ज्योतिष मॆ तीन नाड़ी होती है आदि मध्य और अंत. किसी भी व्यक्ति की इन तीन नाड़ी मॆ से एक नाड़ी होती है. इन नाड़ी के द्वारा जातक की तासीर कैसी है ये आसानी से जाना जाता है. आयुर्वेद मॆ किसी भी व्यक्ति का इलाज जातक की नाड़ी देखकर ही किया जाता है. विवाह सम्बन्धों मॆ एक नाड़ी मॆ आपस मॆ विवाह को निषेध घोषित किया है इससे वर वधू तथा आनेवाली संतान के स्वास्थ्य का खतरा रहता है.

*नाड़ी तथा तासीर

किसी भी प्राणी की तीन प्रकार की प्रकृति  होती है प्रथम वात द्वितीय पित्त तृतीय कफ.आदि नाड़ी वाला जातक वात अर्थात वायु प्रक्रति वाला होता है.मध्य नाड़ी वाला जातक पित्त प्रकृतिका होता है वही अन्त नाड़ी वाला जातक कफ प्रकृति का होता है.आपकी नाड़ी कौनसी है ये आपकी जन्मपत्रिका मॆ लिखा होता है जन्म तारीख के अनुसार जब आपकी पत्रिका बनती है उसमे आपकी नाड़ी लिखी होती है जिससे आप अपनी तासीर प्रकृति जानकर अपने खानपान को व्यवस्थित कर काफी हद तक अपने स्वास्थय को नियन्त्रित कर सकते है साथ ही दवा कैसी लेनी है ये भी निर्णय कर सकते है एक तरह से आप खुद के डॉक्टर बन सकते है.

*आदि

यदि आपकी नाड़ी आदि है तो आपकी प्रक्रति वायु है शनि और बुध ग्रह वायु कारक है यानी तेल के संतुलित तथा व्यवस्थित सेवन आपके स्वास्थय को सुधार सकता है.यही संतुलन बिगड़ने पर आपको वायु जनित रोग दे सकता है.आप किसी आयूर्वेदचार्य से अपनी वायु प्रकृति के अनुसार खानपान व दवा निश्चित कर सकते है जिससे आपको लाभ होगा.

*मध्य

यदि आपकी नाड़ी मध्य है तो आपकी प्रक्रति पित्त है पित्त अर्थात अग्नि सूर्य और मंगल ग्रह अग्नि प्रधान है.यदि कुछ भी ऐसा खानपान करते है जिसकी प्रक्रति गरम है तो आपका स्वास्थ्य  तुरंत बिगड़ सकता है.मसालेदार खाना,गरम काफी आदि से आपके स्वास्थय मॆ गड़बड़ हो सकती है.

*अंत

अंत नाड़ी अर्थात आपकीप्रकृति कफ है गुरु और शुक्र दोनो ग्रह कफकारक है.इनकी प्रकृति जलीय होती है.यदि आपने ज्यादा ठंडा भोजन जैसे आईसक्रीम दही तथा रसदार फल जिसकी तासीर भी ठंडी है उसका ठंडे मौसम मॆ यदि सेवन कर लिया तो समझिये आपको निमोनिया निश्चित ही होगा.

*यदि आपको अपनी प्रकृति मालूम है तो किसी वैद्य  चिकित्सक से अपने खानपान की डाईट जो आपकी सेहत के लिये अच्छी या खराब है पता कर सकते है तथा मौसम के अनुसार अपना खानपान व्यवस्थित कर सकते है.

*विवाह मॆ नाड़ी दोष*

शास्त्रों मॆ समान नाड़ी मॆ विवाह वर्जित माना गया है इसका कारण विवाह के पश्चात शारीरिक सम्बन्ध तथा उसके पश्चात नये शरीर के निर्माण मॆ समान नाड़ी का होना आने वाले बच्चे तथा खुद गर्भ धारण वाली स्त्री के लिये कष्टकारी होता है इससे मां तथा बच्चे की सेहत दोनो के लिये हानिकारक होता है.हमारा ज्योतिषशास्त्र स्वास्थय,विवाह तथा हर क्षेत्र की सही व सटीक जानकारी दे सकता है बशर्ते इसका सही अध्ययन हो.

*प.चंद्रशेखर नेमा "हिमांशु"

9893280184,7000460931

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