मशहूर गीतकार व फिल्मकार गुलजार साहब का 82वां जन्मदिन है. आज ही के दिन 1934 को अब पाकिस्तान के पंजाब में पड़ने वाले झेलम जिले के दीना गांव में उनका जन्म हुआ था. गुलजार के नाम से प्रसिद्ध हुए संपूर्ण सिंह कालरा के पिता उनके गीत व कविता लिखने को बहुत पसंद नहीं करते थे, लेकिन उनके गीत और उर्दू कविता ही था, जिसने बॉलीवुड में नये-नये आये को उस जमाने की दिग्गज अदाकार मीना कुमारी को उनकी ओर आकर्षित किया. मीना कुमारी गुलजार साहब से उम्र में तीन-चार साल तो बड़ी थी हीं, साथ ही तब की दिग्गज अदाकारा थीं, जबकि गुलजार साहब फिल्म इंडस्ट्री में अपना पैर जमाने की कोशिश कर रहे थे. गुलजार जब प्रख्यात फिल्मकार विमल राय के असिस्टेंड के रूप में काम कर रहे थे, उसी दौरान उनकी मीना कुमारी से पहली मुलाकात हुई थी और वे उनकी उर्दू कविता करने शैली से अाकर्षित हो गयीं.

यह वह दौर था, जब मीना कुमारी का पारिवारिक जीवन सही नहीं चल रहा था और उनके पति कमाल अमरोही से उनकी दूरियां बढ़ गयी थीं. इस दौरान मीना कुमारी शराब और कविता में ही अपना ठौर खोजती थीं और कविता की वह छावं उन्हें गुलजार के पास मिली. गुलजार साहब ने कभी मीना कुमारी की कविता व गीतों की समझ की तारीफ करते हुए कहा कि उन्हें उर्दू कविता की अच्छी समझ थी. कहते हैं कि मीना कुमारी व गुलजार की केमेस्ट्री को फिल्म आंधी के गीत तुम जो आ गये तो नूर आ गया है, नहीं तो चरागों से लौ जा रही थी में पिरोया गया है. इस गीत को भी गुलजार साहब ने लिखा है और फिल्म की पथकथा भी. हालांकि फिल्म आंधी को इमरजेंसी की पृष्ठभूमि में बनी थी, जिसे उस समय के एक बड़ी राजनेता के जीवन से प्रेरित बताया गया.

कविता लिखने से नहीं चलती अजीविका

बंटवारे की हिंसा के उस दौर को वो सालों तक भूला नहीं पाये और फिल्‍म 'माचिस' में उनका दर्द पर्दे पर नजर आया. ग़ुलज़ार अपने पिता की दूसरी पत्‍नी की इकलौती संतान थी. मां की ममता की छांव भी उन्‍हें ज्‍यादा दिन तक नसीब न हो सकी. वे उन्‍हें बचपन में ही छोड़कर इस दुनियां को अलविदा कह गईं. बचपन से ही उन्‍हें कवितायें लिखने का शौक था. लेकिन उनके पिता कहा करते थे कि कविता और कहानी लिखने से अजीविका नहीं चलती.

मोहे श्याम रंग दे दई...

वर्ष 1950 में ग़ुलज़ार ने मुबंई की ओर रुख किया. शुरुआती दिनों में उन्‍होंने वर्ली के ही एक गैरेज में मैकेनिक का काम किया. लेकिन धीरे-धीरे उनका रुझान फिल्‍मों की तरफ हुआ. उन्‍होंने हिंदी सिनेमा में बिमल रॉय और ऋषिकेश मुखर्जी के सहायक के तौर पर काम किया. 1963 ग़ुलज़ार ने बिमल रॉय की फिल्‍म 'बंदनी' के लिए पहला गीत लिखा,' मोरा गोरा अंग लइ ले, मोहे श्याम रंग दे दई...इसी गीत उन्‍होंने बता दिया कि वे लंबे समय तक टिकने वाले हैं.

बतौर निर्देशक भी कामयाब रहे

ग़ुलज़ार ने बतौर निर्देशक भी कामयाबी हासिल की. उन्‍होंने वर्ष 1971 में 'मेरे अपने' से इस क्षेत्र में कदम रखा. इस फिल्‍म में मीना कुमारी, विनोद खन्ना और शत्रुघ्‍न सिन्हा ने मुख्‍य भूमिका निभाई थी. इसके बाद उन्‍होंने 'कोशिश', 'परिचय', 'खुशबु', 'अंगूर', 'इजाजत' और 'लिबास' जैसी फिल्‍में बनाई.

मीना कुमारी के करीब थे

ग़ुलज़ार साहब और 'ट्रेजेडी क्‍वीन' मीना कुमारी के बीच गहरा रिश्‍ता था. बिमल रॉय के सहायक के रूप में काम करने के दौरान दोनों की हुई पहली मुलाकात गहराती गयी. उस दौरान मीना कुमारी अपने पति कमाल अमरोही संग अपने वैवाहिक जीवन के उतार-चढ़ावों को लेकर तनाव में थी. उन्‍हें ग़ुलज़ार साहब के गीतों का सहारा मिला. उनकी भी कविता लिखने में खासी दिलचस्‍पी थी जो उन्‍हें और करीब ले आया. शूटिंग के दौरान मीना कुमारी ग़ुलज़ार के घर पर ज्‍यादा से ज्‍यादा समय बिताया करती थीं और दोनों कविताओं और गजलों के बारे में खूब चर्चाएं किया करते थे. वे (ग़ुलज़ार) मीना कुमारी के बारे में कहा करते थे उन्‍हें लम्हे पकड़ने में महारथ हासिल थी.

राखी को बनाया जीवनसंगिनी

जब ग़ुलज़ार अभिनेत्री मीना कुमारी संग अपने प्रेम-प्रसंगो को लेकर चर्चा में थे. इसी बीच एक पार्टी में उनकी मुलाकात अपने जमाने की दिग्‍गज अदाकारा राखी से हुई. उनकी खूबसूरती उन्‍हें भा गई और वे उनकी ओर खींचे चले गये. 15 मई 1973 को दोनों विवाह बंधन में बंध गये. ऐसा कहा जाता है कि दोनों की शादी इस समझौते पर हुई थी कि शादी के बाद राखी फिल्‍मों में काम नहीं करेंगी. लेकिन राखी के सितारे उन दिनों बुलंदियों पर थे ऐसे में उन्‍होंने निर्माता-निर्देशक यश चोपड़ा की फिल्‍म 'कभी कभी' बिना ग़ुलज़ार के सलाह-मशविरा के साइन कर ली. यह दोनों के अलगाव का कारण बना और राखी डेढ साल की बेटी मेघना ग़ुलज़ार को लेकर अलग हो गई.

गुलज़ार हमेशा उर्दू में ही लिखते हैं. शांत और सौम्य दिखने वाले गुलज़ार अपनी गीतों और कविताओं से अपनी जिंदादिली को कह जाते हैं. उन्‍हें सिनेमा के क्षेत्र में सर्वश्रेष्‍ठ योगदान देने के लिए सबसे बड़ा सम्‍मान दादा साहब फाल्‍के पुरस्‍कार मिल चुका है. उन्‍हें, पद्मभूषण, साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार और सर्वश्रेष्‍ठ गीतकार के लिए 10 फिल्‍मफेयर अवार्ड मिल चुके हैं.


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