डॉ. चंद्रशेखर प्राण ...एक अगस्त, 2016 को तीसरी सरकार अभियान के एक कार्यक्रम के सिलसिले में बिहार राज्य में प्रवास के दौरान वहां की पंचायत सरकार व्यवस्था के अंतर्गत संचालित न्याय पंचायत की न्यायिक कार्यवाही को प्रत्यक्ष रूप से देखने का अवसर मिला. न्याय पंचायत बिहार राज्य में ‘ग्राम कचहरी’ के नाम से संबोधित किया जाता है. ‘ग्राम कचहरी’ के अनुभव को आप के साथ बांटना चाहता हूँ.

आजादी से पहले उत्तर प्रदेश और बिहार एक ही राज्य थे. इसे संयुक्त प्रान्त कहा जाता था. 1920 में बने संयुक्त प्रान्त पंचायती राज अधिनियम में ‘अदालत पंचायत’ के नाम से स्थानीय स्तर पर न्याय की व्यवस्था का प्रावधान किया गया था. आजादी के बाद जब दोनों प्रदेश अलग हुए, तब उत्तर प्रदेश में इसे ‘न्याय पंचायत’ तथा बिहार में ‘ग्राम कचहरी’ के नाम से संचालित किया जाता रहा. लेकिन उत्तर प्रदेश में 1972 में अंतिम बार न्यायपंचायत का गठन हुआ था, उसके बाद से यह प्रक्रिया रुक गई है. लेकिन बिहार में ग्राम कचहरी वर्तमान समय में भी उल्लेखनीय तरह से सक्रिय है. बिहार में ग्राम पंचायत के चुनाव के साथ ही राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा ही ‘ग्राम कचहरी’ के भी पंच और सरपंच का चुनाव कराया जाता है; जिसके चलते वहां ‘ग्राम कचहरी’ नियमित रूप से वहां गठित हो रही है.सरपंच के सहयोग के लिए एक विधि स्नातक को न्यायमित्र तथा एक हाईस्कूल तक शिक्षित को सचिव के रूप में राज्य सरकार द्वारा नियुक्त किया गया है. ‘ग्राम कचहरी’, बिहार में कितनी लोकप्रिय है, इसका अनुभव मुझे एक ग्राम कचहरी में उपस्थित होकर हुआ.

एक अनुभव 

तारीख़  – एक अगस्त, 2016

स्थान – बिहार के समस्तीपुर जिले के सरायरंजन प्रखंड में स्थित धर्मपुर ग्राम पंचायत

मुझे बताया गया कि पिछले दस वर्षों में यहाँ की ग्राम कचहरी में लगभग 400 विवाद दाखिल हुए. सभी विवादों का निपटारा ग्राम कचहरी द्वारा किया गया. एक भी विवाद गाँव से बाहर नहीं गया है.अधिकांश विवादों में दोनों पक्षों के बीच समझौता हुआ है. कुछ में 500 रूपये तक का जुर्माना हुआ है, जिसे दोषी व्यक्ति द्वारा सहज तरीके से भरा गया. मैंने यहाँ ग्राम कचहरी के प्रति ग्रामीणों में गहरी आस्था देखी. उल्लेखनीय है कि यहाँ के वर्तमान सरपंच श्री मनीष कुमार झा युवा हैं और लगातार तीसरी बार सरपंच के रूप में भारी मतों से चुने गए है. श्री झा ने एम. ए., एल. एल. बी. की पढ़ाई की है. लोगों ने बताया कि श्री झा बहुत ही उत्साहित, समझदार तथा ईमानदार व्यक्ति है. संभवतः यह भी एक वजह है कि यहाँ के ग्रामीणों में ग्राम कचहरी के प्रति गहरी आस्था है.

एक अगस्त को जो विवाद इस ग्राम कचहरी में सुना गया है वह दलित वर्ग के दो परिवार के बीच हुए झगड़े से सम्बंधित था. रुपये के लेन-देन को लेकर एक परिवार की महिला का दूसरे परिवार के पुरुष से झगडा हुआ था. झगड़े में गाली-गलौज तथा साधारण मारपीट हुई थी. महिला ने ग्राम कचहरी में शिकायत दर्ज कराई थी. यह विवाद ग्राम कचहरी की पूर्ण पीठ द्वारा सुना गया. सुनवाई में सरपंच और उपसरपंच के अतिरिक्त 07 अन्य पंच शामिल थे. इनमे से 06 पंच महिला थीं. ग्राम कचहरी में विधिवत सुनवाई हुई. उस दौरान गाँव के भी काफी लोग मौजूद थे. इस खुली सुनवाई में दोनों पक्षों के तर्क सुनाने के बाद न्यायमित्र की सलाह के साथ सभी पंचों ने न्यायमित्र की सलाह के साथ-साथ सरपंच से भी चर्चा की. पंचों के अनुसार दोनों पक्ष दोषी पाए गए. दोनों पक्षों को उनकी गलतियों से अवगत कराते हुए ग्राम कचहरी ने उनके बीच समझौते का प्रस्ताव रखा. दोनों पक्षों ने सहजता से इसे स्वीकार किया और पूरी रजामंदी के साथ ख़ुशी-ख़ुशी समझौते के पेपर पर हस्ताक्षर किये.

एक ज़रुरत 

मैंने सोचा कि यदि बिहार में ग्राम कचहरी सक्रिय न होती, तो क्या होता ? जाहिर है कि ऐसे में उक्त विवाद थाने में जा सकता था. थानों में क्या होता है, हम सब अच्छी तरह से परिचित हैं. यह भी हो सकता था कि यह विवाद धीरे-धीरे और बड़ा रूप लेता और फिर जिला अदालत या उससे आगे भी जाता. उनके बीच का परस्पर भाईचारा और सदभाव सदैव के लिए नष्ट हो जाता.

बिहार के सन्दर्भ में ग्राम कचहरी में अब तक जो विवाद दाखिल हुए है और जिन पर कार्यवाही हुई है उनके सम्बन्ध में अब तक हुए अध्ययनों से जो तथ्य निकलते है उसमें जमींन सम्बन्धी विवाद 58% तथा घरेलु विवाद 20% है. इसमें से 85% विवाद दलित एवं पिछड़े वर्ग से सम्बंधित है. बिहार में ग्राम कचहरी में आये हुए इन विवादों का 90% हिस्सा समझौते के द्वारा तय हुआ है. अन्य 10% में 100 से 1000 रूपये तक का जुर्माना लगाया गया है. ज्यादातर मामलों में दोषी ने सहज रूप से जुर्माना भरा है. लगभग 03% विवाद ही ऊपर की अदालतों में अपील हेतु गए है. इसमे यह स्पष्ट है कि वर्तमान समय में बिहार में ग्राम कचहरी के माध्यम से गाँव के दलित और कमजोर वर्ग के लोगों के आपसी विवाद गाँव में सुलझ रहे है जिसमें उन्हें थाने और जिला कचहरी के चक्कर लगाने तथा बहुत सारा अनावश्यक धन खर्च करने से फुर्सत मिल गई. गांवों में इसका प्रभाव भी दिखाई पड़ता है.

विचारणीय तथ्य 

यहाँ गौर करने लायक आंकड़ा यह है कि इस समय देश में तीन करोड़ से अधिक मुकदमें कोर्ट में लम्बित हैं. इसमें से 66% मुकदमें जमीन व संपत्ति से सम्बंधित हैं. 10% पारिवारिक विवाद से जुड़े हैं. इन 76% विवादों का एक बड़ा हिस्सा गाँव से जुडा है. इनमें भी 90% विवाद ऐसे लोगों का है, जिनकी वार्षिक आय तीन लाख से कम है. ये ज्यादातर दलित और पिछड़ी जाति के लोग हैं. वर्तमान न्याय व्यवस्था बहुत ही खर्चीली तथा विलम्ब से न्याय देने वाली हो गई है. एक केस औसतन 10 साल चलता है और एक केस में तीन लाख से अधिक व्यय होता है.

इन आंकड़ों के आईने में ग्राम कचहरी यानि हमारी पंचायती राज प्रणाली में न्याय पंचायत का होना और ज़रूरी तथा महत्वपूर्ण हो जाता है.उत्तर प्रदेश की नई सरकार क्या न्याय पंचायत की ज़रुरत पर गौर करेगी ?

लेखक : डॉ. चंद्रशेखर प्राण

(तीसरी सरकार अभियान के मूल विचारक एवम संचालक )

cspran.nyks'gmail.com, 08400702128, 9911529966


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