असामान्य करता है. यदि नीचे का मंगल शुक्र की ओर झुका हुआ हो तो शुक्र और मंगल से प्रभावित होने के फलस्वरूप वह उग्र स्वभाव का हो जाता है. इस स्थिति में उसमें काम के प्रति आसक्ति बनी रहती है और वह काम पिपासा को शांत करने हेतु किसी भी हद तक जा सकता है. यदि इन दोनों पर्वतों पर द्वीप या क्रास का निशान मिले तो जातक को उसका प्यार न मिले तो वह दुखी होकर एडीक्षन का आदी हो सकता है. मंगल पर्वत का उन्नत होना तथा जाल रहित होना व्यक्ति में अच्छे आत्मविष्वास का घोतक होता है. उस पर किसी ग्रह का शुभ चिह्न ऊध्र्व रेखाएं या कोई अन्य शुभ चिह्न हो तो यह बहुत ही योगकारक ग्रह बन कर व्यक्ति को सफलता के शिखर पर पहुंचा देता है. इसकी स्थिति, शुभाशुभ चिह्नों की प्रतिक्रिया, अन्य पर्वतों से सामंजस्य एवं हाथ के आकार प्रकार, उंगलियों की बनावट और उन पर स्थित चिह्नों को भी इसके साथ जोड़ कर सही स्थिति का पता लगाया जा सकता है तथा समस्याओं का समाधान किया जा सकता है मंगल आम तौर पर ऐसे क्षेत्रों का ही प्रतिनिधित्व करते हैं जिनमें साहस, शारीरिक बल, मानसिक क्षमता आदि की आवश्यकता पड़ती है जैसे कि पुलिस की नौकरी, सेना की नौकरी, अर्ध-सैनिक बलों की नौकरी, अग्नि-शमन सेवाएं, खेलों में शारीरिक बल तथा क्षमता की परख करने वाले खेल जैसे कि कुश्ती, दंगल, टैनिस, फुटबाल, मुक्केबाजी तथा ऐसे ही अन्य कई खेल जो बहुत सी शारीरिक उर्जा तथा क्षमता की मांग करते हैं. इसके अतिरिक्त मंगल ऐसे क्षेत्रों तथा व्यक्तियों के भी कारक होते हैं जिनमें हथियारों अथवा औजारों का प्रयोग होता है जैसे हथियारों के बल पर प्रभाव जमाने वाले गिरोह, शल्य चिकित्सा करने वाले चिकित्सक तथा दंत चिकित्सक जो चिकित्सा के लिए धातु से बने औजारों का प्रयोग करते हैं, मशीनों को ठीक करने वाले मैकेनिक जो औजारों का प्रयोग करते हैं तथा ऐसे ही अन्य क्षेत्र एवं इनमे काम करने वाले लोग. इसके अतिरिक्त मंगल भाइयों के कारक भी होते हैं तथा विशेष रूप से छोटे भाइयों के. मंगल पुरूषों की कुंडली में दोस्तों के कारक भी होते हैं तथा विशेष रूप से उन दोस्तों के जो जातक के बहुत अच्छे मित्र हों तथा जिन्हें भाइयों के समान ही समझा जा सके. क्योंकि मंगल रक्त के सीधे कारक माने जाते हैं. मंगल के प्रबल प्रभाव वाले जातक शारीरिक रूप से बलवान तथा साहसी होते हैं. अत: मंगल पर्वत का विकसित होना जातक के उत्साह एवं उमंग का प्रतीक होता है और इससे जातक के लगनशील होने का पता चलता है. साथ ही नीचे के मंगल का शुक्र के बराबर उन्नत होना जीवन में समृद्धि देता है. मंगल पर्वत और मंगल रेखा का विकसित होना जीवन में अच्छी उर्जा तथा सफलता का कारण होता है. वहीं उपर के मंगल का बुध की ओर झुका होना अच्छे स्वास्थ्य और समझ को बताता है. मंगल पर्वत का स्थान सपाट होता है वह कायर और डरपोक होते हैं. मंगल पर्वत पर किसी भी प्रकार का क्रास का चिंह होना और जीवन रेखा कट कर कोई रेखा बाहर तक जाकर दूसरे मंगल पर्वत तक जाये तो यह कारावास या समाज से निष्कासित होने को दर्शाता है.

मंगल पर्वत को विकसित करने तथा उर्जा, उत्साह तथा साकारात्मकता बढ़ाने हेतु अनामिका उंगली जिसपर मंगल से संबंधित रत्न मूंगा धारण करना चाहिए इसके अलावा मंगल पर्वत के लिए निम्न मुद्रा का अभ्यास करना भी लाभ देता है.

उपाय:

उपाए (1):

* सिद्धासन,पदमासन या सुखासन में बैठ जाएँ.

* दोनों हाँथ घुटनों पर रख लें हथेलियाँ उपर की तरफ रहें.

* अनामिका अंगुली (रिंग फिंगर) को मोडकर अंगूठे की जड़ में लगा लें एवं उपर से अंगूठे से दबा लें.

* बाकी की तीनों अंगुली सीधी रखें. अनामिका अंगुली पृथ्वी एवं अंगूठा अग्नि तत्व का प्रतिनिधित्व करता है, इन तत्वों के मिलन से शरीर में तुरंत उर्जा उत्पन्न हो जाती है.

उपाए (2):

* पद्मासन या सिद्धासन में बैठ जाएँ, रीढ़ की हड्डी सीधी रखें.

* अपने दोनों हाथों को घुटनों पर रख लें, हथेलियाँ ऊपर की तरफ रहें.

* हाथ की सबसे छोटी अंगुली (कनिष्ठा) एवं इसके बगल वाली अंगुली (अनामिका) के पोर को अंगूठे के पोर से लगा दें. इससे प्राणशक्ति बढती है इस मुद्रा के निरंतर अभ्यास से मन की बैचेनी और कठोरता को दूर होती है एवं एकाग्रता बढ़ती है.

उपाए (3):

* सुखासन या अन्य किसी आसान में बैठ जाएँ, दोनों हाथ घुटनों पर, हथेलियाँ उपर की तरफ एवं रीढ़ की हड्डी सीधी रखें.

* मध्यमा (बीच की अंगुली)एवं अनामिका अंगुली के उपरी पोर को अंगूठे के उपरी पोर से स्पर्श कराके हल्का सा दबाएं. तर्जनी अंगुली एवं कनिष्ठा (सबसे छोटी) अंगुली सीधी रहे इस मुद्रा के प्रभाव से साधक में सहनशीलता, स्थिरता और तेज का संचार होता है.

-पंडित पीएस त्रिपाठी

साभार: pstripathi.wordpress.com

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